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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1061

From जैनकोष



लोष्ठेष्वपि यथोन्मत्त: स्वर्णबुद्ध्या प्रवर्तते।

अर्थेष्वनात्मभूतेषु स्वेच्छयायं तथाभ्रमात्।।1061।।

अज्ञ प्राणी का अनात्मभूत पदार्थों में स्वेच्छाचार प्रवर्तन― जैसे कोई पागल पुरुष पत्थर में स्वर्णबुद्धि कर ले और स्वर्ण की तरह पत्थरों के प्रति व्यवहार करे, इसी प्रकार यह आत्मा अज्ञान से अपने स्वरूप से भिन्न अन्य पदार्थों में स्वेच्छाचाररूप प्रवृत्ति करता है, रागद्वेष मोह करता है। इस आत्मा को अपने आपकी समृद्धि का, शक्ति का परिचय नहीं है, इस कारण बाहरी पदार्थों को महत्त्व देता है। बहुत वैभव हो गया तो उससे अपने को बड़ा मानता है, और है बिल्कुल भिन्न वस्तु। आत्मा में वैभव का रंच स्पर्श भी नहीं है, लेकिन मोह बुद्धि ऐसी है कि अत्यंत भिन्न असार पदार्थों में भी यह ममता रखता है। तो जैसे उन्मत्त पुरुष अपनी इच्छा से जिस चाहे प्रकार भ्रम करके मान्यता बनाता रहता है इसी प्रकार यह मोही जीव भी अपनी इच्छा से जैसा चाहे भ्रम करके अपनी मान्यता बनाता है। जितने भी अपने अंदर में विकल्प और विचार होते हैं उन विचारों में सार क्या है? कुछ भी सार नहीं मालूम होता। किस तरह का विचार कर रहे, कामकाज का या धन संचय का या किसी रिश्तेदार के संबंध में सोचने का या किसी भी प्रकार का विकल्प होना ये तो जीव में औपाधिक तरंगे हैं। तरंगे उठी और बिला गयी। आत्मा के पास कुछ नहीं रहता। विचार हुआ संबंध हो गया, पर अनर्थ और एक यह हो जाता है कि उन विचारों के कारण उन खोटे आशयों के कारण कर्मबंध हो जाता है जिसके उदयकाल में इस जीव को दु:ख भोगना पड़ता है, तो इन भिन्न पदार्थों के प्रति मोही जीव की भावना उपासना बनी रहती है, बस यही दु:ख का कारण है, इतनी सी बात न हो तो किसी प्रकार का दु:ख नहीं है। चित्त निरंतर परपदार्थों की ओरहै, अपने आत्मा की ओरदृष्टि नहीं जाती, न उत्साह होता, न मन में बात आती है कि मैं अपने आपके स्वरूप को भी पहचानूँ और इस आत्मदेव के निकट बसा करूँ। अपने आपकी सुध भूल गयी, बाहरी पदार्थों में ही इसका निरंतर चित्त बना है, तत्त्व कुछ नहीं निकलता। लगे रहे, समय बीत गया, अंत में मालूम पड़ता है कि सब धोखा ही धोखा रहा। मुझमें कोई ऐसी बात नहीं आयी जिससे अपने को कुछ भरा पूरा पाता होऊँ। जब यह जीव उन पदार्थों से उपेक्षा करे, अपनी शक्ति की सम्हाल करे तो बस पा लिया मोक्षमार्ग। परमात्मा बनने का उपाय पा लिया समझिये, अन्यथा तो यह ही भटकना रहेगी।


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