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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1029

From जैनकोष



इदमिह विषयोत्थं यत्सुखं तद्धि दु:खं, व्यसनविपिनबीजं तीव्रसंतापविद्धम्।

कटुतरपरिपाकं निंदितं ज्ञानवृद्धै:, परिहर किमिहान्यैर्धूर्तवाचां प्रपंचै:।।1029।।

निंदित कटुपरिपाक विषयों के परिहार का आदेश― हे आत्मन् ! जो ज्ञान में वृद्ध हैं, तत्त्वज्ञानी पुरुष हैं उन्होंने इस विषय को तो बड़ी निंदा दी। जिस विषय में तुम रुचि पूर्वक जाते हो, उस विषय की यथार्थता ज्ञानवृद्ध पुरुष ने बतायी है। वह क्या यथार्थता है? देखो जो यह विषयों से उत्पन्न हुआ सुख है वह तो दु:ख ही है। जिस समय सुख भोगने की भावना होती उसी समय से खलबल है। जब साधन मिले तो वहाँ भी खलबल है। प्रारंभ से लेकर अंत तक इन इंद्रियविषयों में दु:ख ही दु:ख बसा है, पर मोही जीव के इसकी कहाँसुध है? उसे तो दु:ख ही दु:ख लगते हैं। जैसे तेज लालमिर्च खाने वाले लोग सी सी भी करते जाते, आँखों से आँसू भी बहाते जाते, दु:खी भी होते जाते फिर भी कहते कि मुझे लालमिर्च और दे दो। भला बतलाओ, उस लालमिर्च के खाने में तुरंत ही दु:खी होते, जीभ जलती, खराब डकारें आती और आगे भी वह नुकसान करता है। फिर भी लोग कहते हैं कि मुझे लालमिर्च और दीजिए यह एक मोटे दृष्टांत की बात कहीं है। ऐसे ही इंद्रियसुख में प्रारंभ से अंत तक दु:ख ही दु:ख है, लेकिन मोहीजन कहाँसमझते? ज्ञानवृद्ध पुरुषों ने बताया है कि जो इंद्रिय से उत्पन्न हुआ सुख है वह दु:ख ही है। दूसरा ऐब देखो यह इंद्रियसुख विपत्तिरूप जंगल का बीज है याने इससे व्यसन आते हैं, विपत्ति आती है, आदत खराब बनती है, पाप होना और व्यसन होना, इनमें यही तो अंतर है। जैसे किसी से हिंसा पाप हो गया और एक हिंसा का व्यसन लग गया, शिकार खेलना।एक तो झूठ का पाप लग गया और एक झूठ का व्यसन लग गया। एक तो चोरी का पाप लग गया और एक चोरी का व्यसन हो गया। एक तो कुशील का पाप लग गया और एक पर स्त्री, वेश्या आदिक का व्यसन हो गया, आदत बन गई। तो जो विपत्तियों का साधन बन जाय वह व्यसन है, यह विषय सुख विपत्तियों का बीज है। तीसरी बात कह रहे हैं कि यह विषयसुख तीव्र संतान से बीधा हुआ है। जैसे खाज खुजाने में संताप से विद्ध है वह सुख इसी प्रकार यह इंद्रियजंय सुख सारे संतापों से विधा हुआ हैं। चौथी बात कह रहे हैं कि इसका परिपाक कटुतर है। कटुक से भी अधिक कटुक। इस प्रकार से तत्त्वज्ञानी जनों ने विषयसुखों को निंदनीय बताया है। सो हे आत्मन् ! तू इन विषयसुखों का परिहार कर।जो और लोग हैं, धूर्तवचन बोलने वाले जन हैं उनके प्रपंचों में, माया जाल में मत फँस।


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