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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1177

From जैनकोष



अनादिविभ्रमोद्भूतं रागादितिमिरं धनम्।

स्फुटयत्याशु जीवस्य ध्यानार्क: प्रविजृंभित:।।1177।।

इस जीव को जितने भी क्लेश हैं वे राग से हैं। किसी भी स्थिति में किसी भी प्राणी को निरख लो राग ही उसका दु:ख है, और राग है व्यर्थ का। वैसे लगता है ऐसा कि इस बिना काम नहीं चलता तो यह राग करना ही चाहिए। यह तो अपनी ही वस्तु है, पर निश्चय से देखो तो मेरे आत्मा का तो केवल मेरा आत्मद्रव्य है, आत्मस्वरूप है जो कि ज्ञान और आनंदमय है, अमूर्तिक है इतना ही मात्र मैं हूँ और जो कुछ इसमें शक्ति है परिणमन है वही मेरी शक्ति है और परिणति है, इसके अतिरिक्त बाहर में अन्य कुछ तो मेरा नहीं है। सभी के मन में कोई न कोई कल्पनाएँ बनी हुई हैं और उन कल्पनाओं से क्लेश भोगते रहते हैं। तो वह राग अंधकार कहलाता है। उसे अंधेरे में अपना शरीर भी नहीं दिखता है ऐसे ही रागभाव में अपने आत्मस्वरूप का अनुभव नहीं रहता है। इस कारण राग को अंधेर खाता कहा है। जितना जो कुछ किया जा रहा है रागवश वे सब व्यर्थ की बातें हैं।कह रहे हैं उदय है, ऐसी परिस्थिति है किंतु हे सब व्यर्थ की बात, उससे आत्मा का लाभ कुछ नहीं है। यह अँधेरा इस जीव पर लगा क्यों है? अनादि काल से इसके भ्रम बना हुआ है, अज्ञान बना हुआ है, अपने आपके स्वरूप का भान नहीं हो सका है, मैं आत्मा हूँ, ज्ञानानंद स्वरूप, सर्व से विविक्त ज्ञानानंद स्वभावी अमूर्त आत्मा हूँ, जो कुछ करता हूँ सो अपने आपके ही प्रदेशों में करता हूँ, और में करता ही क्या हूँ। पदार्थों का स्वभाव ही ऐसा है कि वह प्रति समय परिणमन करता रहेगा,मैं भी पदार्थ हूँ अतएव मेरा परिणमन होता रहता है, करता भी क्या हूँ? करने की बात तो इसलिए लगा देते हैं कि यह आत्मा इच्छा किया करता है और ऐसा विकल्प रखता है कि में अमुक पदार्थ को करता हूँ, अमुक को कर दूँगा, पर करने की इसमें क्या बात? जैसे ये जड़ पदार्थ शीर्ण होते हैं, फूटते हैं, पुराने होते हैं, सड़ते हैं तो क्या ये कुछ करते हैं? अरे इसमें कुछ करने की बात तो है ही नहीं। करने का शब्द तो अज्ञान में बना है। चूँकि अज्ञानी जीव करने की बात किया करता है तो यह कहने की रूढ़ि चल उठी है कि आत्मा ज्ञान करता है? अरे आत्मा तो स्वयं ज्ञानस्वरूप है, ज्ञानस्वभावी है। उसका स्वभाव है अपने आपमें प्रति समय परिणमते रहने का, सो यह आत्मा परिणमता रहता है। जगत के सभी पदार्थ अपने आपमें परिणमते रहते हैं। किसी की बदल चाहे समान हो और किसी की असमान हो पर बदलते सब रहते हैं। सिद्ध भगवान हैं वे बदलने का कुछ पता तो नहीं दे सकते। जैसे यहाँ संसारी लोग हैं इनकी बदल बता सकते हैं, अब यों भाव रखने लगा, अभी तक पाप में था अब धर्म में आ गया, अभी तक सुख में थाअब दु:ख में आ गया। यों असंख्याते तरह की बदल हुआ करती है किंतु सिद्ध में क्या बदल है? जो सारे विश्व को एक साथ ज्ञान से जाने, दूसरे समय में भी सारे विश्व को ज्ञान से जाने। अनंत काल तक विश्व को जाने, इसी तरह उसमें क्या बदल है, लेकिन वे समान-समान बदलते रहते हैं।

जैसे एक मनुष्य 20 सेर का बोझ हाथ में लेकर खड़ा हुआ है और इसी तरह से वह 10 मिनट तक खड़ा रहे तो दिखने में तो ऐसा लगता है कि यह कोई नया काम तो नहीं कर रहा है, यह तो 10 मिनट से वैसा का ही वैसा खड़ा है― पर ऐसी बात नहीं है, वह प्रत्येक सेकेंड में नया-नया काम कर रहा है, क्योंकि ताकत उसकी नई-नई लग रही है और उसे श्रम भी हो रहा है। तो जैसे दिखने में भले ही आये कि यह पुरुष वही-वही काम कर रहा है पर उसमें बदल चल रही है। अब दूसरा काम कर रहा है, अब तीसरा काम कर रहा है। ऐसे ही प्रभु भगवान सारे विश्व को जानते रहते हैं और वैसा ही अब जाना, ऐसे ही अब अगले समय में जानेंगे। तो यद्यपि एक सा जानना चल रहा है लेकिन प्रति समय में तो जानना चल रहा है वह भी तो कार्य है, ज्ञान शक्ति का परिणमन है। जैसे बिजली जल रही है, 10 मिनट से तो लगता है कि वह तो वही का वही काम 10 मिनट से कर रही है, कोई नया काम नहीं कर रही है पर ऐसी बात नहीं है। वह प्रति सेकेंड में नया-नया काम कर रही है। तो चाहे समानपरिणमन हो, चाहे असमानपरिणमन हो पर वहाँ बदल चलती रहती है। तो हमारा काम है निरंतर परिणमते रहने का सो परिणमन कर रहे हैं। हम कर नहीं रहे हैं, हो रहा है ऐसा तत्त्वज्ञानी जीव अपने आपमें निरख रहा है। यह मैं हूँऔर परिणमता रहता हूँ, इससे आगे मेरी दुनिया नहीं, मेरा घर नहीं, मेरा कोई स्वामी नहीं, सब मोहजाल की बात है, ऐसा निर्णय जिस पुरुष के चित्त में समाया हुआ है वह पुरुष राग अंधकार को दूर कर सकता है और ध्यान का सूर्य ऐसा उदित होता है कि उसके कारण राग अंधकार फटक नहीं सकता। देखिये सब कुछ अपने आपकी भलाई का काम अपने आपमें ही मिलेगा। सर्व सुख, सर्व आनंद, कल्याण समृद्धि, जो भी अभीष्ट है, जो भी उत्कृष्ट बात है वह सब कुछ अपने आपमें अकेले में मिलेगा। दूसरे पदार्थों की दृष्टि, आशा, इच्छा, आकर्षण, स्नेह ये सब अंधकार हैं और इनमें अपने आपकी सुध नहीं रह पाती है। उसका फल है क्लेश। यदि क्लेश न चाहिए तो कुछ क्षण तो ऐसा चिंतन करें कि मैं केवल अपने आपमें आप ही स्वयं हूँऔर निरंतर परिणमता हूँ। ऐसा ज्ञान बनते ही उसमें ध्यान के अंकुर बन जाते हैं और जब ध्यानरूपी सूर्य उदित होता है अर्थात् एकाग्रचित्त होकर आत्मा के स्वरूप का ही ध्यान रहता है तो फिर भ्रम के कारण बना हुआ यह जो राग अंधकार है वह दूर हो जाता है।


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