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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1184

From जैनकोष



ख्यातिपूजाभिभानार्तै: कैश्चिच्चोक्तानि सूरिभि:।

पापाभिचारकर्माणि क्रूरशास्त्राण्यनेकधा।।1184।।

ख्याति, पूजा, अभिलाषा इनसे पीड़ित हुए अनेक पुरुषों ने पाप कार्यों की विधि वाले अनेक शास्त्र रच डाले हैं सो वह बड़ा पाप है। एक ही ढंग के वीतरागता के ही पोषक शास्त्र क्यों नहीं मिलते? कोई राग में धर्म बतलाते हैं, कोई यज्ञ में, हवन में, पशुघात में धर्म बतलाते हैं। अनेक प्रकार के पापकार्यों की शिक्षा देने वाले जो ग्रंथ रचे हैं वे ऐसे लोगों द्वारा रचे गए हैं जो काम क्रोध आदिक भावों से पीड़ित थे, जिन्हें ख्याति, पूजा, लाभ, अभिलाषायें, कषायें रुचती रहें, उनसे अनेक प्रकार के पापकार्यों की साधना बनी। कोई समय था ऐसा जबकि कुछ लोगों की धर्मात्मा के रूप में बड़ी मान्यता थी। और लोग ब्राह्मणवर्ग को बहुत पूज्यता की दृष्टि से निरखते थे, और थे भी वे पूज्य, जब कि वे ब्राह्मण ज्ञानी थे, तत्त्वज्ञानी थे, तो पूज्यता की रूढ़ि बराबर चली आयी। अब कुछ चित्त में अनेक बातें आने लगी। जैसे आजकल लोग मांसभक्षण के रुचिया बहुत हो गए हैं। जहाँ देखो वहाँ ही 100-200 लोगों में बिरला ही व्यक्ति ऐसा मिलेगा जो मांस न खाता हो। जब मांस खाने की उन लोगों में इच्छा बढ़ी तो सोचा कि यों खाने से तो लोक में हमारी निंदा होगी तो उसका एक यज्ञविधान बना डाला। अश्वमेघ यज्ञ, गोमेघ यज्ञ, मनुष्यमेघ यज्ञ आदि बना डाला। घोड़ा, गाय और मनुष्य आदि उस अग्निकुंड में होम दिये जाते थे। उसमें अनेक प्रकार की सुगंधित वस्तुवें पड़ती थी। जब उस सुगंधित वस्तुवों के बीच में वह जीव अच्छी तरह से पक जाता था तो उसकी दुर्गंध दूर हो जाती थी, उसे लोग प्रसाद कह करके खाते थे। ऐसा करने में वे धर्मात्मा भी कहलाये और उनके विषयों का पोषण भी हो गया। जरा बतावो तो सही कि इस तरह से जीवों को सताने में कौनसा धर्म होता है? और यह बात शास्त्रों में लिखकर जनता के चित्त में डाली गई कि अमुक का घात करो तो उससे देव प्रसन्न होगा और मनोकामना सिद्ध होगी, यों सारी बातें शास्त्रों में रच डाली। तो जिनके ख्याति, पूजा, लाभ, अभिलाषा की कषाय थी उससे पीड़ित होकर पास से संबंध रखने वाले कर्मों को उन्होंने धर्म बताया और ऐसे ही क्रूर शास्त्र अनेक तरह के रच डाले।

बताया यह जा रहा कि यह नरभव मिलना कठिन था और ज्ञान मिला, ध्यान की योग्यता मिली तो किस ओर ध्यान को लगाना था और ध्यान का क्या प्रयोग करना था वह सब तो भूल गए और उल्टी गैल चले, उल्टे शास्त्र रचे।


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