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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1066

From जैनकोष



उत्साहान्निश्चयाद्धैयत्सिंतोषात्तत्त्वउर्शनात्।

मुनेर्जनपदत्यागात् षडि्भर्योग: प्रसिद्धयति।।1066।।

योग के प्रसाधक छह उपायों की चर्चा―यहाँ वे 6 योग बतलाते हैं जिससे अध्यात्म की सिद्धि होती हैं। वे 6 क्या हैं? उत्साह, निश्चय, धैर्य, संतोष, तत्त्वदर्शन और देश का त्याग। इन 6 बातों से अध्यात्मयोग की सिद्धि बताते हैं। यद्यपि ये सब बाह्य साधन हैं, इनमें भी कुछ तत्त्व है पर इन सबकी प्रतिष्ठा तब हैजब तत्त्वज्ञान बने। उत्साह का अर्थ सब जानते हैं कि उस कार्य के लिए ध्यान के लिए एक उत्साह उमंग बनी रहना।जैसे कोई दूकान करता है तो दूकान के कार्यों में रुचि उत्साह रहता है। आज इतना लाभ हुआ है। तो जैसे अपने इस इष्ट कार्य में लोग उत्साह रखते हैं इसी तरह ज्ञानी मुमुक्षुजन अपने आत्मतत्त्व के कार्यों में उत्साह रखते हैं। हमने आज अपनी इंद्रिय पर इतनी विजय किया, हमने अपने लक्ष्य पर इतनी सफलता पायी, अब इससे और अधिक होना चाहिए, इस तरह आत्मकार्यों में उत्साह रखते हैं। इस उत्साह को योग का अंग मानते हैं। दूसरा अंग है निश्चय। किसी भी बात का दृढ़ निश्चय हो इसे हम करेंगे, करके रहेंगे, हटेंगे नहीं, इस प्रकार का निश्चय हो तो वह भी योग का अंग है। उससे भी अध्यात्मसाधना बनती है। दूसरी बात हे धैर्य। सिद्धि में विलंब हो रहा है, कुछ लाभ तुरंत नहीं मालूम पड़ रहा है पर गुरु के नियंत्रण में रहकर उन-उन विधियों की साधना की जा रही है, त्याग नियम तपश्चरण किया जा रहा है पर ?ल कुछ नहीं मिल रहा है, उस समय धैर्य रखे, कभी भी मिले अथवा मुझे फल क्या चाहिए? जो बतला रहे हैं उस साधना को करते हैं। वह साधना हमारे निर्दोष बने, ऐसा धैर्य रखे तो यह योग का अंग है। चौथी बात है संतोष। संतोष होना चाहिए, किसी बात की तृष्णा न जगे। किसी भी वस्तु के प्रति तृष्णा न जगे,तृष्णारहित संतोष वृत्ति से रहना चाहिए। 5 वीं बात हे तत्त्वदर्शन। जो वस्तु का स्वरूप है वह दृष्टि में आये इसे कहते हैं तत्त्वदर्शन। जो वस्तु का स्वरूप है वह दृष्टि में आये इसे कहते हैं तत्त्वदर्शन। जिसने जिसे तत्त्व माना है― जैन सिद्धांत ने तत्त्व मानाहै वस्तु के स्वभाव को। प्रत्येक वस्तु में उसमें उसके कारण जो स्वभाव पाया जाता हैवह उस वस्तु का तत्त्व है। उस तत्त्व का दर्शन करना यह योग का अंग है। और, छठी बात बताया है देश का त्याग। जिस गाँव में जन्मे हैं, जिस असफेर में संबंध है इस शरीर का अब जनपद का उस कस्बे का त्याग करना देशत्याग है। इसमें भी मर्म है, एक तो जिस गाँव में रह रहे हैं उसमें नुराना परिचय है। लोगों से मित्रता थी, रागी की परंपरा चल रही थी। एक तो यह बात है कि वासना मिट न पायेगी, दूसरी बात यह है कि लोगों का व्यवहार उस संन्यासी के प्रति पहिले जैसा ही रहेगा। तो उनके उस रागभरे व्यवहार से उसके चित्त में विशुद्धि नहीं जग सकती, उत्साह नहीं जग सकता। तो यह भी उसका अलाभ है, यों समझिये कि सभी उसका अलाभ हैं। जिस गाँव में जन्मे हों, रहते हों उस गाँव का त्याग करना यह योग के अंग में बताया गया है। यह सब आत्मसाधना करने वालों के लिए एक आवश्यक बात है। इस प्रकार कुछ लोग इन 6 प्रकारों से योग की साधना बताते हैं तो कोर्इ कहते हैं―


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