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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक2032

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हंसालीपात लीलाढ्यचामरब्रजवीजितम् ।

वीततृष्णं जगन्नाथं वरदं विश्वरूपिणम् ।।2032।।

मूर्त काय में विराजमान प्रभु के आंतरिक गुणों का स्मरण―सिंहासन पर आरूढ़ तीन छत्र जिसके सिर पर शोभायमान हैं और जिसके चारों ओर यक्ष चमर ढोल रहे हैं, ऐसे मुद्रा मंडल में विराजमान प्रभु के गुणों का स्मरण करो । वे चमर बड़े स्वच्छ हैं और वे दुनिया को यह बता रहे हैं कि देखो जैसे कि हम भगवान के चरणों में गिरते हैं तो हम बहुत जल्दी उत्थान कर लेते हैं, चमर ढोले जाते हैं ना, इसी प्रकार तो वे चमर दुनिया को यह बताते हैं कि जो भगवान के चरणों में आयगा उसका उद्धार होगा, वह ऊँचे बढ़ेगा । इस प्रकार दुनिया को प्रभु शासन का उपदेश देते हुए ये शुद्ध चमर प्रभु के अगल-बगल ढोले जा रहे हैं । उन चमरी के बीच वे प्रभु शोभायमान हैं जिनके कोई तृष्णा नहीं रही, जगत के जो स्वामी हैं, जो कुछ भी जो चाहता है उस सबके वे देनहार हैं । देते वे किसी को कुछ नहीं हैं पर उनकी जो भक्ति करता है उसके पुण्यरस बढ़ता है और स्वयं ही उसके समस्त रस सिद्ध होते हैं । वे प्रभु विश्वरूपी हैं और अपने आपके प्रदेशों में विराजमान हैं, लेकिन उनका ज्ञान देखिये तो कितने आकारों से चित्रित है, जितना कि सारा विश्व है वह सब उनके ज्ञान में ज्ञेयाकार है तो वे विश्वरूपी बन गए हैं । ऐसे प्रभु का कहाँ ज्ञानी भक्त रूपस्थध्यान में ध्यान कर रहा है ।


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