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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 116

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चतुर्गतिमहावर्ते दु:खवाऽवदीपिते।

भ्रमंति भविनोऽजस्रं वराका जन्मसागरे।।116।।

प्राणियों का जगत् में भ्रमण― इस संसार रूपी समुद्र में जगत् के ये प्राणी दीन और अनाथ से बनकर निरंतर भ्रमण कर रहे हैं। यह संसार समुद्र अति विषय है। चारगतिरूपी महान् इसमें भँवर पड़ी हुई हैं और दु:खरूपी बड़वानल से यह प्रज्ज्वलित है। एक यह आश्चर्य देखो कि पानी में पानी के ही कारण आग पैदा हो जाती है, जिसे बड़वानल कहते हैं। ऐसे ही यह आश्चर्य देखो कि आनंद शांति के पुंज इस आत्मा में विकल्पों की विपदाएँ पैदा हो जाती हैं। इस संसारसमुद्र में ये प्राणी दीन होकर भ्रमण कर रहे हैं। यह दीनता पंचेंद्रिय के विषयों के साधन की है। इंद्रिय के विषयों के जो वश न हो वह काहे का दीन? किसके आगे दीन बनेगा? तो ये प्राणी इस संसारसमुद्र में यों अपने नाथ की सुध भूलकर अनाथ होते हुये यत्र तत्र भटक रहे हैं। आज मनुष्य हैं, इससे पहिले और कुछ थे, फिर और कुछ थे। भिन्न-भिन्न भवों में भिन्न-भिन्न समागमों से प्यार किया। आखिर उन्हें भी छोड़ा और उस ही धुन की प्रगति में आज ये कुछ समागम मिले हैं सो यावत्काल ये समागम हैं तब तक इन्हें अपना सर्वस्व समझते हैं। यही सब कुछ है। भेदविज्ञान की भावना तक भी नहीं जगती। ये कभी मिट जायेंगे, ऐसा ख्याल भी नहीं आता। मिटते होंगे किसी और के।

पर्यायबुद्धि की बातें― किसी बच्चे से कहो, देखो यह है लड़की, तो वह कहेगा कि तू ही होगा लड़की, मैं क्यों होता? वह चूँकि लड़का है ना, इसलिये वह अपनी पर्याय से भिन्न पर्याय को तुच्छ समझता है इस दृष्टि से कह रहा है वह बालक। किसी बच्ची से कहो कि तू लड़का है, तो वह भी यही कहेगी कि तू ही होगा लड़का। में क्यों लड़का होती? उस लड़की की दृष्टि में लड़के की पर्याय तुच्छ है। क्योंकि वह है ना लड़की की पर्याय में। किसी बनिये से कहो यह है चमार, तो वह तो यही कहेगा कि तू ही होगा चमार, मैं क्यों चमार होता? वह चमार होने का निषेध करता है। हालांकि इसका निषेध करने में थोड़ा -सा यह भी धर्म का लेश हो सकता है कि मैं तो मांसाहार आदिक दोषों से रहित हूँ और यह मांसाहार वाली बात को मुझमें लपेट रहा है, पर इतनी दृष्टि बिरले की उत्पन्न होती है। एकदम सीधा निषेध तो इस कारण कर दिया जाता है कि अपनी पर्याय, अपना नाम, अपनी जाति अपने को प्रिय है। किसी चमार से कहो कि यह है बनिया, तो वह कहेगा हट मैं क्यों बनिया होता, तू ही होगा बनिया। उसकी दृष्टि में बनिया ठीक नहीं है। उसे जो पर्याय मिली है वह उस ही पर्याय में आसक्त है।

पर्यायबुद्धि की भोगों में बेसुधी― जब-जब इस भव में इस जीव को जो समागम मिला है उसे यह प्यार करता है, अचेतन हो अथवा चेतन, पर यह पता नहीं कि अनंत भवों में ऐसे-ऐसे समागम पाये, वे सब समागम छोड़ने पड़े। आज जो कुछ उपभोग में आते हैं ये सब अनंतबार भोगे जा चुके हैं। इसलिये ये जूठे हैं। जैसे एक बार खाया हुआ पदार्थ जूठा हो गया, इसी प्रकार ये भोग उपभोग के समस्त साधन जूठे हो गये है। उन जूठों को ही बार-बार भोग रहे हैं। ये संसारी प्राणी परपदार्थों में आकर्षित होकर दीन बनकर अपने नाथ की सुध भूलकर इस जन्मसागर में जो कि अति विषम है, दु:ख के बड़वानल से दह्यमान हैं ऐसे इस चतुर्गति के आवर्तों में यह डोलता रहता है।


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