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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1088

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विभ्रमद्षियारण्ये चलच्चेत्तोवलीमुख:।

येन रुद्धो ध्रुवं सिद्धं फलं तस्यैव वांछितम्।।1088।।

चित्तनिरोधक पुरुष के ही वांछित तत्त्व की सिद्धि:― विचरने वाले विषयरूपी बनने में यह चंचल बंदर भ्रमता ही रह रहा है तो जिस पुरुष ने इसे रोका, वश किया उसको वांछित फल की सिद्धि होती है। मन का कैसा वेग है, क्षण-क्षण में कितनी छलाँग मारता है, कहाँ-कहाँ पहुँचता है और ऐसी-ऐसी कल्पनाओं में लग जाता है जिनकी पूर्ति होना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है, लेकिन यह मन न जाने कितनी कल्पनाएँ बनाता रहता है। कल्पनाओं से उठता कुछ नहीं है, परेशानी ही होती है। जितनी मन में कल्पनाएँउठाते जायें उतनी ही परेशानी बढ़ती है, पर कषायों का उदय ऐसा है कि कल्पनाएँकिए बिना इसका गुजारा ही नहीं होता। अब देख लो सभी मनुष्य हम आप देखने में बड़े अच्छे लग रहे होंगे, शांत हैं, चुपचाप हैं, बड़ी अच्छी मुद्रा लिए हुए हैं। दूसरों को देखने में ऐसा लगता है कि ये बड़े सुखी हैं, बड़े गंभीर है, बड़े स्वच्छ हैं, पर सबके चित्त में कितने विकल्पजाल उठ रहे हैं, चल रहे हैं, तो सब अपनी-अपनी जान लें। चित्त किसी एक जगह बंधा भी है क्या? किसी जगह इसने मग्न भी किया है क्या? तो सब अपनी-अपनी जान लें। चित्त केवल एक बात में ही बंध सकता है। उसके अलावा और किसी में नहीं बंध सकता। वह एक बात क्या है? अपना शाश्वत ज्ञानानंदस्वरूप। इसकी ओरचित्त चले तो कहीं बने रहें ऐसी बात संभव है। चित्त विनष्ट तो हो जायगा, किंतु चंचल न रहेगा, पर अन्य पदार्थों में चित्त चले और वहाँ बने रहें यह संभव नहीं है, क्योंकि जिस पदार्थ में चित्त लगाया वह पदार्थ विनाशीक है, उसका संयोग वियोग उस पदार्थ के कारण है। यहाँ हम चित्त देते हैं तो जैसा चित्त चाहता है वैसा उस पदार्थ का होना तो संभव नहीं है तब यह चित्त दु:खी होता है। इस चित्त का आधार मिट जाता फिर दूसरा आधार तकता, वह भी मिट जाता। बाह्य पदार्थों का आधार लगा लगाकर यह चित्त कोई विश्राम नहीं पा सकता है। केवल एक ध्रुव निज सहज स्वरूप में चित्त लगे तो इसे विश्राम मिल सकता है सिवाय इसके अन्य कुछ भी करे तो वहाँ चित्त को विश्राम नहीं मिल सकता।

चंचल चित्त को शुभोपयोगों में लगाये रहने का महत्त्व― यह चित्त बंदर की तरह चंचल है। तो जब तक नहीं मिला हमें अपने सहजस्वभाव का लक्ष्य, किंतु समझा जरूर है तब तक इस मनरूपी बंदर को चाहिए कि शुभ कार्यों में लगा रहे। परोपकार हे, देवपूजा है, गुरुसत्संग है आदिक कार्यों में इस चित्त को लगाये रहें तो यह चित्त विषयजालों में पतित तो न होगा, इसे कहते हैं शुभोपयोग। इस मन को किसी न किसी प्रकार शुभोपयोग में लगाये रहें, देवपूजा, गुरुपासना, स्वाध्याय, सत्संग, संयम, तपश्चरण आदिक में लगाये रहें ताकि यह हमारा एक मूल श्रद्धान् ज्ञान आचरण पर हमला न कर सके। एक राजा को एक देवता सिद्ध हो गया तो देव प्रत्यक्ष होकर बोलता है राजन् ! हम तुम्हें सिद्ध हो गए हैं। हम तुम्हारी सभी कामनाएँ पूरी कर देंगे, काम बतावो। यदि काम नहीं बतावोगे तो हम तुम्हें खा लेंगे। ऐसा तेज देवता सिद्ध हुआ। तो राजा ने कहा― अच्छा अमुक सड़क बना दो, क्षणभर में बना दिया।.....राजन् काम बतावो।.....अमुक जगह मकान बना दो। लो बन गया मकान। यों ही राजा जो चाहे सो तुरंत तैयार हो जाय। अब राजा सोचता है कि यह तो हम पर आफत आ गयी। यदि काम नहीं बताते हैं तो यह हमारे प्राण हर लेगा। सो एकदम उसका होनहार अच्छा था सो कुंजी मिल गयी। देव ने कहा काम बतावो तो राजा ने कहा अच्छा 50 हाथ का एक लोहे का डंडा गाड़ दो।गाड़ दिया।.....राजन् ! काम बतावो।.....एक 55 हाथ की पतली लोहे की जंजीर इस खंभे के छोर पर बाँध दो।......राजन् काम बतावो।..... इस जंजीर का एक छोर अपने गले में फाँसकर जब तक हम मना न करें इस खंभे में चढ़ो और उतरो। जब ऊपर चढ गया तो अभी नीचे उतरने का काम पडा है। लो इससे तो राजा का संकट मिट गया।बड़े आराम से रहने लगा और यह उस खंभे में चढ़े उतरे। जब चढ़ते उतरते परेशान हो गया तो राजा से हाथ जोड़कर कहता है― राजन् ! क्षमा करो। जब तुम कहोगेतब हम तुम्हारी सहायता को आ जायेंगे, हम अपनी हठ वापिस लेते हैं कि काम न बतावोगे तो हम तुम्हारे प्राण हर लेंगे। तो जैसे बंदर बनकर चढ़ाया उतराया तो उस देव से रक्षा हो गयी, ऐसे ही इस मन को शुभोपयोग में लगाते जावें, अच्छे कामों में लगायें तो यह मन परेशान न करेगा। इस मन बंदर को स्वच्छंद विचरने से रोके तो समस्त मनोवांछित कार्य हमारे सिद्ध हो सकेंगे।


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