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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1162

From जैनकोष



भवंत्यप्रसंनानि कश्मलान्यपि देहिनाम्।

चेतांसि योगिसंसर्गेऽगस्त्ययोगे जलानिवत्।।1162।।

जिस तरह शरद ऋतु में अगस्त तारा का संपर्क होता है उसके उदय होने पर जल निर्मल हो जाता है इसी तरह समता से भरपूर योगीश्वरों की संगति होने पर जीवों के मलिन चित्त भी प्रसन्न हो जाते हैं। जैसे जब शरद ऋतु आती है तो उससे पहिले तो वर्षा ऋतु थी, उस बरसात से जगह-जगह के जल गंदे हो गए थे। जहाँ जमीन में पोखरा से होते हैं उनका पानी पीने लायक नहीं रह जाता। गंदगी, मिट्टी उनके जल में भर जाती है। ज्यों ही क्वार कार्तिक का महीना आता है तो उनका कीचड़ नीचे बैठ जाता है और वह निर्मल हो जाता है। इसी तरह जब तक जीवों में विषयकषायों की वृत्ति बनी हुई है तब तक उनका चित्त मलिन रहता है और जैसे ही शरद ऋतु की भाँति योगीश्वरों का संबंध होता है तो उन पवित्र योगीश्वरों की संगति से मलिन भी मन पवित्र हो जाता है, उस मलिनता को त्याग देते हैं। संगति उच्च पुरुषों की हो तो चित्त में उच्च बात भी समाये और उस समय उसके फिर उच्च बात की ऐसी संतति बन सकती है कि अवनति में यह अग्रसर हो जायगा और खल दुष्ट अधीर विषयासक्त अज्ञानी पुरुषों की संगति से अज्ञानभरी बात ही बनेगी। तो जहाँ कुछ सोचा जाता है कि धर्म का परिणाम मन में क्यों नहीं आता? रोज धर्मसाधना भी करते, पूजा में भी समय देते, और और भी कार्य देखते, पर क्रोध, मान, माया, लोभ आदिक कषायें न जगें, विशुद्ध तत्त्व की दृष्टि बनी रहे ऐसी वृत्ति क्यों नहीं जग पाती?उसका कारण यह हो सकता है कि धर्मसाधना में तो हमें थोड़ी बहुत संगति भी मिली तो थोड़े समय को मिली और दूकान, व्यापार आदिक के समय किससे बातें हो रही हैं सो तो समझ लीजिए। मोही, अज्ञानी, असभ्य, देहाती कितनी-कितनी तरह के असदाचारी लोगों से बातें होती रहती हैं उनकी संगति चलती है 10-12 घंटे और शेष समय में कुछ घर वालों का, मित्रजनों का संग चलता है, सो वे भी मोही हैं, अविवेकी हैं, तो धर्मसाधना का हमको कितना संग मिला?वह कुछ भी सा नहीं रहता। तब जहाँ हमारी संगति अधिक लगे वहाँ का समय बढ़ जाता है― यह कमी है जिस कारण से हम प्रथम आदिक गुणों में आगे नहीं बढ़ पाते। तब क्या करना चाहिए। जान बूझकर ऐसा समय निकालना चाहिए कि उन मोहियों की वार्ता में कम से कम समय लगे और सत्संगति, स्वाध्याय में अधिक समय लगे तो धर्म का प्रभाव बन सकता है। तो ऐसा भी मलिन चित्त हो वह चित्त भी योगीश्वरों के संसर्ग में निर्मल हो जाता है, अतएव साधुसंतों की संगति का अधिक से अधिक लाभ लेना चाहिए, तभी मन विशुद्ध बनेगा जिससे आत्मध्यान की बात ठहर सकेगी और मुक्ति का मार्ग मिल सकेगा।




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