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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1024

From जैनकोष



त्यामेव वन्चितुं मन्ये प्रवृत्ताविषया इमे।

स्थिरीकुरु तथा चित्तं यथैतैर्न कलंक्यते।।1024।।

वंचनार्थ प्रवृत्त विषयों से चित्त को कलंकित न करने का अनुरोध― लोग सोचेंगे कि फिर ये विषय बनाये क्यों गए जब वे अच्छे नहीं हैं? ये तो भोगने के लिए ही बनाये गए सब साधन। तो उत्तर देते हैं कि वे किसलिए बनाये गए। इन विषयों का केवल एक ही प्रोग्राम है, अधिक नहीं। ये विषय मानो ठगने के लिए ही बनाये गए, और इनका कोई दूसरा प्रयोजन नहीं। जब जिसका प्रकरण हो तब उसकी बात कही जाती है। ये विषय जो प्रवृत्त हो रहे हैं ये तुमको ठगने के लिए ही प्रवृत्त हो रहे हैं। अत: तू अपने चित्त को स्थिर कर और ऐसा स्थिर कर कि जिस प्रकार उन विषयों से कलंकित न हो सके, ऐसा चित्त को बना। जैसे युद्ध के खतरे में लाइट बंद कर दी जाती है जिसे कहते हैं ब्लेक आउट कर देना। अब सरकार ने ब्लेक आउट कर दिया, सूचना कर दिया, अब लोग स्वयं सावधान हो जावें, गुप्त हो जावें, यह उनका काम है। ऐसे ही आचार्य महाराज ने तो सूचना दे दी कि यहाँ बड़ा खतरा है, ये विषय तेरे को ठगने के लिए प्रवृत्त होते हैं, इसी हेतु ये तेरे पर आक्रमण कर रहे हैं। अब उससे हम लोग सावधान हो जावें और ऐसा सावधान हो जावें कि ये विषय हमें कलंकित न करें। जैसे एक जगह कहा है कि देखो यह जो शरीर बना है इसमें हाड़, माँस, विष्टा , पसीना, रोम आदिक कितनी ही अपवित्र चीजें भरी हैं। तो ऐसा यह अपवित्र देह किसलिए बनाया गया कि उसे इस शरीर से वैराग्य हो जाय। और, एक वैराग्य के ढंग से शरीर को देखें तो हर जगह आपको वही झलक मिलेगी। पहिले तो इस नाक में ही देख लो नाक में दो द्वार मल बहाने के लिए हमेशा तैयार हैं। नाक में जरा थोड़ा आगे ही तो मल नहीं है, भीतर तो वही भरा हुआ है।जितनी अपवित्र चीजों की अधिक संख्या है वह सब मुख में है। हाथ पैरों में भी हड्डी, खून, मज्जा, चाम आदिक हैं, इतनी चीजें तो मुख में हैं ही मगर थूक, कफ, नाक, कीचड़, कान का कनेऊ आदि कितने ही मल और भी इस मुख में हैं। तो यह शरीर बना है वैराग्य के लिए, मगर मोह में अंध पुरुष इतने अपवित्र शरीर को भी राग का आश्रय कर लेता है। इसी तरह यहाँभी देखिये कि यह विषय प्रवृत्ति हो रही है आत्मा को ठगने के लिए, लेकिन ठगने के लिए सामने उपस्थित हुए इन विषयों में यह मोहांध पुरुष प्रीति ही करता है। तो हे आत्मन् ! तू ऐसा सावधान बन, चित्त को ऐसा स्थिर कर, विवेक को ऐसा युक्त बना कि ये विषय तुझे कलंकित न कर सकें।


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