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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1101

From जैनकोष



नि:शेषविषयोतृतीर्णं विकल्पब्रजवर्जितम्।

स्वतत्त्वैकपरं धत्ते मनीषी नियतं मन:।।1101।।

क्रियमाणमपि स्वस्थं मन: सद्योऽभिभूयते।

अनाद्युत्पन्नसंबद्धै रागादिरिपुभिर्वलात्।।1102।।

तत्वज्ञ जनों का मनोनियंत्रण― बुद्धिमान पुरुष यदि अपने को समस्त विषयों से उत्तीर्ण और विकल्पसमूहों से रहित तथा अपने अंतस्तत्त्व के ध्यान में ही लवलीन मन को बनाते हैं और आत्मस्वरूप के सम्मुख किया हुआ मन भी अनादि से उत्पन्न हुए या बंधे हुए रागादिक शत्रुवों को जबरदस्ती पीड़ित किए जाता है अर्थात् बहुत-बहुत इस मन को वश में करने का उद्यम करने पर भी ये रागादिक शत्रु फिर भी इस जीव को सताने का यत्न करते हैं। समाधि सतक में बताया है कि अनादि काल की अविद्या की वासना का ऐसा प्रभाव है कि तपश्चरण से जिन्होंने अपने आपको कुछ शुद्ध भी बनाया है, फिर भी वह वासना कुछ बार अपना राग दिखाती है। इस जगत को जीतना अर्थात् इंद्रियों का विजय करना, अपने ज्ञायकस्वरूप में विलीन करना यह एक बहुत ऊँचा पुरुषार्थ है। बहुत यम नियम संयम से रहने पर भी रागादिक विकार इसे परेशान करते हैं, अतएव रागादिक विकार कैसे जीते जायें, उन विकारों के जीतने का उपाय इस परिच्छेद में कहा जायेगा। जगत में दु:ख केवल रागभाव का है और कुछ क्लेश ही नहीं है। मनुष्यों के चित्त में कोई न कोई झंझट खड़ी हुई है, समस्या है, आपत्ति है, उल्झन है, वह सब उल्झन लोकव्यवहार में उचित सी मानी जा रही है कि ठीक ही तो है। जब घर में रह रहे हैं तो घर की व्यवस्था अच्छी बनाना कर्तव्य ही तो है। कुछ भला कर्तव्य सा जँच रहा हो लेकिन वहाँ है क्या? सब क्लेश एक रागभाव का है। न छोड़ते बने उस पदवी में यह दूसरी बात है पर रागभाव तो अपना असर दिखायेगा ही। जैसे हिंसा 4 प्रकार की बताया है― संकल्पी, उद्यमी, प्रारंभी और विरोधी। उनमें से यद्यपि गृहस्थ तीन हिंसावों का त्यागी नहीं बन पाता, केवल संकल्पी हिंसा का त्यागी रहता है तो उसके मायने यह तो न हो जायेंगे कि गृहस्थ उन तीन हिंसावों का करे तो उसका पाप न लगता होगा। जो जिस रूप परिणाम है वह परिणाम अपना प्रभाव बनाता है। इतनी बात है कि यह गृहस्थ उन तीन हिंसावों का त्यागी नहीं बन पाया। उन तीन का त्यागी बनने के बाद फिर उन हिंसावों को करता तो यह अधिक पाप माना जाता। इसमें प्रतिज्ञाभंग का दोष लगता और नियम के भंग हो जाने पर फिर वह स्वच्छंद बन जाता है। पर गृहस्थ भी जैसे परिणाम को करेगा उससे जो बंध हो सकता है वह होगा ही। इसी प्रकार किसी पदवी में कम राग परेशान करता है, कहीं बहुत ही कम राग परेशान करता है, परविकार का जो कुछ भी प्रभाव है वह सब पर होता है।

मोह में आत्महितकारी भावों की कठिनता― भैया !यों सोच लीजिए कि जिस पुरुष में जो वासना पड़ी है, जो आदत बनी है, कुछ भी भेष धर लेने पर उस आदत को कहाँ टाल दिया जायेगा? यद्यपि तत्त्वज्ञान और वैराग्य का निरंतर अभ्यास करते रहने से आदत भी पलट ही जाती है, पर प्राय: करके जो प्रकृति बन जाती है मनुष्य की जन्मत: उस प्रकृति का कुछ न कुछ अंश अंत तक चलता रहता है। तो ये रागादिक भाव साधुवों के भी उत्पन्न हों तो उनका भी वैसा ही कर्मबंध होता जैसा अन्य पुरुषों में हो सकता है। जिस जाति का राग है, जिस अनुभाग का राग है उसके अनुकूल वहाँ भी कर्मबंध होता है। जीव को केवल एक राग का क्लेश है। राग न हो, किसी बाह्यपदार्थ की धुन न हो, किसी बाह्य जीव से अपना स्नेह न लगाया हो तो उसे फिर क्या क्लेश है? क्लेश है तो वह रागभाव का है। सभी के क्लेशों की कहानी सुन लो, अंत में आप यही पायेंगे कि इसे किसी परपदार्थ में राग है जिसके कारण इसे क्लेश हैं, कोई बूढ़ा अपने पौत्रों के द्वारा सताया जाता है, पौत्र लोग मारते भी हैं उस बूढ़े की मूंछ पटाते हैं, उससे वह बूढ़ा परेशान होता जाता है। उसी समय निकला कोई साधु। पूछा कि क्यों तुम दु:खी हो रहे हो? उस बूढ़े ने बताया कि हमें ये पौत्र बहुत परेशान कर रहे हैं। तो उस साधु ने कहा कि हम कहो तुम्हारी इस परेशानी को दूर कर दें। तो वह बूढ़ा कहता है हाँ महाराज अगर हमारा यह दु:ख दूर कर दो तो यह आपकी हम पर बड़ी कृपा होगी। बूढ़ा सोचता था कि यह साधु महाराज कोई ऐसा मंत्र पढ़ देंगे कि ये सारे पौत्र हमारे आगे सिर नवाये खड़े रहा करेंगे। पर साधु ने कहा कि तुम अपना घर छोड़कर हमारे साथ चलो तो तुम्हारे ये सारे दु:ख दूर हो जायेंगे। तो वह बूढ़ा झुंझलाकर कह उठता है कि महाराज ये बच्चे चाहे मुझे मारें चाहे जो करें। फिर भी हम इनके बब्बा तो मिट जायेंगेऔर हमारे पोते तो न मिट जायेंगे। आप कौन बीच में दलाली करने आ गए? तो जिनसे क्लेश मिलता है उनमें ही रमते जाते हैं, दु:खी होते जाते हैं, मोह में ऐसी ही स्थिति होती है। मोह से ही तो क्लेश उत्पन्न होता है और क्लेश को मिटाने का उपाय भी यह मोह ही करता है। किसी वस्तु के राग से कोई वेदना उत्पन्न हो, क्लेश उत्पन्न हो तो यह उस क्लेश को मिटाने के लिए फिर राग की ही बात सोचता है और यह यत्न करता है। जैसे खून का दाग कोई कपड़े में लगा हो और उसे कोई खून से ही धोवें तो क्या वह खून का दाग छूट जायेगा?नहीं छूट सकता। इसी प्रकार जिस बात से क्लेश मिलता हैउस ही बात से क्लेश मिटाना चाहें तो वह क्लेश नहीं मिट सकता है। सुख शांति के मार्ग में लगाना है तो रागादिक विकारों को हटाना होगा। राग का प्रवर्तन करना, काम करना हे तो आसान काम पर राग का परिहार करना मुश्किल काम है और एक अपने स्वभाव की ओरसे देखो तो राग से अलग बना रहना यह तो है आसान काम और किसी बाह्य पदार्थ में राग बनाना यह है बड़ा कठिन काम। उसके लिए कितनी ही अपेक्षा चाहिए, उस प्रकार का उदय हो, उस प्रकार के साधन हों तो राग किया जा सकता है, और रागरहित केवल ज्ञानमात्र केवल अपने आपको प्रवर्ताने में किसी को अपेक्षा नहीं करनी होती। लेकिन जब मोह ज्वर लगा है उसका बड़ा संताप चल रहा है तो इसे राग की बात तो आसान मालूम होती है और रागरहित ज्ञानमात्र का अनुभव करने की बात अधिक मालूम होती है।

राग को निर्मूल कर देने पर ही शांति का लाभ― भैया ! नि:संदेह यह निर्णय कर लीजिए― यों समझिये जैसे वज्र पर लिखा हुआ वाक्य हो। यदि परम शांति चाहिए तो राग को समूल नष्ट करना होगा, दूसरा और कोई उपाय नहीं है अपने आपको उत्कृष्ट शांति में ले जाने का। अब जितनी देर करें उतना ही संसार में रुलेंगे। जो कार्य करने का है वह कार्य यदि शीघ्र कर लिया तो शीघ्र नफा पायेंगे और देर में किया जाय तो देर में नफा पायेंगे, उतने समय तक और रुलना पड़ेगा। तो निर्णय एक ही रखिये― सारे राग हमारी बरबादी के साधन हैं, कोई भी राग मेरा हितस्वरूप नहीं है। केवल उन रागों में ऐसा तार्तम्य हो जाता है कि जिससे यह राग भला है यों कहने लगते हैं। जैसे कि बुखार 104 डिग्री हो और थोड़ी देर बाद 101 डिग्री रह जाय तो वह रोगी कहता है कि अब तो हमारी स्थिति अच्छी है, पर स्थिति कहाँअच्छी हैबुखार तो अब भी है लेकिन कम बुखार होने से वह आकुलता नहीं रही, अतएव वह अपने को शांत और सुखी सा अनुभव करता है। यह बात इस रोगी की है। कोई इंद्रिय विषय संबंधी राग होता हे तो उसमें बड़ी आकुलता रहती है और सधर्मीजनों की संगति में रहना, गुरुजनों के वचन सुनना यह भी राग है, लेकिन यह राग ऐसा है जैसा कि 104 डिग्री बुखार के आगे 100 डिग्री रह जाय तो इस शुभ राग से यह मानते हैं कि कुछ हमारी स्थिति अच्छी है, लेकिन बुद्धिमान रोगी को 100 डिग्री बुखार में संतुष्ट न हो जाना चाहिए। उसे भी दूर करे। इस ही प्रकार किसी भी विवेकी बुद्धिमान पुरुष को इन शुभ रागों में संतुष्ट न हो जाना चाहिए। जैसे कोइ्र साधु अनशन काम-क्लेश, सर्दी-गर्मी आदिक के क्लेश सहता है। तो तपश्चरण करता है निष्कपट करता है, अपने शुद्ध विचार से करता है। उसे यश की वांछा नहीं है। उन तपश्चरणों को करके वह किसी भोग की भी वांछा नहीं रख रहा है लेकिन भेदविज्ञान नहीं है, तत्त्वज्ञान नहीं है, अपने सहजस्वरूप पर लक्ष्य नहीं पहुँचता, एक धर्ममनाय में जैसा कुछ चला आ रहा है उस तरह की वृत्ति करके अपने आपको एक कल्याणमय मानता है अर्थात् उन तपश्चरणों में संतुष्ट हो जाता है। ऐसा संतुष्ट हो जाना उसकी उन्नति में बाधा देने वाली बात है। शुभ राग में संतुष्ट न हो जाना चाहिए। राग किसी का भी हो तो उसे धुनिया की तरह मोड़ मोड़कर समूल नष्ट कर देना चाहिए। जैसे धुनिया रुई धुनता है तो वह सब तोले-तोलेभर रुई को ऐसा क्रम से धीरे-धीरे धुनता है कि सब धुन जाय, ऐसे ही इस राग को ढूँढ़-ढूँढ़कर, निहार-निहारकर तत्त्वज्ञानी पुरुष, बुद्धिमान पुरुष नष्ट कर डालता है। जब राग से रहित हो जाय, वीतराग पद प्राप्त हो तब उसके कल्याण की स्थिति समझियेगा।

शांतिधाम के दर्शन करने पर वैराग्य की सहजता―ये रागादिक दूर करने ही होंगे तब शांति का पद मिलेगा। ऐसा विचारने वाले पुरुष के वर्तमान में राग होता है तो वह भी ऐसा होता है, ऐसा निकल जाता है ऊपर ही ऊपर से जैसे कि बहुत बड़े पानी के ढेर पर मिट्टी का तेल आ जाय तो वह तेल ऊपर ही ऊपर लोटता रहता है और निकल जाता हे, भीतर प्रवेश नहीं करता, ऐसे ही ज्ञानी पुरुष में रागभाव आता है तो उन पर ऊपर ही ऊपर लोटता हुआ निकल जाता है ऐसा ही अंतर में इस सम्यग्दृष्टि का बल है। नारकी सम्यग्दृष्टि हो वह मारकाट में खुद भी लगता, दूसरों के द्वारा भी मारा कूटा जाता है इतने पर भी इतनी घोर विपत्ति पड़ने पर भी वह नारकी जीव तत्त्वज्ञानी आत्मा उससे अपने आत्मा के स्वरूप को न्यारा अनुभव करता है, जिस परिस्थितियों से यह कहा गया है कि वह सम्यग्दृष्टि नारकी भी अंतरंग में सुखरस से गटागट भरा हुआ है। तिर्यंचों में भी पशु-पक्षी संज्ञी जीव अथवा मगरमच्छ आदिक जलचर जीव जो सम्यग्दृष्टि हों वे तिर्यंच गति संबंधी नाना मौज प्राप्त कर रहे हैं। इतने पर भी वे विपदावों को अपने से न्यारा समझते हैं और मौजों से भी अपने को जुदा समझते हैं। इस कारण सम्यग्दृष्टि तिर्यंच गति के जीव भी अंत: निराकुल रहा करते हैं। ये सब उदयकृत बातें हैं। कोई किसी के आधीन बस जायें पशु और मालिक जैसा चाहे तैसा उन्हें चलाये, पीटे रखे किंतु वह यदि तत्त्वज्ञानी है, सम्यग्दृष्टि जीव है तो ऐसे क्लेशों में रहकर भी वह अंतरंग में निराकुल है। मनुष्यगति में भी अनेक तरह की घटनाएँहोती हैं। मौज को वे लोग विपदा मानते हैं जिन्होंने इस जगत के सब मायाजालों से भिन्न अपने आपके स्वरूप का निर्णय किया है। और चूँकि मनुष्यगति में संयम धारण किया जा सकता है तो यह मनुष्य सम्यग्दृष्टि जीव उस संयम की ही प्रतीक्षा किया करता है। देखिये जो समागम हैं ये सब विघट जायेंगे, ये सब छूट जायेंगे। अब इन सब समागमों की आशा बना बनाकर आयु के अंत में बुरी मौत मरे, इस तरह ये समागम छूटे। अपने जीवन में भेदविज्ञान की भावना बनाकर जो कुछ ये समागम में आये वे सब अहितरूप हैं, इनसे मेरा कल्याण नहीं है। ऐसे जीवन में भी विविक्त रहकर अपने स्वभाव में समाधिभाव रखकर मरे। छूटता हे, मगर अपनी ओरसे इन्हें छोड़ दे तो इससे मेरी कुशलता है और मरण आने पर तो छूट ही जायेगा पर ऐसे छोडने में कोई वीरता नहीं है। बड़े-बड़े पुरुष भी बस इस नियम के आगे अपने घुटने टेक देते हैं। बड़े-बड़े पहलवान हुए, जिन्हें अपने बल का बड़ा मद था, पर सबके घुटने इस नियम के आगे टिक गए। यहाँ पर एक से एक चतुर व्यक्तियों ने इस संपदा को रोकना चाहा पर रुकी नहीं, वे सब भी इस नियम के आगे झुककर चले गए। यह ही नियम, यह ही वियोग इस आत्मा की भलाई का कारण बन जाता है।

लौकिक सुखों में उन्नति का अनवकाश― देखिये जिन भवों में मौज बहुत रहता है, दु:ख आता ही नहीं, उन भवों की स्थिति देख लो क्या अच्छी है और इस मनुष्यभव में संयोग वियोग होना, धनी निर्धन होना, शरीर में रोग होना आदिक अनेक प्रकार के क्लेश चलते हैं तो ऐसे क्लेश वाले मनुष्यभव में देख लीजिए कि कितना कल्याण किया जा सकता है? देवगति के जीव जो देव जन्म से लेकर अंत तक बड़ी मौज में रहते हैं, अपने नाना शरीर बना लें, जैसा चाहे रूप बना लें, भूख प्यास की भी वेदना नहीं होती, बहुत-बहुत मौज में हैं, सुखियापन में हैं लेकिन वे देव अंत में मरते ही तो हैं। लोग कहते हैं कि इस मनुष्य का आखिरी कल्याण बैकुंठ है, वह बैकुंठ है क्या? नवग्रैवेयक अधिक से अधिक और वे बैकुंठ से वापिस होना मानते हैं। चिरकाल तक रहता है अंत में उसका भी अंत होता है और फिर नीचे इसे जन्म लेना पड़ता है, इसका बैकुंठ है। यों समझिये कि लोक का नक्शा पुरुषाकार है। और उस नक्शे में जो कंठ की जगह है वह है ग्रैवेयक। ग्रैवेयक का भी वही अर्थ है जो बैकुंठ का है। ग्रीवा मायने भी कंठ का है, ग्रीवा से ग्रैवेयक बना। तो बैकुंठ तक भी हो आया, और चिरकाल तक इसने बहुत मौज भी माना। जहाँशुक्ल लेश्या है, जहाँकोई विपत्ति नहीं है, रागद्वेषादिक जहाँ अत्यंत मंद हैं, ऐसी स्थिति के पाने के बाद भी देव को मरने के बाद फिर देवगति नहीं मिलती? उन्हें यहाँ अशुद्ध शरीर में ही जन्म लेना पड़ता है। लेकिन ऐसी ऊँची जगह तक पहुँचते हुए और स्वर्गों के जीव या मनुष्य या तिर्यंच की पर्याय में जन्म लेना पड़ता है। देव में मरने के बाद फिर देवगति नहीं मिलती। जिनके भव में मौज की प्रचुरता है उनकी परिस्थिति बतायी जा रही है, वे निर्वाण प्राप्त नहीं कर सकते। मनुष्यों में भोगभूमि के मनुष्य बड़े मौज में रहते हैं। वहाँ वियोग का क्लेश नहीं, आजीविका का क्लेश नहीं लेकिन वे मनुष्य भी मर करके अथवा अंत में कोई उच्च गति को नहीं प्राप्त कर पाते। अधिक से अधिक दूसरे स्वर्ग तक ही तो उत्पन्न होते हैं। तो जिन भवों में मौज है वे अपनी प्रगति नहीं कर पाते और यहाँ कर्मभूमि के मनुष्यों में वियोग के क्लेश, शारीरिक रोग आदिक के क्लेश, कितने क्लेश हैं, ऐसे क्लेश वाले भव में रहने वाले मनुष्य ऐसा उत्कृष्ट वैराग्य प्राप्त कर लेते हैं कि वे निर्वाण को भी प्राप्त हो जाते हैं। एक भव की एक साधारण बात कही जा रही है। तो सम्यग्दृष्टि मनुष्य विपदावों से घबड़ाता नहीं, वह अकंप अपने ज्ञानस्वभाव को निहारता रहता है और मौजों में आसक्त नहीं होता। उन मौजों में भी निराकुल अपना ज्ञानस्वरूप प्रतीति में रखता है। तो सम्यग्दृष्टि पुरुष, तत्त्वज्ञानी पुरुष उन पर रागादिक भी गुजरें तब भी वे उन रागादिक विकारों से भिन्न अपने स्वरूप की बराबर प्रतीति बनाये रहते हैं। यह भी एक बड़ा पुरुषार्थ है और रागादिक गुजरें ही नहीं, दूर हो जायें तो यह ऊँचा ही पुरुषार्थ हैं। रागादिक का समूल नष्ट हो जाना यह ही परमशांति का उपाय है, उसका उपाय अब ही से बनाना चाहिए जिससे ये रागादिक क्षीण हो जायें। ये सारे समागम तो छूटेंगे हीं, इनको पहिले से हीछूटा हुआ अनुभव कर लें तो ये एकदम समूल भी नष्ट हो जाया करते हैं।


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