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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1013

From जैनकोष



जगद्वंचनचातुर्यं विषयाणां न केवलम्।

नरान्नरकपाताले नेतुमप्यतिकौशलम्।।1013।।

इंद्रियजसुख का जगद्वंचनचातुर्य व नरकपातालनयनकौशल― इन इंद्रियविषयों में सारे जगत को ठगने की चतुराई है। याने जो विषयसेवन हो रहा है उस विषय की बात कह रहे हैं कि इस विषय में इस जीव को ठगने की चतुराई है, याने जो विषय सेवता है वह ठगा जाता है, वह घाटे में रहता है, बरबाद होता है, उससे हानि होती है, तो यह विषय ठग है, कहा ही है कि यह विषय ठग है, विषय चोर है, इसने समस्त जगत को ठग लिया है। यहाँ यह नहीं कह रहे कि एक पुरुष के विषय ने दूसरे पुरुष को ठग लिया, इस विषय ने सारे जगत को ठग लिया। सारा जगत विषयों को प्रिय मानता है तो विषयों ने उन सभी को ठग डाला, मिला क्या? जैसे आज ही बताओ बचपन से लेकर अब तक कितने ही सुख भोगे। काम सेवन किया, रसीले भोजन किया, खूब सुगंधित वातावरण में रहे, खूब राग भरी बातें देखी, खूब सिनेमा देखे― उन सारे सुखों को जोड़लो। जोड़ने पर नीचे क्या आयगा सो तो बताओ। देखो कैसा यह विचित्र जोड़ हैकि और संख्याओं को जोड़ों को कई गुनी संख्यायें नीचे आ जायेंगी।जैसे 20+10=30, मगर जितने इंद्रियविषयसुखभोगे उन सब इंद्रियविषय सुखों को लिखो और जोड़ लगाओ तो उसका जोड़क्या आयगा? जीरो (0)। कैसा यह गजब का जोड़है। तो बताइये इन विषयसुखों के द्वारा यह जीव ठगा गया कि नहीं? तो इन विषयों में सारे जगत को ठगने की चतुराई बसी है। इतनी ही बात नहीं किंतु मनुष्यों को नरक पाताल ले जाने की भी चतुराई इसमें है। जैसे आजकल डाकू लोग क्या करते हैं कि धन और माल भी लूटते हैं साथ ही साथ जान भी ले लेते हैं। वे डाकू ऐसा नहीं करते कि चलो धन लूट लिया तो बस काफी है, धन से अपना मतलब, पर वे धन के साथ-साथ जान भी ले लेना ठीक समझते हैं, ठीक ऐसे ही ये इंद्रियसुख इतने चतुर हैं कि ये इस संसार के समस्त प्राणियों को ठगते हैं और साथ ही नरक पाताल ले जाने की भी इनमें चतुराई है।


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