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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1041

From जैनकोष



अस्य वीर्यमहं मन्ये योगिनामप्यगोचरम्।

यत्समाधिप्रयोगेण स्फुरत्यव्याहतं क्षणे।।1041।।

आत्मवीर्य का समाधिप्रयोग से स्फुरण― मैं इस आत्मा की शक्ति को ऐसा मानता हूँकि यह योगियों के भी अगोचर है, अथवा योगीजन इस आत्मा की शक्ति का अनुभव तो कर लेते हैं मगर प्रतिपादन नहीं कर सकते। जैसे नदी का पानी अगल बगल होने पर जो कुछ रत्न कंकड़ धूल जितना जो कुछ दिखता है सब दिख तो गया, मगर उसकी गिनती कौन कर सकता है, इसी प्रकार चाहे उस आत्मशक्ति का कोई अनुभव कर ले, पर आत्मशक्ति का जैसा प्रताप है, स्वभाव है, चमत्कार है, वह वचनों द्वारा नहीं कहा जा सकता। इस आत्मा के वीर्य को योगियों के भी अगोचर बताया हे मगर समाधि के प्रयोग से निराबाध अव्याहत होकर क्षणमात्र में यह आत्मवीर्य स्फुरित हो जाता है। इस आत्मशक्ति का स्फुरण समाधि से हो जाता है। किसी परतत्त्व के प्रति किसी भी जीव के प्रति रागद्वेष की भावना न रहे तो वहाँ समाधि उत्पन्न होती है। जगत में कोर्इ भी जीव मेरा विरोधी नहीं है यहबात बिल्कुल सत्य है। न कोई प्रेमी है। कोई मेरे प्रेम को कर ही नहीं सकता, कोई विरोध को कर ही नहीं सकता, क्योंकि समस्त परजीव जो कुछ करेगा वह अपने आपमें अपनी कषायों के विकल्प करेगा। एक यह बात, और फिर दूसरी बात यह है कि कोई भी जीव मेरा विरोध नहीं करता। किंतु जो मेरे किसी भी बर्ताव के कारण वेदना उत्पन्न हुई है किसी के अथवा कोई विरोधी व्यावहारिक है तो मेरे को निमित्त करके लक्ष्य करके जो कुछ भी वेदना उसके उत्पन्न हुई है, उसका किसी में भाव बना हे तो अपनी वेदना को शांत करने के लिए वह अपनी चेष्टा करता है वह मेरा विरोध नहीं करता, अनेक दृष्टियों से इस बात को परख लें ओर आप अपने में विश्वास बना लें कि इस लोक में मेरा कोई विरोधी नहीं है। तब एक बड़ा दु:ख उत्पन्न होता है, जब चित्त में यह बात समा जायकि मेरा कोई अमुक विरोधी है और ऐसी बात आ जाने पर समता परिणाम नहीं बन सकता है। अपने आपको तो इस जगत में रहकर इस भव में आकर एक आत्मकल्याण किए जाने का ही काम पड़ा हुआ है। मुझे तो आत्महित करना है ऐसी एक धुन होना चाहिए। बाहर में कोई कर भी क्या सकेगा। जितना बाहर की ओर कल्पना से घूमेंगे उतना ही अशांति और फँसाव बढ़ता चला जायगा। तो जो आत्महित का इच्छुक है वह पुरुष प्रतीति में अपने लक्ष्य में केवल आत्महित की ही बात रखता है। यह में आत्मतत्त्व अनंतवीर्यसंपंन हूँ। जो है उसे ही निरखें, उसमें ही डूबे। उसका वीर्य अखंड हैं, अनन्य है। जहाँ अपने आपको छोड़कर किसी पर में लगने के लिए चलता है तो वहाँ उसका वीर्य खंडित होता है, बल समाप्त हो जाता है। अपने आपको अपने आपमें समा लेने के वक्त आत्मा का एक विशुद्ध बल है। और, इस बल के प्रताप से ही आत्मा समस्त झंझटों से मुक्त हो जाता है। यहाँ कितने ही विकल्प कितने ही प्रोग्राम कितने ही कार्यक्रम बनाये जाते हैं पर उनकी पूर्ति नहीं हो पाती है। इच्छा की पूर्ति तो इच्छा के अभाव से ही हुआ करती है। जब कभी कोई यह कहे कि मेरी इच्छा पूर्ण हो गयी तो उसका अर्थ यह लगा लें कि उसकी वह इच्छा समाप्त हो चुकी है, पूर्ण हो चुकी है। कहीं जैसे ट्रक में चीजें भर-भरकर ट्रक को पूरा कर दिया जाता है इस तरह से इच्छाएँभर-भरकर इच्छाओं की पूर्ति नहीं हुआ करती। इच्छा के न रहने का ही नाम इच्छा की पूर्ति है। जब किसी काम का हम विचार करते हैं और वह काम पूर्ण हो जाता हैं तो कहते हैं कि इच्छा पूर्ण हो गयी। वहाँ क्या स्थिति बनी है कि अब इस काम की इच्छा नहीं रही, उस ही को इच्छा की पूर्ति हुई ऐसा कहा जाता है। इच्छा का संग्रह करते रहने से इच्छा की पूर्ति नहीं हुआ करती। और जितने भी सुख होते हैं विकृत सुख सही, कहते तो हैं लोग यह कि मुझे इस काम के करने से सुख है पर वास्तविकता है यह कि जिस क्षण सुख हुआ उस क्षण उसके अब यह विकल्प न रहा कि मेरे करने के लिए यह काम पड़ा है। काम करने को न रहे ऐसी परिस्थिति समझ में आये तब सुख शांति प्राप्त होती है। घर गृहस्थी के कार्यों में या जितने भी चलने-फिरने आदिक के कार्य हैं, कहीं जाना है, कुछ कार्य करना हैतो वहाँ जा करके अथवा कार्य करके एक शांति मानी जाती है। वह शांति जाने के कारण नहीं होती, कार्य करके नहीं होती, किंतु अब मेरे करने को यह काम नहीं रहा ऐसी बात जो दृष्टि में आ गयी, चाहे इन शब्दों में वह न कहे पर वह सुख शांति इस ही कृतकृत्यता की है, अर्थात् मेरे करने को कुछ नहीं रहा, इस भाव से वहाँ शांति है। यहाँ मोहीजन कार्य के बनने पर यह भाव ला पाते हैं कि अब मेरे करने को कुछ नहीं रहा, किंतु ज्ञानीजन उस कार्य से दूर रहकर पहिले से ही ये भाव बना लेते हैं कि मेरे करने को कुछ नहीं रहा, ऐसा जो एक कृतकृत्यता जैसा भाव बनता है उसका वह आनंद है।

सम्यग्ज्ञान का प्रताप― अब इस सम्यग्ज्ञान का प्रताप देखिये जहाँवस्तुओं को उनके स्वरूप में देखा― प्रत्येक पदार्थ अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से सत् हैं इसका अर्थ क्या है कि प्रत्येक पदार्थ अपने गुणपर्यायों के ही पिंडरूप हैं। प्रत्येक पदार्थ का द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव उनका उनमें ही हैं। वे अपने ही प्रदेश से हैं पर के प्रदेश से नहीं हैं, दूसरे की बोडी लेकर नहीं किंतु स्वयं से जो कुछ है उससे ही प्रत्येक पदार्थ रचा हुआ है। तो उसमें यह भाव आ गया कि किसी भी पदार्थ में किसी दूसरे के किये से कुछ होता नहीं है। मेरे किये से पर में कुछ होता नहीं। यद्यपि विषम कार्यों में निमित्तनैमित्तिक संबंध है और किसी अनुकूल निमित्त को पाकर उपादान अपने आपमें ऐसा प्रभाव बना लेता है कि विभावपरिणमनों को कर लेता है इतने पर भी प्रत्येक पदार्थ स्वकाल से ही हैं परकाल से नहीं हैं इसका भाव चित्त में लायें तो वहाँ उसे स्वतंत्रता नजर आयगी। यों ही प्रत्येक पदार्थ अपने भाव से हैं, अपनी शक्ति से हैं, अपने गुण से हैं, पर की शक्ति से नहीं है, जहाँइस प्रकार स्वपर का बोध हुआ वहाँ कृतकृत्यता का भाव आ जाता है। मेरे करने को बाहर में कुछ नहीं पड़ा है। चाहे ज्ञानी किसी गृहस्थी जैसी स्थिति में अनेक व्यवहार करते हैं, पर वह यथार्थ प्रतीति से चलित नहीं होता। मेरे करने को बाहर में कुछ यों नहीं पड़ा है कि मेरे द्वारा किसी अन्य पदार्थों में कुछ किया नहीं जा सकता क्योंकि वस्तुस्वरूप सबका उनका उनमें ही है। ऐसा बोध करने से एक कृतकृत्यता की प्रतीति जम जाती है सम्यग्ज्ञान ऐसा अद्भुत बल है सम्यग्दृष्टि को ज्ञानी को कि वह निराकुल रहा करता है। भले ही कुछ परिस्थितिवश संबंध में चूँकि गृहस्थी में रह रहा है तो कुछ आकुलता हो जाती है, परंतु अंतरंग में प्रतीति में वह आकुलता यों नहीं मूल में रख रहा कि उसे सब बोध है। जैसे भावनाओं में अनित्यभावना है, अनित्यभावना में यह बताया गया कि प्रत्येक पदार्थ विनाशीक है। कोई इस बात को न समझे और याने कि मेरा घर, मेरे परिजन, मेरे मित्र, मेरा वैभव ये कहाँविनाशीक हैं औरों के विनाशीक होंगे, इस तरह की उल्टी समझ रखी तो जब तक संयोग है तब तक भी उसके ख्याल से क्लेश होता है और जब वियोग होगा तब उसे अत्यंत अधिक क्लेश होगा। और, कोई पहिले से ही यह विचार ले कि ये समागम जो कुछ मिले हैं ये सब विनाशीक हैं। सबका वियोग होगा, सब मायारूप हैं। तो जब तक संयोग है तब तक भी यह विह्वल न रहेगा और जब उनका वियोग होगा तब तक तो ख्याल करेगा कि देखो जो हम जानते थे वही तो अब हो गया। उसे वहाँ विह्वलता नहीं आती। जो पदार्थ जैसा है उसे वैसा समझ लेने पर अंतरंग में क्षोभ उत्पन्न नहीं होता। उसके विपरीत बुद्धि बनाने पर क्षोभ बना रहा करता हैअशरण भावना में जैसे सोचा जा रहा है कि मेरे लिए यहाँ अन्य कोई भी शरण नहीं है, इसके विपरीत यदि यह बुद्धि रखी जाय कि मेरे लिए मेरा पिता शरण, माँ शरण, स्त्री शरण, पुत्र शरण तो जब तक इनका संयोग है तब तक ऐसी-ऐसी बीच में घटनाएँघटेगी कि यह क्लेश मानेगा और जब कोई विपत्ति आती है, मरणकाल आता है तब शरण नहीं दिख पाता तो वह अत्यंत क्लेश करता है। यदि पहिले से ही मान लें कि मेरे लिए ये कोई शरण नहीं हैं तो जब तक संबंध है, संपर्क है तब तक भी उसमें विह्वलता न जगेगी।

सम्यग्ज्ञान में ही कल्याण― जो पदार्थ जैसा है उस पदार्थ को वैसा मान लेने में ही भलाई है। प्रत्येक पदार्थ अपना-अपना न्यारा-न्यारा स्वरूप रखते हैं। यह इतना अभेद्य दुर्ग है कि किसी वस्तु में किसी अन्य वस्तु के किसी अंश का द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव का प्रवेश नहीं हो सकता है। ऐसे अभेद्य प्रत्येक पदार्थ जो निरखने में आ रहे हैं उस ज्ञानी पुरुष को अपने आपमें कृतकृत्यता जैसी प्रतीति है। प्रतीति में यह समझिये कि वह यह संतोष किए हुए है कि मेरे करने को बाहर में कुछ नहीं पड़ा है। कुछ पड़ा है करने को इस बुद्धि में बड़ी हैरानी आया करती है। चाहे वह किसी संबंध की बात मन में हो और कुछ पड़ा है मेरे करने को ऐसा अभिप्राय रहे तो मरण समय में समाधि नहीं बनती है। अथवा समाधि का पात्र वही है जो अभी से यह बात समझता रहे कि मेरे करने को लोक में कुछ पड़ा नहीं है। लोक है, उत्पाद व्यय ध्रौव्य युक्त है। प्रत्येक पदार्थ का हो रहा है परिणमन। मेरे करने को यहाँ कहीं कुछ नहीं पड़ा है। यदि मेरे करने को कुछ पड़ा है ऐसी बुद्धि बनी है तो समझ लो कि वह अपना मरण बिगाड़ रहा है, समाधि बिगाड़ रहा है। उसके समता नहीं जग सकती है। तो ऐसी कृतकृत्यता का अभिप्राय देने वाला यह वस्तु विज्ञान है। इससे अपने आत्मा का बल प्रभाव गुण ये सब निरखे जा रहे हैं। मैं बाहर में कुछ खोजूँ तब मेरे में कुछ नहीं होता। यदि मेरे में आनंद ज्ञान कुछ नहीं है तो बाहर में खोजने पर भी न मिलेगा। और मेरे स्वरूप में है तब बाहर में खोजने की आवश्यकता क्या है? बल्कि यहाँ तो बाहर में कुछ खोजने का श्रम किया जाय तो अपने आपमें बसे हुए इस ज्ञान और आनंद के विकास का लाभ नहीं रहता। तो आत्मा के गुणों को निहारकर अन्य का आलंबन त्यागना चाहिए और अपने आत्मा के गुणों पर दृष्टि रखकर अपना आत्महित कर लेना चाहिए।


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