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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1085

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तद्ध्यानं तद्धि विज्ञानं तद्ध्येयं तत्त्वमेव वा।

येनाविद्यामतिक्रम्य मनस्तत्त्वे स्थिरीभवेत्।।1085।।

अविद्या को हटाकर तत्त्व में मन को स्थिर करने वाले योगियों के ध्यान विज्ञान की श्रेष्ठता― जिस उपाय से अविद्या दूर हो और तत्त्व में मन लगे उस ही उपाय के होने पर समझिये ध्यान ठीक बना, विज्ञान सही हुआ और ध्येय तत्त्व की प्राप्ति हुई। वह धर्म और कल्याण के लिए प्रयत्न है। उन सब उपायों में यह बात करना है कि यह मन बाहरी पदार्थों में न डोलकर केवल आत्मा के अंत तत्त्व में स्थिर हो जाय, यह बात ध्यान से बनेगी। तो ध्यान वही उत्तम है जिस विज्ञान से बनेगी तो ज्ञान एक वही उत्तम है और ध्येय तत्त्व भी यही है कि विकल्प न बने और आत्मा में निर्विकल्प स्थिति जग जाय। इसके अलावा अन्य प्रकार का कुछ भी ध्यान किया जाय वह एक संसार का ही बढ़ाने वाला है। चाहे वैभव का ध्यान हो, इज्जत का ध्यान हो, किसी भी प्रकार का ध्यान हो वह एक संसारवर्द्धक है। मात्र एक ज्ञानरूप अनुभव जगेवह ध्यान ध्यान है। ज्ञान विज्ञान भी अनेक होते हैं।ऊँचे से ऊँचे आविष्कार बड़े-बड़े संहार आविष्कार किंतु उन आविष्कारों से यह तो बतलावो कि आविष्कार करने वाले का भला हुआ या उपयोग लेने वाले का भला हुआ? सारा विश्व आविष्कार की धुन में लगाहै। इसलिए आज कोई देश आविष्कार में पिछड़ा रहे तो उसकी खैर नहीं है। इस कारण सबको करना पड़ता है पर कुछ सोचिये तो सही, न होती सारे विश्व में यह बिजली, न होते सारे विश्व में ये रेडियो सिनेमा तो क्या बिगाड़ था? अब यों बिगाड़ है कि कुछ देशों में है और कुछ में न हो तो बिगाड़ की बात आये। जो चाहे उसे दबा लेगा। रेडियो वगैरह के साधन न होने से व्यवस्था ठीक न बनेगी। रखना पड़ रहा है, पर न होता तो शांति थी क्या? शांति ही थी। बहुत बड़े-बड़े तीव्रगामी यान निकले हैं। ये न होते आज तो क्या उससे बिगाड़ का? सुधार ही था, शांति थी। लेकिन जितने-जितने ये नये ज्ञान विज्ञान चले, सो विज्ञान आविष्कार निकलने वाले ने अपना जीवन खपाया और उनके प्रयोग करने वालों की भी आदत बिगड़ी लाभ कुछ नहीं होता। करना पड़ता है, यह बात अलग है। लेकिन ज्ञान विज्ञान तो वही उत्तम है जो ज्ञान ज्ञानमय आत्मा में लीन हो जाय, निर्विकल्प बन जाय, जन्म मरण मिट जाय, ऐसा उपाय बनावें, कर्मकलंक दूर हो जायें, ऐसे निज तत्त्व का ज्ञान होना यह ज्ञान है और ध्येय भी यही है। लोक में किस पदार्थ का ध्यान करें तो मिलेगा क्या? कोई पदार्थ छूटे तो सही। लोक की इज्जत प्रतिष्ठा धन वैभव परिजन कुटुंब मित्रजन कौनसी चीज ऐसी है जिसका ध्यान किया जाय, जिसमें चित्त लगाया जाय तो आत्मा का कल्याण हो? बाहर में कोई पदार्थ ऐसा नहीं है, केवल एक आत्मा में जो आत्मा का सहज स्वभाव है वही सारभूत है। उसमें चित्त लगा तो सदा के लिए दु:ख दूर हो जाय। ये नाना प्रकार के विज्ञान और आविष्कार करके इस भव में मायामयी पुरुषों के द्वारा कुछ यश लूट लिया, पर जन्म मरण की परंपरा तो न कटेगी और जो जन्म मरण की परंपरा काट दे ऐसा कोई ध्यान करे तो लाभ में यह जीव रहा। इस कारण यह श्रद्धान में होना चाहिए कि ध्यान है तो आत्मध्यान ही श्रेष्ठ है, विज्ञान है तो आत्मविज्ञान ही श्रेष्ठ है और ध्येय तत्त्व है कौन? जिसमें कि हम निरंतर चित्त बसाये रहा करें तो वह है आत्मतत्त्व। एक आत्मा का ध्यान बने, मन की शुद्धि बने, चित्त में निरोध हो तो शांति का मार्ग पाया जा सकता है।


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