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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 102

From जैनकोष



अस्मिन् संसारकांतारे यमभोगींद्रसेविते।

पुराणपुरुषा: पूर्वमनंता: प्रलयं गता:।।102।।

इष्टवियोग के क्लेश की व्यर्थता― कालरूपी सर्पों से भरे हुए इस संसाररूपी वन में पहिले भी अनेक अनंतपुरुष, पुराणपुरुष प्रलय को प्राप्त हो गए, तब निकट भूतकाल में जो कुटुंब में अनेक लोग मृत्यु को प्राप्त हो गए उनकी शंका करना वृथा है। कोई इष्टवियोग हो जाय तो शोक तो होता है पर करीब-करीब जैसे-जैसे दिन व्यतीत होते जाते हैं वैसे ही वैसे शोक में अंतर भी दिखता है। कोई ही विचित्र व्यामोही ही ऐसा होगा जो बीसों वर्ष गुजर गए इष्ट के वियोग में फिर भी आज भी जैसे पहिले शोक किया था वैसा ही बन रहा है। करीब-करीब ऐसा होता है कि जैसे-जैसे दिन गुजरते जाते हैं, शोक भी कम होता जाता है और ज्ञानी जीवों की तो उस काल भी शोकमग्नता नहीं हुआ करती है।

निर्मोह पर इष्टवियोग की प्रतिक्रिया का अभाव― किसी सभा में रोज-रोज एक सेठ जी आया करते थे शास्त्र सुनने। एक दिन आध घंटा लेट आये तो वक्ता ने पूछा कि सेठ जी आज आपको आध घंटा देर कैसे हो गयी? सेठ धर्मात्मा था, ज्ञानी था, सम्यग्दृष्टि था। उसने कहा महाराज ! आज एक महिमान गया है सो उसकी बिदाई में आध घंटा देर हो गयी है। सभी लोग सुनकर हैरान हुए यह तो किसी महिमान के आने जाने में शास्त्रसभा में देर करके नहीं आते थे, आज कैसे एक महिमान के बिदा करने में देर करके आये? लोगों ने कहा सेठ जी से कि उस महिमान की बिदाई का टाइम बदल देते। तो सेठ बोला कि अन्य मेहमानों की बिदाई का टाइम बदला जा सकता है, पर उस महिमान की बिदाई का समय नहीं बदला जा सकता था। आखिर सब लोगों को पता पड़ गया कि इसका इकलौटा बेटा था वह गुजर गया है। तो देखो ऐसी बात थी पर उसके मुख पर विषाद की रेखा न थी। ऐसी बात में मोहीजन तो विषाद मानेंगे और यही विश्वास करेंगे कि ऐसा हो नहीं सकता कि पुत्र के गुजर जाने पर विषाद पैदा न करे। पर यह सब संभव है। जिसे केवल अपना ही स्वरूप, अपना ही शरण नजर आ रहा है और इस पर ही मेरा अधिकार है, यह मैं मुझसे कभी अलग नहीं हो सकता, प्रत्येक स्थिति में यह मैं ही उन अनेक परिस्थितियों को भोगा करता हूँ―ऐसा जिसे अपने एकत्वस्वरूप का भान हुआ है, उस पुरुष को ये संयोग वियोग ये न कुछ बातें मालूम होती हैं।

ज्ञाताद्रष्टा रहने में बुद्धिमानी― हे आत्मन् ! इस संसारवन में अनेक पुराण पुरुष बड़े-बड़े जिनका बड़ा ऐश्वर्य था वे भी बिछुड़ गए, गुजर गए तो उस ही पद्धति के अनुसार यहाँ भी कोई इष्ट गुजर गया, उसका शोक करना व्यर्थ है। ‘या घर या ही रीति है, इक आवत, एक जात।’ सब अपना-अपना हिसाब लगा लो। ये नये आये, पुराने चले गए। जिस बात पर अपना वश नहीं है, हो रहा है, पर का परिणमन है उसके ज्ञाताद्रष्टा रह सकें, ऐसा ज्ञान बनायें, साहस बनायें, यह तो बुद्धिमानी का काम, पर किसी प्रसंग में रो देना, यह तो कोई बुद्धिमानी नहीं है।




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