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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1097

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शमश्रुतयमोपता जिताक्षा: शंसितव्रता:।

विदंत्यनिर्जितस्वांता: स्वस्वरूपं न योगिन:।।1097।।

शमश्रुतव्रतोपेत जितेंद्रिय योगियों द्वारा ही स्वस्वरूप का वेदन― जो योगी शमभाव शास्त्राध्ययन और यम नियम आदिक से युक्त है और जितेंद्रिय है, जिनका व्रत प्रशंसा के योग्य है वह यदि मन को न जीते हुए हो तो अपने स्वरूप को नहीं जान सकता। स्वरूप के विज्ञान में आड़ तो विषय उपयोग के हैं। साक्षात् आवरणनिमित्त की बात नहीं कह रहे। निमित्त कर्मोदय चलता है पर इस उपादान में ही इसके ही घर में आत्मविज्ञान की ओट करने वाले कौन हैं?ये विकार भाव। तो जिसका मन शुद्ध नहीं हुआ है वह पुरुष बड़े-बड़े यम नियम शीलव्रत तपश्चरण आदिक भी करे तो भी आत्मानुभव नहीं कर सकता। अब सोच लीजिये कि सरलता की कितनी कीमत है? लोग किसी को धोखे में डालकर अपने को चतुर समझते हैं―हमने देखो आज अमुक को कैसा धोखे में डाल दिया और खासकर जो रेलगाड़ी में जो बिना टिकट चलने वाले लोग हैं वे टिकटचेकर से लुक छिपकर बच आते हैं, बाद में वे बड़ा अहंकार करते हैं और यह भी कहते हैं कि देखो हमने कैसा टिकटचेकर को आज धोखा दिया है, पर भाई धोखा कोई किसी को नहीं देता है, जो सरलता के विरुद्ध भाव रखता है वह ही धोखा खाता है। स्वयं को उसने खोटे कर्मों से लिप्त कर लिया। प्रथम तो यह विश्वास होना चाहिये कि हम जो कर्तव्य करते हैं उन कर्तव्यों का फल भोगना पड़ेगा। कदाचित् इन कर्तव्यों में जितना श्रम किया है उससे कोई-कोई श्रम, कोई-कोई प्रताप यदि कुछ निर्मलता का बन जाय तो भले ही वह भोगने में न आये, अन्यरूप बन जाय, पर उसमें यों ही निर्णय रखिये कि किए हुए कर्म भोगने ही पड़ते हैं। यदि तुरंत भोग लिये जाते तो जगत में धर्म की व्यवस्था अच्छी बनती, पर पाप आज करते हैं, उसका हजारों वर्ष बाद फल मिल पाता है तो पहिले किये हुये पुण्य के उदय में आजकिए हुए खोटे भावों का फल जो नहीं मिल पाता, इससे लोक में धर्मवृत्ति की अव्यवस्था बनी हुई है। किए का फल तुरंत मिलता तो धर्म की व्यवस्था बहुत अच्छी बनती। और एक बात बिगड़ी सी रही कि जो ज्ञानी हैं, धर्मात्मा है उनको तो कुछ गलती होने पर तुरंत सा फल मिल जाता है और जो अज्ञानी हैं, मोही हैं, पापी हैं उनको पाप का फल बहुत देर में मिल पाता है। इससे भी बड़ी अव्यवस्था बनती है, मगर इसमें एक तंत है। ज्ञानी पुरुष सम्यग्दृष्टि जन चरित्रवान पुरुष यदि कोई पाप कर्म करें तो उनके कर्मों की स्थिति कम बनती है और उसका फल जल्दी मिलता है, और जो मोही हैं, पापी हैं उनको फल देर में मिलता है, मगर कर्मों की स्थिति बहुत अधिक बंधती है। तो मोही पापियों को कर्मोदय की स्थिति बहुत देर में उदय में आती है और चरित्रवान पुरुषों के कर्मोदय की स्थिति जल्दी उदय में आती है, इस कारण भी धर्म को एक अच्छी व्यवस्था नहीं बन पाती। तथ्य यह है कि जो जैसे भाव करता है उसको उस प्रकार का फल भोगना पड़ेगा। अपने को सावधान बनाना चाहिये ना, जरा से लोभ में जरा सी रति में हम अन्याय करें, अपने मन को अपवित्र बनायें तो उसका फल भी तो भोगना पड़ेगा। क्यों ऐसा अवसर दें कि हम आगामी काल में क्लेश में पड़ जायें?


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