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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1078

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पृथक्करोति यो धीर: स्वपरावेकतां गतौ।

स चापलं निगृहणाति पूर्वमेवांतरात्मन:।।1078।।

स्वपरभेदविज्ञान का माहात्म्य― जो धीर वीर पुरुष एकत्व को प्राप्त हुए― आत्मा और शरीर आदिक वस्तुवों का पृथक-पृथक अनुभव करते हैं वे ही अंतरात्मा हैं और वे ही मन की चंचलता को रोकते हैं। यह देह और जीव इस समय एकत्व को प्राप्त हैं। बड़ा दृढ़ बंधन है। शरीर के रग-रग में आत्मप्रदेश हैं। आत्मप्रदेश सब शरीरों के एक क्षेत्रावगाह हैं ऐसे एकत्व को प्राप्त हुए हैं, फिर भी जो ज्ञानी पुरुष हैं, अंतरात्मा जन हैं, वे सब मिले हुए देह और आत्मा का पृथक कर डालते हैं, स्वरूपदृष्टि द्वारा इस शरीर का और अपने को पृथक मान लेते हैं और परिचय भी कर लेते हैं, शरीर से न्यारा अंतस्तत्त्व अनुभव भी कर लेते हैं। ये सब बातें तत्त्वज्ञान से बनती हैं और उसी तत्त्व ज्ञान से ध्यान की साधना बनती है। तो ध्यान के अंग है मुख्य आत्मविश्वास, आत्मविज्ञान और आत्मरमण। इससे अपना उद्यम किया जाय तो अपने इस दुर्लभ नरजीवन की प्राप्ति समझिये सफल हो गयी और एक अपने आपका रत्नत्रयधर्म न पाया जा सका तो जो मिला है यह सब खो दिया समझिये। जैसे कि मिला हुआ रत्न कोई समुद्र में फेंक दिया जाय। हम ज्ञानार्जन की ओरबढ़े और मोहभाव को दूर करें, यह कर्तव्य बने तो हम आप कल्याण पा सकते हैं।


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