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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1111

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मोहपंके परिक्षीणे प्रशांते रागविभ्रमे।

पश्यंति यमिन: स्वस्मिन् स्वरूपं परमात्मन:।।1111।।

मोहक्षय व रागप्रशांति होने पर ही स्वरूप का दर्शन:― मोहरूपी कीचड़ के नष्ट हो जाने पर और रागबिंब की शांति हो जाने पर संयमी जन अपने आपमें परमात्मा का स्वरूप निहारते हैं। जब तक किसी परभाव में अहंबुद्धि लगी है तब तक परमात्मस्वरूप कभी नजर नहीं आ सकता। अहंकार भाव लगा रहे तो वहाँ परमात्मतत्त्व नहीं स्फुरित होता। जो मैं हूँ उस ही में उस ‘मैं’ का अनुभव हो तो परमात्मतत्त्व का दर्शन होता है। अब परवस्तु में अहंबुद्धि कोई बनाये तो वहाँ प्रभु के दर्शन नहीं हो सकते। समवशरण में भी कोई जाकर देखे तो इन आँखों से भगवान के दर्शन न होंगे। दिख तो जायेगा दिव्य और अरहंत भगवान का वह परमोदारिक देह, पर जो देखा है वह भगवान नहीं है, वह तो एक दिव्य देह है। हम आपका जरा देह घिनावना है उनका कुछ पवित्र हो गया। पर जो आँखों से दिखा वह भगवान नहीं है। भगवान का स्वरूप मिल तो जायगा। पर चर्मचक्षुवों की अपेक्षा न रखकर ज्ञाननेत्र से तका जाय वह जो रागद्वेष रहित ज्ञानानंद की मूर्ति है। वह अमूर्त विशुद्ध परमात्मतत्त्व है और बहुत ही पूर्ण ढंग से निहारने लगे परमात्मतत्त्व तो बाहर में उस देह का भी आधार नहीं बनाया। उस परमज्योति को निहारते-निहारते बाहर का आधार छूट जाय और स्वयं के ज्ञानविकासरूप वह ध्यान बनता है तो ऐसी एकरूपता हो जाने पर परमात्मतत्त्व के स्पष्ट दर्शन होते हैं। जब मोहपंक परिक्षीण हो जाय, जब रागादिक भ्रमजाल शांत हो जाय तो अपने आपमें परमात्मस्वरूप दिखता है।

अहंकार में प्रभु का अदर्शन― एक कहावत प्रसिद्ध हे कि नाक की ओट में प्रभु छिप जाते हैं, प्रभु का दर्शन नहीं होता है। कोई था नकटा तो उसे लोग चिढ़ायें। सोचा कि कोई उपाय करना चाहिए जिससे लोग चिढ़ायें नहीं। एक उपाय सूझ गया। जब किसी ने उसे नकटा कहकर चिढ़ाया तो वह नकटा कहने लगा कि तुम क्या जानो इस नकटे का स्वाद? इस नाक की ओट में प्रभु के साक्षात् दर्शन नहीं होते, नाक की ओट में भगवान छिपे रहते हैं। मुझे तो देखो साक्षात् प्रभु के दर्शन हो रहे हैं― वह हैं भगवान। उसकी बात सुनकर उस पुरुष ने भी अपनी नाक कटा डाली। जब उसे इतने पर भी प्रभु के दर्शन न हुए तो उस दूसरे नकटा ने पहिले वाले नकटे से कहा कि मुझे तो प्रभु के दर्शन नहीं होते। तो पहिले वाला नकटा कहता हैकि नाक के कटने से प्रभु के दर्शन नहीं होते। अब तो तुम नकटा हो ही गए। लोग चिढ़ावेंगे ही, इसलिए तुम सबसे यही कहो कि नाक कटा लेने से प्रभु के साक्षात् दर्शन होते हैं। वह भी यही कहने लगा। लो इसी प्रकार से सारे गाँव के लोग नकटा हो गए। अब कौन किसको चिढ़ावे? तो इस नाक की ओट में कहीं भगवान नहीं छिपे हैं। नाक मायने हैं अहंकार। लोग कहते भी हैं कि उसने अपनी नाक रख ली। यह अहंकार मिटे, रागादिक भ्रम क्षीण हो, मोह दूर हो तो योगीजन आपने आपमें परमात्मा के स्वरूप का दर्शन करते हैं। परमात्मतत्त्व के ध्यान के लिए मिलने के लिए अथवा स्वयं के परमात्मतत्त्व के विकास के लिए एक ही मार्ग है, एक ही चारा है कि रागादिक विकार दूर करें, स्नेह बढ़ाने में बनाने में तत्त्व कुछ नहीं निकलेगा। बात सबकी एक सी है। चाहे धनी हो, चाहे निर्धन हो, पंडित हो, मूर्ख हो, त्यागी हो, गृहस्थ हो सबके लिए बात एक है। जो राग करेगा सो दु:खी होगा। जैसे मनुष्य-मनुष्य जितने हैंसब एक ही ढंग से तो पैदा होते, एक ही आकार के वे बनते हैं और एक ही ढंग से मरते हैं, तो ऐसे ही दु:खी होने की भी सबकी एक प्रक्रिया है। कहीं हिंदू, मुसलमान, बौद्ध, जैन ये नाम रख लेने से उत्पन्न होने में फर्क तो न आ जायगा, ऐसे ही कहीं भेष रख लेने से या कोई पद ले लेने से इस सिद्धांत में फर्क न आ जायगा। यदि राग है तो दु:ख अवश्य होगा। सबके दु:खी होने का एक ही ढंग है। रागद्वेष मोह विकार करे तो वह दु:खी होगा। जब ये रागादिक दूर होते हैं तो शुद्ध आनंद का अनुभव होता है, परमात्मा का दर्शन होता है।


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