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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1080

From जैनकोष



ध्यानशुद्धि मम:शुद्धि: करोत्येव न केवलम्।

विच्छिनत्यपि नि:शंकं कर्मजालानि देहिनाम्।।1080।।

मन:शुद्धि होने से ध्यानशुद्धि व कर्मजालछेदन―मन: मन की पवित्रता केवल ध्यान की शुद्धता को ही नहीं करती किंतु जीवों के भव-भव के बांधे गये कर्मों के समूहों को भी नष्ट कर देता है। विचार सुंदर हों, पवित्र हों, इसी के मायने है मन की शुद्धता। सब जीव सुखी हों प्रथम तो यह आशय बने तो मन की पवित्रता जगेगी। संसार के किसी भी जीव को विरोधी न समझे तो मन की पवित्रता बनेगी, विरोधी तो कोई दूसरा जीव है ही नहीं। जिन्हें हम विरोधी समझते हैं वे विरोधी नहीं हैं किंतु उन्हें स्वयं स्वार्थ लगा है, स्वयं कोई इच्छा है, कषाय है तो वे स्वयं अपनी कषायों की वेदना मेटने का यत्न कर रहे हैं। किसी भी परद्रव्य पर मेरा विरोध क्या? जगत में मेरा कोई विरोधी नहीं, सब जीव सुखी हों, इस प्रकार की भावना होना, सब जीवों के प्रति मित्रता का परिणाम रहना यही है मन की पवित्रता। जिसका मन पवित्र होता है वह गुणग्राही होता है, दोषग्राही नहीं होता, गुणियों को देखकर वह हर्ष मानता है। अहो जिस गुण के विकास का नाम मोक्ष है, परमपद है उस गुण के विकास के लिए उद्यमी महापुरुषों का समागम प्राप्त हुआ है। धन्य हैं वे गुणीजन जिनकी उपासना के प्रसाद से मेरे में भी ऐसा ही गुणविकास हो। जिनका मन पवित्र है वे गुणियों के गुण देखकर हर्ष मानते हैं। पवित्र मन वाले दुखियों के दु:ख देखकर भरसक प्रयत्न करते हैं कि इनका दु:ख दूर कर दें। दूसरों को दु:खी करने का भाव नहीं बनाते हैं। जिनका मन पवित्र है वे विपरीत बुद्धि वाले पुरुषों में अर्थात् जो रागी हैं, द्वेषी हैं, उद्दंड हैं, अपने से विपरीत भाव रखते हैं ऐसे पुरुषों को निरखकर मध्यस्थ भाव रखते हैं। तत्त्वज्ञानी पुरुष अपने ही समान जगतके समस्त जीवों में शुद्ध चैतन्यस्वरूप निरखते हैं। मेरा कोई विरोधी नहीं। सभी जीव अपना-अपना परिणमन लिए हुए हैं यों पवित्र मन वाला पुरुष अन्य जीवों को भी अपने ही स्वरूप के समान विशुद्ध चैतन्यमात्र मानता है। ऐसे पवित्र आत्मावों के जो मन की पवित्रता है उससे ध्यान भी विशुद्ध होता है, चित्त एकाग्र होता है और भव-भव के बांधे हुए कर्मजालों को भी काट देता है।


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