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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1056

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तदस्यकर्तुजगदह् निलीनं तिरोहिताऽस्ते सहजैव शक्ति:।

प्रोघितस्तां समभिव्यनक्ति प्रसह्य विज्ञानमय: प्रदीप:।।1056।।

आत्मा का अतुल प्रताप व उसके विकास व अविकास का हेतु― इस समस्त विश्व को अपने प्रभाव में अपने ज्ञान में लीन कर लेने का सामर्थ्य इस आत्मा में है परंतु कर्मों से आच्छादित होने के कारण वह शक्ति तिरोहित हो गयी है। जैसे कहते हैं ना कि एक म्यान में दो तलवार नहीं समा सकती हैं, इस ही प्रकार एक उपयोग में विशुद्ध ज्ञानानंद, संपूर्ण ज्ञानानंद तथा जगत के ये वैषयिक सुखों के विकार ये दोनों नहीं समा सकते। या तो छुटपुट मेरा तेरा सीमित ज्ञान कर ले और उस अनंत ज्ञान से हाथ धो बैठे या फिर इस छुटपुट मेरे तेरे वाले ज्ञान की उपेक्षा कर दे और अपनी ज्ञानसामर्थ्य को निरख, केवल आत्मतत्त्व को देख। फल यह होगा कि समस्त विश्व इसके ज्ञान में अवश होकर प्रतिबिंबित हो जायगा। एक उपयोग में दो बातें नहीं समा सकती कि थोड़ा पहिले जाने हुए पदार्थ का प्यार बनाये रहें और समस्त विश्व के ज्ञाता भी बन सकें। ये दो बातें आत्मा में एक साथ न बन सकेगी। किसी एक से रति रखें। या तो यहाँ के ही छुटपुट आनंद में मग्न रहें, विपदायें सहें, संसार के चक्रों में पड़े रहें या फिर अपने अनंत सामर्थ्य का चमत्कार प्रकट करें। तो इंद्रियजंय विनाशीक पराधीन असार मुसुखाभासों की प्रीति भी करते रहें और अद्भुत अनंत परम निराकुल आत्मीय आनंद भी पा लें, ये दो बातें आत्मा में एक साथ नहीं हो सकती। अपना ठीक निर्णय बना लें, या तो भोंदू भी बने रहने का प्रोग्राम बनाये जा अर्थात् इंद्रिय के विषयों में सुख मानने का, उन विषम साधनों के संचय में ही चित्त बनाये रहने का अपना प्रोग्राम बनाये रह, सुख दु:ख ये सब कुछ भोगता जा या फिर इन विनाशीक असार सुखाभासों से मुख मोड़कर परमपवित्र आनंदधाम अपने आत्मा की ओर रह और विशुद्ध आनंद का अनुभव कर। इसी प्रकार ये दो बातें भी नहीं बन सकती कि लोक में मेरी नामवरी हो, यश फैले, ये पड़ोसी देशवासी लोग मेरे गुण गायें, मुझे भला कहें, मेरा खूब नाम जाहिर हो, एक यह बात और दूसरी वह बात कि यह आत्मा अपने आपमें निर्विकल्प निस्तंरग होकर प्रसन्न रहा करे। ये दो बातें भी एक साथ न बन सकेंगी। देखो पड़ोसियों के लोगों के बारे में पड़ते रहें कि भाई मेरा नाम ले लेना और किसी को चित्त में बसाना और जनता को प्रसन्न किए रहने का उद्यम करना, यह पैरों में पड़ने से क्या कम है? इतना बड़ा विकल्प उठाना यह सबकी अपनी-अपनी तरकीब है। जब एलेक्शन होगा उस समय वोटों की प्रार्थना के लिए कोई किसी पद्धति से कोई किसी पद्धति से आखिर दीन हीन बनकर लोगों से याचना करना वह पैरों पड़ना नहीं है तो और क्या है? या तो इस ही पार रहें या आत्मीय अनंत आनंद का अनुभव करें, दोनों का अनुपात बना लें जिसमें सार दिखता हो उस कार्य को करें। बहुत समय व्यतीत हो गया, अब एक यह उपाय बनायें जिससे अपना आत्माराम अपने आपमें निर्मल बना रहे। क्रोध, मान, माया, लोभ, काम किसी भी विकार की तरंग न उठे ऐसा निर्दोष शुद्ध उपयोग बनायें। इस पुरुषार्थ के प्रताप से ही अपना कल्याण होगा। यह शिव स्वस्वरूप है, यही समग्र कल्याण है, यही परम शरण है। एकचित्त होकर हम निज अंतस्तत्त्व का अनुभवन करें। उस ही के उपाय में आगे वर्णन किया जायगा कि बाह्य में हम कैसी परिणति बनायें जिससे हम यह अपना आंतरिक सामर्थ्य प्राप्त कर सकें।


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