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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:चितसंस्तवन - श्लोक 4

From जैनकोष



परिणामगतं परिणामहरम्, परिणामभवं परिणामयुतम् ।

उपपादविनाशविकल्परहम्, प्रभजामि शिवं चिदिदं सहजम् ॥4॥

उपात्य तत्त्व की उत्तीर्णपर्यायता- जो पर्यायों में प्राप्त है फिर भी पर्यायों से रहित है जो परिणामों में उत्पन्न होता है अथवा परिणाम ही जिसका प्रयोजन है, परिणाम का होते रहना ही जिसका एक स्वभाव है, जो पर्यायों से युक्त है फिर भी उत्पत्ति विनाश के विकल्प से परे है, ऐसे सहजशिवस्वरूप चैतन्यस्वरूप को मैं प्रकृष्टरूप से भजता हूं । यह चित्स्वरूप अंतस्तत्त्व पर्यायों मे गत है । अनादिकाल से जितने समय हैं, अनंतकाल के जितने समय होंगे उतनी ही सूक्ष्म दृष्टि से इस आत्मा की पर्यायें हैं और यह आत्मा प्रत्येक पर्यायों में गत है, जैसे मनुष्य बचपन, जवानी, बुढ़ापा आदिक समस्त पर्यायों में प्राप्त है इसी प्रकार यह आत्मा आत्मा की समस्त पर्यायों में गुण पर्यायों में, द्रव्य पर्यायों में सब में यह गत है, गया हुआ है, पर्यायों में गत है । इससे सिद्ध है कि यह किसी भी समय एक पर्याय में रहता है और उस पर्याय को छोड़कर भी चल देता है । जैसे कोई पुरुष अनेक नगरों में गत है तो वह किसी समय एक जगह ही तो है, पर वह गया है, वह गांव अतीत हो जाता है जहां से वह पुरुष गुजर जाता है, ऐसे ही वे पर्यायें अतीत हो जाती हैं जिन पर्यायों से यह आत्मा गुजर जाता है । इसमें दो बातें अपने आप सिद्ध हो गयीं कि किसी न किसी एक पर्याय में जब कभी भी रहता ही है और जितनी पर्यायें पा चुका उन पर्यायों में अब नहीं रह रहा है ।

पर्यायों की द्रव्यगतता- पर्यायों में यह नहीं रहता, इसमें पर्यायें रहती हैं, अर्थात् आत्मा में पर्यायें उत्पन्न होती हैं, आधार आत्मा है, पर्याय आधेय है, पर जब काल की लंबी दृष्टि से तकते हैं तो यह भाषा बनती है कि यह आत्मा पर्यायों में रहता है, पर्यायों से गत होता है फिर भी पर्यायों से यह परे है, पर्यायमात्र यह आत्मा नहीं है । जो दशा होती है, परिणती बनती है सो उन परिणतियों में तो यह गत है प्राप्त है मगर किसी परिणति रूप बनकर नहीं रहता । उस काल में तो उस पर्यायमय है, पर एक कालमात्र ही तो नहीं है सब कुछ । इस कारण कहा गया है कि पर्यायों में गत होकर भी यह आत्मा पर्यायों से परे है । बाल अवस्था को ही तो मनुष्य नहीं कहते । यदि बाल अवस्था को ही मनुष्य कहा जाय तो बाल्यावस्था मिटने का अर्थ यह हो गया कि मनुष्य मिट गया । इससे सिद्ध है कि मनुष्य बालअवस्था से रहित है । तो जैसे बाल अवस्था से रहित है । ऐसे ही जवानी बुढ़ापा आदिक सब अवस्थाओं से रहित है । तो क्या सर्वथा जवानी बुढ़ापा आदिक सब अवस्थाओं से रहित है मनुष्य ? तो सर्वथा ऐसा भी नहीं है । वह किसी भी समय किसी एक पर्याय में तन्मय रहता है । ऐसे ही आत्मा सर्व पर्यायों से परे है, किंतु सर्वथा ऐसा भी नहीं है, वह तात्कालिक पर्याय से युक्त है ।

प्रतिबोधनार्थ अखंड वस्तु के अनुरूप भेद- वस्तु अखंड है उसको समझने के लिए ऋषि संतों ने ठीक अनुरूप भेद किया है । आत्मा ध्रुव है तो उसके भेद भी ध्रुव बनेंगे । तो जो भेदरूप से ध्रुव जाने गए उन्हें कहेंगे गुण । आत्मा में सहज ज्ञान, सहज दर्शन, सहज आनंद, सहज शक्ति, सहज चारित्र, सहज श्रद्धान है, सहज का अर्थ है सुगम, स्वभाव, शाश्वत। स्वभाव शाश्वत जो शक्तियां हैं वे शक्तियां अनंत हैं । शक्तियां अनंत हैं यह कैसे जाना ? अखंड वस्तु में हम जितना समझ पाते हैं उतना ही उसमें से शक्तियां ढूंढते हैं । समझना है तो उसकी अब सीमा तो न रही । हम जहां तक जान पायें, जहां तक समझ सकें, वहां तक हमें शक्तियां प्रतीत होती हैं । तो अब यहां शक्तियों का अवगम जानने के आधार पर रहा । वस्तु तो स्वयं अपने आप में अखंड है । अब हम जितना समझ पाये सो बताते हैं, शास्त्रों में भी अनंत शक्तियां कहां लिखी जा सकती हैं, लेकिन जब उसमें सीमा नहीं है तो कुछ ही शक्तियां ज्ञात की जा सकती हैं बताई जा सकती हैं । यों शक्तियां अनंत हैं, और प्रत्येक शक्ति का कोई न कोई परिणमन रहता ही है । परिणमन रहित शक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती । है शक्ति तो वह अवस्था के द्वारा ही तो जानी गई । हम पर्यायों को निरखकर शक्तियों का ज्ञान करते हैं । पर्यायें शीघ्र समझ में आती हैं क्योंकि वे व्यक्तरूप हैं । पर्यायें तो हैं व्यक्त, शक्तियां हैं अव्यक्त । तो व्यक्त पर्यायों को जानकर चूंकि ये पर्यायें परस्पर भिन्न हैं और पर्यायों का आधार शक्ति है, न हो शक्ति तो यह परिणति कैसे बने इस रूप से परिणमने की शक्ति ? इस-इस तरह से निरखने पर अनेक गुण विदित होते हैं । ये गुण द्रव्य की तरह ध्रुव हैं और पर्यायें अध्रुव हैं ।

वस्तु में द्रव्यत्व और परिणमन की अवश्यंभाविता- यहां संक्षेप किया जाय तो पदार्थ और पर्यायें दो तो मानने ही पड़ेंगे । पदार्थ भी अखंड, पर्याय भी अखंड, पदार्थ की प्रत्येक समय में जो पर्याय है वह अखंड है, लेकिन अखंड पदार्थ में पदार्थ के अनुरूप याने ध्रुवता का उल्लंघन न करके जब भेद किया जाता है तो शक्तियां अनेक सिद्ध होती हैं । इसी प्रकार अखंड पर्याय में जब भेद किया जाता है तो पर्यायें भी अनेक हो जाती हैं, और, इस भेद दृष्टि में उन प्रत्येक पर्यायों में यह निरखा जा सकेगा कि इस गुण की यह पर्याय है, इस गुण की यह पर्याय है । तो भेद दृष्टि से निरखिये कि आत्मा पर्यायों में प्राप्त है, पर्यायों में गुजरता है, नई पर्याय बनती है, पुरानी पर्याय विलीन होती है । बस इसी के मायने हैं कि यह द्रव्य पर्यायों में गत है ।

वस्तु की द्रव्यपर्यायोंभयमयता- कोई लोग ज्ञान सुख दु:ख आदि पर्यायों का ही एकांत करते हैं और पर्यायों को ही चेतन समझते, सर्वस्व जानते और पर्यायों में रहने वाले को मिथ्या कहते । जैसे तेल की बूंदें एक-एक जल रही हैं और उससे दीपक बन रहे हैं तो जो एक दीपक आध घंटे तक जलता हुआ दिखा वह एक दीपक नहीं है किंतु जितनी बूंदें हैं उतने ही वे दीपक हैं । लेकिन लगातार दीपक होते रहने से उनकी संतान बन गयी और उस संतान में एक दीपक की कल्पना करने लगे, पर उनके जितने तैल अंश हैं उतने ही दीपक हैं, इसी प्रकार सर्वपदार्थों को यह भेदवादी, पर्यायवादी, क्षणिकवादी मानता है कि इतने ही सर्व पदार्थ हैं, पर उस उस प्रकार के पदार्थों के उत्पन्न होने की परंपरा जो लग गयी उससे लोगों को एकत्व का भ्रम बन गया, पर पदार्थ एक नहीं है, प्रतिसमय में होने वाले वे पदार्थ अनंत हैं । तो एक ने पर्याय को प्रधान मानकर द्रव्य को गौण किया, तो किसी दार्शनिक ने उस द्रव्य को ही प्रधान मानकर पर्याय को इतना गौण किया कि पर्याय की स्वीकारता ही न रही। गौण करना क्या, माना ही नहीं । जैसे पर्यायवादी ने द्रव्य को माना ही नहीं, ऐसे ही द्रव्यवादी पर्याय को मानते ही नहीं । तो जब ऐसा सोचा जाता है कि पर्यायें नहीं, केवल द्रव्य है, तो उस द्रव्य को अपरिणामी, नित्य, अगम्य आदिक शब्दों से कहने पर ही कुछ छुटकारा हो पाता है लोगों के प्रश्न का जवाब देने से, पर कोई भी स्थिति ऐसी नहीं है जो परिणमनशून्य हो, एक द्रव्यमात्र हो, और न ऐसा है कुछ कि द्रव्यशून्य हो और केवल एक एक समयवर्ती ही कुछ हो । इस कारण वस्तु को द्रव्य पर्यायात्मक मानना चाहिए । वह शाश्वत है, यह तो है द्रव्यरूपता और क्षण क्षण में नवीन नवीन बनता है, परिणमन करता है, यह है उसका पर्यायरूप । आत्मतत्त्व पर्यायों में गत है फिर भी पर्यायों से रहित है । पर्याय का अध्रुव स्वरूप है । द्रव्य का आत्मा का शाश्वत स्वरूप है । वे दो यद्यपि एक नहीं हो सकते लक्षण से फिर भी वे अलग-अलग नहीं, दो सत् नहीं, किंतु एक ही चैतन्यसत् का समय-समय पर उस उस प्रकार की अवस्था बनती जाती है । तो यह मैं सहज चित्स्वरूप परिणामों में गत हूं और परिणामों से रहित हूं । परिणाम का अर्थ है यहां पर्याय, परिणमन । मैं आत्मा यहां किसलिए हूं, क्या हूं, इन दो प्रश्नों का यर्थाथ उत्तर आत्मा का उद्धार कर देगा। मैं क्या हूं, यह तो बड़े विस्तार से कथन चल ही रहा है । अमूर्त प्रतिभासमात्र पर्यायों में गत होकर भी पर्यायों से रहित शाश्वत चैतन्यमात्र मैं हूं ।

पदार्थों के अस्तित्त्व का प्रयोजन- यह मैं किसलिए हूं, वस्तुत: हूं और होते रहने के लिए ही हूं, इससे आगे और कोई प्रयोजन नहीं । प्रत्येक पदार्थ के सत्त्व का प्रयोजन सत्त्व ही है, रहा आये इसीलिए वह है । इसके आगे और मेरी ओर से कुछ उपयोग नहीं जो किसी के काम आ सके, किसी के लिए उसका उपयोग हो जाय । उपयोग का अर्थ उपभोग (use) । ऐसा कोई पदार्थ नहीं होता कि जिसका प्रयोजन कोई अन्य द्रव्य बन जाय । तो प्रत्येक पदार्थ जो है सो है रहने के लिए है । उनका और कुछ प्रयोजन नहीं, इसीलिए उनका ज्ञाता दृष्टा रहने में ही भला है । मैं आत्मा भी हूं तो हूं रहने के लिए ही हूं । इसके आगे मेरे सत्त्व का और कोई प्रयोजन नहीं । जैसे मोही अज्ञानी जीव समझते हैं कि मैं घर गृहस्थी बसाने के लिए हूं, व्यवस्था बनाने के लिए हूं, खाने पीने के लिए हूं, जैसे कि नाना पर्यायें बनाया करता है अज्ञानी, पर वे सब मिथ्या बातें हैं, अर्ंतदृष्टि करके निरखो कि मैं हूं, तो किसके लिए हूं, किसी दूसरे के लिए नहीं हूं, स्वयं के लिए हूं, सो स्वयं में भी इसे क्या करना है । जब तक बुद्धि रहेगी करने की कि मुझे यह करना है, मुझे करने को यह काम पड़ा है तब तक तो वह संकट में है, यर्थाथता में नहीं है, यथार्थता का अनुराग नहीं होता है, और जब अपने आपके सत्यस्वरूप का अनुराग हो जाता है तो सुविदित हो जाता है कि मैं हूं तो हूं रहने के लिए ही हूं और कुछ करने धरने की बात यहां है ही नहीं । क्या करूं किसे करूं ? कुछ सार रखा है क्या दूसरे पदार्थ में जिसके विषय में मैं करने का विकल्प लिए रहता हूं । जैसे सर्व पदार्थों के प्रति सोचा जा सकता है कि यह है तो किसलिए है, ऐसे ही पदार्थ के नाते से अपने बारे में भी सोचना चाहिए कि मैं हूं तो किसलिए हूं । लोग कहते हैं कि जो कुछ पैदा होता है वह मनुष्य के उपभोग के लिए है । खेती बाड़ी हो, फल पैदा हों, अन्न पैदा हो, ये सब किसलिए हुए हैं ? ये सब खाये पिये जाने के लिए हैं, पर बात ऐसी है नहीं । यह मनुष्य रागी अपने विषय साधन के लिए कुछ कहे वह उसकी बात है पर गेहूं, फल आदिक जो कुछ भी हैं उनकी ओर से उनसे पूछो । वे तो जवाब न देंगे पर उनका स्वरूप जवाब देगा । हम ही जवाब दे लेंगे कि ये किसलिए बने हैं । ये हैं रहने के लिए बने हैं, किसी के खाए जाने के लिए नहीं ? बराबर यही उत्तर मिलेगा प्रत्येक पदार्थ में । अब वे पदार्थ हैं तो अपना अस्तित्त्व बनाये रखने के लिए और यहां मनुष्य समझते हैं कि ये सब मेरे लिए हैं तो आप देखिये पदार्थों के साथ हमारा नाता बिगड़ गया, विपरीत दृष्टि हो गयी । जैसा शुद्ध प्रयोजन है वैसा ही निरखता रहे तो उसमें भलाई है निराकुलता है कभी क्षोभ नहीं आ सकता । तो यह मैं आत्मा हूं, अपना आपका अस्तित्व बनाने के लिए हूं । हूं तो हूं रहना ही है इसीलिए सदा रहता हूं । इससे आगे मेरा दुनिया में कोई प्रयोजन नहीं है । इस भीतर के मर्म का परिचय हो तो इस जीव की आकुलतायें दूर होंगी ।

आत्मतत्त्व की परिणामगतता व परिणामरहता- यह मैं सहज परमात्मतत्त्व चैतन्यस्वरूप पर्यायों मे गत हूं, फिर भी पर्यायों से रहित हूं । पर्यायों में जाना, पर्यायों से रहित होना यह बात उत्पाद और विनाश के बिना नहीं हो सकती । पर्यायों में जाना तो जाना होता है नवीन पर्यायों की प्राप्तिरूप, वह तो उत्पाद को सिद्ध करता है और जाने में गत छूट जाता है । उसका ही विनाश । तो अवस्थायें उत्पाद विनाश के बिना बन नहीं सकतीं । मैं हूं तो मेरा विकास मेरा परिणमन सब कुछ जो हो रहा है वह मेरा उत्पादव्यय स्वभाव के कारण हो रहा है, इस तरह यह आत्मा पर्याय में गत है फिर भी पर्यायों से रहित है । यह तो एक पहेली सी हो गयी । जैसे लोग पहेलियां बोलते हैं, अखबारों में छपती हैं जिसे पढ़कर एकबार आश्चर्य भी आ जाता कि ऐसा क्या ? इसी प्रकार यह भी एक पहेली है कि पर्यायों में है और पर्यायों से परे हैं, ऐसी क्या चीज है बताओ । ज्ञानी जगत में एक यह पहेली बन गई बताओ ऐसी कौन सी चीज है, वह कौन है जो पर्यायों में जाता है फिर भी पर्यायों से रहित है ? यह है परमार्थ सहज स्वरूप ।

आत्मा की स्वप्रयोजकता- यह सहज शिव चित्स्वरूप परिणाम भव है । परिणामों में पर्यायों में इसका अस्तित्व है परिणमन होना ही इसका प्रयोजन है, ऐसा यह सहजस्वरूप परिणाम में ही अवस्थित है, पर जैसे दूध में घी को निरखने वाले बिरले ज्ञानी ही होते हैं ऐसे ही पर्यायों में उस द्रव्य स्वरूप को निरखने वाले बिरले ही ज्ञानी होते हैं । यहां कह रहे हैं कि पर्याय ही जिसका प्रयोजन है और जो दिख रहा है उसे निरखकर यह कहना कि द्रव्य ही जिसका प्रयोजन है, पर्यायें क्यों हुई इन पर्यायों का क्या प्रयोजन है ? इनका द्रव्य ही प्रयोजन है, ये तो हुई और मिट गईं, ये तो अपना अस्तित्व खो देती हैं, नवीन पर्याय हुई पुरानी पर्याय विलय को प्राप्त हुर्इ, पर्यायें तो अपना अस्तित्व खोती जाती हैं । ऐसी यह कुर्बानी पर्यायों का यह बलिदान किसलिए है । जिस आधार में पर्यायें हुई हैं ये पर्यायें उस आधार के लिए हुई हैं । गरीबों की ऐसी ही स्थिति होती है । करेंगे, मिटेंगे किसके लिए ? उनका उपयोग प्रयोजन कैसे मिलेगा ? समृद्ध पुरुष के लिए । इन पर्यायों की यह वृत्ति अपना सब कुछ न्यौछावर कर देना, बलिदान हो जाना, इसका प्रयोजन क्या हुआ ? वही एक परमार्थ पदार्थ रहा । द्रव्य इनका प्रयोजन रहा ।

ज्ञानी की परमार्थ प्रायोजनिक तत्त्व पर दृष्टि- किसी ओर से कुछ भी निरख लो, जिनका ज्ञान स्पष्ट है वे प्रत्येक वर्णन से, प्रत्येक निगाह से, प्रत्येक मंतव्यों से एकमात्र सारभूत प्रयोजन जरूर निकाल लेंगे, इसीलिए ज्ञानी पुरुषों की कदर है । जिन्होनें अनेकों को सारभूत समझा है वे गौरवहीन हैं, गरीब हैं, क्योंकि अनेकों को सारभूत समझने से वे किसी भी एक सार में नहीं आ पाया न उसका निर्णय रह गया, न उसका कोई दृढ़ आलंबन रह सका और सारभूत अनेक होते ही नहीं किसी के लिए । अनेक हो सार तो क्या वे सब अनेक बराबरी के सारभूत हैं या हीनाधिकता से सारभूत हैं । प्रश्न उठाओ कि बराबरी के सारभूत हैं तो यह प्रत्यय न हो पायगा कि यह सारभूत है और कमीबेसी का सारभूत है तो इसका अर्थ है कि वह सारभूत है ही नहीं । आत्मा के लिए सारभूत केवल एक ही कुछ हो सकता है । तो आत्मा का सारभूत है केवल द्रव्य दर्शन, स्वरूप दर्शन सहज स्वरूप वही अपने आपके लिए सार है । तो इन पर्यायों का, इन परिणमनों का प्रयोजन क्या है ? उस एक का सत्त्व बना रहना, वह है, परमार्थ है । अब इस ओर से देखिये, उस सारभूत द्रव्य का प्रयोजन केवल परिणाम है, पर्याय है, किसलिए है द्रव्य ? बस व्यक्त रूप रहे । कुछ न कुछ अवस्था रहे इसके लिए है सब । तो पर्याय ही जिसका प्रयोजन है इसलिए सहज स्वरूप, ऐसा कहने से यह अर्थ निकलता है, यह ध्वनी निकलती है कियह पर्याय से परे है, लेकिन पर्याय का प्रयोजन इनके होने पर भी यह परिणाम से युक्त है । कभी भी कोई स्थिति कोई समय ऐसा नहीं आ सकता कि पदार्थ किसी भी पर्यायरूप न हो और अस्तित्व रहे । इस कारण कहा है कि वह परमपदार्थ परिणामयुक्त है ।

अलौकिक अद्भुत पहेली वाले की उपासना- अब ये चार मर्म विदित हुए कि यह मेरा स्वरूप मेरा मालिक, मेरा परमात्मतत्त्व प्रभु, रक्षक, शरण सब कुछ पर्यायों में गत है, प्रभु पर्यायों से रहित है । है तब इसकी पर्यायें होंगी ही, किंतु पर्यायों में कोई दृष्टि अटकाये तो वह पर्यायदृष्टि होकर भटक गया । स्वतंत्र होकर जहां एकदम आनंदधाम में पहुंचे ऐसी अपनी प्रकृति रुक गई । तो आत्मा पर्यायों में गत है फिर भी पर्यायों से रहित है, ऐसा रूवरूप का ज्ञाता पुरुष धोखा नहीं खा सकता, अपने हित रूप शरण सार तत्त्व पर पहुंच जाता है । तो इसमें दो विशेषण आये, पर्यायों में गत है, पर्यायों से रहित है, और पर्याय ही इसका प्रयोजन है । परिणमता रहे, व्यक्त रूप रहे, बना रहे, बस यही उसका प्रयोजन है । लोकव्यवहार में प्रयोजन जुदे, देश जुदे द्रव्य की चीज होती है । लोकव्यवहारिक जैसा प्रयोजन यह नहीं । यह पर्याय से युक्त है, भिन्न नहीं है । जिस समय जिस पर्याय में द्रव्य आता है उस समय में वह द्रव्य उस पर्याय से तन्मय हो जाता है, ऐसी एक अद्भुत पहेली वाले को, कि जो पर्यायों में गत है और पर्यायों से रहित है, पर्यायों में उत्पन्न है, पर्यायें ही जिसका प्रयोजन है और पर्यायों से तन्मय है, ऐसे इस अंत: चैतन्यस्वरूप को मैं प्रकृष्ट रूप से भजता हूं ।

वस्तु की उत्पादव्ययपरता- यह मैं सहज चैतन्यतत्त्व पर्यायों में गत हूं फिर भी पर्यायों से रहित हूं । पर्यायोंमय होता हूं । पर्याय ही मेरा प्रयोजन है और जिस काल में जो पर्याय होती है उस काल में मैं पर्यायमय हूं, तिस पर भी मुझमें उत्पादव्यय के विकल्प नहीं हैं । परमशुद्ध निश्चयनय की दृष्टि से निरखा जा सकने वाला यह चैतन्यतत्त्व उत्पादव्यय के विकल्पों से दूर है अर्थात न वह उत्पन्न होता है और न नष्ट होता है । वह तो एक सहज चैतन्यस्वरूप है । ऐसे सहज शुद्ध चित्स्वरूप को मैं प्रकृष्टरूप से भजता हूं । भजना, सेवना, भोगना, अनुभवना ये सब अनर्थांतर हैं । मैं चित्स्वरूप को भजता हूं, इसका भाव है कि मैं चित्स्वरूप को सेवता हूं, भजता हूं, अनुभवता हूं, अर्थात् उपयोग में मात्र शुद्ध सनातन चित्स्वरूप ही विराजा रहे ऐसी दशा में मैं होता हूं, यही वास्तविक चैतन्य महाप्रभु की उपासना है । स्वरूप में उपयोग समा जाय बस यही मात्र तो ज्ञानी का कर्तव्य है । जिसको सत्य बोध हो गया हो ऐसे पुरुष की धुन में केवल एक यही बात है कि स्वरूप में मेरा उपयोग समा जाय, और मुझे कुछ न चाहिए । कर्म के उदयवश कुछ घटनायें हों उन्हें भी भोगता हूं, किंतु शुद्ध अंतस्तत्त्व की प्रतीति उसकी धुन अकाट्य है । उसका अंतिम निर्णय है कि स्वरूप में उपयोग समाये जाने के बिना इस जीव का उद्धार नहीं है, ऐसे उद्धार के एक मात्र अवलंबनस्वरूप चित्प्रभु को मैं सेवता हूं ।


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