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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1032

From जैनकोष



भृंगा गंधोद्धताशा: प्रलयमुपगता गीतलोला: कुरंगा:

कालव्यालेन दष्टास्तदपि तनुभूतामिंद्रियार्थेषु राग:।।1032।।

एक-एक इंद्रिय के वशी जीवों का मरण व व्यसनसंपात―इस छंद में यह बतला रहे हैं कि संसार के जीव विषयों की आशा से बंधकर मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। देखो रसना इंद्रिय के वश होकर यह मछली अपने गले को छिदाकर मृत्यु को प्राप्त हो जाती है। ढीमर लोग मछली पकड़ने के लिए एक लकड़ी में लंबा सूत बाँध देते हैं। उस सूत में अंत के छोर में एक नुकीला टेढ़ा तार बाँध देते हैं और उस तार में केचुवा वगैरह का माँसपिंड फँसा देते हैं। उस माँसपिंड के लोभ में आकर मछली उसे निगल जाती है और उस नुकीले तिरछे तार में उस मछली का कंठ फँस जाता है। वह मछली मरण को प्राप्त हो जाती है। यह तो है रसना इंद्रिय की बात। अब स्पर्शन इंद्रिय के वश की बात देखिये― हाथी पकड़ने वाले लोग क्या करते है कि जंगल में एक बड़ा गड्ढा बनाते हैं। उसको ठीक हथिनी के रंगों से रंगकर सजाते हैं। और कुछ दूरी पर उस ओर दौड़ताहुआ एक झूठा हाथी बनाते हैं। अब होता क्या है कि जंगल का हाथी उस हथिनी के राग में आकर उसके पास आता हे और उस दूर बने हुए उस नकली हाथी को देखकर उसे द्वेष जगता है, कि मैं इससे पहिले पहुँचूँ। तो वह हाथी बड़ी तेजी से उस झूठी हथिनी के पास दौड़कर आता है। और उसी गड्ढे में गिरकर शिकारियों के चंगुल में फँस जाता है। कई दिनों के बाद जब वह हाथी भूख प्यास से शिथिल हो जाता है तो शिकारी लोग उसके मस्तक पर चढ़कर उसे त्रिशूल द्वारा वश कर लेते हैं। देखिये इस स्पर्शन इंद्रिय के दृष्टांत में तीन बातें आयी। मोह, राग और द्वेष। मोह में तो उसे उस गड्ढे का कुछ भी परिचय न रहा, राग था उस हथिनी का और द्वेष था उसे झूठे हाथी का। तो ये इंद्रियविषय ऐसे हैं। नेत्रेंद्रिय के विषय में लीन होकर ये पतिंगे (छोटे-छोटे मच्छर) द्वीप की ज्वाला में जलकर मरण को प्राप्त हो जाते हैं। पतिंगों के आँखें होती हैं। बहुत से मरे हुए पतिंगों को वे देखते तो होंगे और यह भी जानते तो होंगे कि ये हमारी बिरादरी के ही सब पड़े हैं। चाहे उसका कुछ विवेक न कर सकें मगर जानकारी उनको सब रहती है और फिर भी वे उस दीप की ज्वाला में आकर मर जाते हैं। घ्राणेंद्रियके विषय के वश होकर भँवरा कमल में ही दबा-दबा मर जाता है। कमल का फूल रात्रि को बंद हो जाता है, दिन में प्रफुल्लित हो जाता है। शाम के समय कोर्इ भँवरा कमल की सुगंध के लोभ से बैठ गया, सुगंध लेने लगा, इतने में कमल बंद हो गया, अब भँवरा क्या करे, बंधन में फँस गया। कला तो है उसमें ऐसी कि काठ को भी छेदकर आरपार निकल जाय, लेकिन विषयों के लोभ में आकर उस भँवरे में कमल के पत्तों को छेदने की वृद्धि नहीं रहती, वही मर जाता है। कर्णेंद्रिय के विषय के वश होकर साँप पकड़े जाते हैं, मारे जाते हैं, साँप को संगीत प्रिय है, बीन बाजे का स्वर बहुत बढ़िया होता है। सपेरे ने जहाँ बीन बजाया कि सर्प निकल आता और बीन के सामने आ जाता और सपेरे के वश में हो जाता। तो यह संसारी जीव ऐसे इंद्रियों के वश होकर प्राण गँवा देता है, ऐसा हे यह विषयसुख।

विषय संस्कार से बिल्कुल मुक्त होने में धर्मलाभ―जहाँ सही श्रद्धा बनती है वहाँएक साथ ही एक बार में समस्त अनात्मतत्त्वों से मोह हट जाता है। इस सम्यक्त्वरूपी धर्म का काम ऐसा ही है। धीरे-धीरे कोई सोचे कि हम घर में अकेले हैं, पुरुष है, स्त्री है, खूब अच्छा सब कुछ ठाटबाट है। खूब किराया आता है, खूब अच्छा-अच्छा खाते पीते हैं, दूकान धंधा भी करने की कोई जरूरत नहीं है, किसी का विकल्प वह नहीं करता है, अनेकों विकल्प हट गए तो वह कहे कि देखो मेरे को बहुत सम्यवददर्शन हो गया। अब रुपये में एक पैसा भर कमी है, क्या कि सिर्फ एक स्त्री भर का राग है, और किसी का हमें राग नहीं। भाई, बंधु, कुटुंब, देश आदि किसी का मुझे राग नहीं। तो भला बताओ क्या उसके रुपये में 99 पैसे बराबर सम्यक्त्व हो गया? सिर्फ एक पैसा बराबर ही उसके राग रह गया? अरे वह तो एक ओट है मोह की। चाहे वह पदार्थ विषयक अज्ञान हो, मोह हो वह तो सम्यक्त्व को पूरा ठगे हुए है तो ऐसे ही जब कभी धर्म के लिए अंत: प्रेरणा जगेतो ऐसा चित्त बनायें कि इस मेरे ज्ञानमात्र के सिवाय मेरा कहीं कुछ नहीं है और मुझे किसी भी अन्य वस्तु से प्रयोजन नहीं। सब भिन्न हैं, सब मेरे लिए नि:सार हैं, ऐसा एक बार भी तो इस ज्ञानमात्र स्वरूप की और आना चाहिए तब वहाँकुछ धर्म की बात बन सकेगी। जो हो रहा है ठीक है, मगर वह थोड़ा-थोड़ा।थोड़ा मंदिर में आ गए, दूकान में बैठ गए स्वाध्याय में बैठ गए तो ऐसे थोड़े-थोड़े से कुछ नहीं होता। जो वास्तविक ढंग है, करना तो चाहिए सब। जो ऐसा थोड़ा-थोड़ा करेगा उसे भी कोई क्षण ऐसा प्राप्त हो सकेगा कि जिस क्षण वह पूरा दिख रहा हो। सर्व से उपयोग हटा और एक ज्ञानमात्र स्वरूप को ही ज्ञान में ले रहा ऐसा उद्यम होना चाहिए, तो हम लोगों के जीवन में कुछ उत्कर्ष आयगा।


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