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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1186

From जैनकोष



संसारसंभ्रमश्रांतो य: शिवाय विचेष्टते।

स युक्त्यागमनिर्णीते विवेच्य पथि वर्तते।।1186।।

जो पुरुष संसार के भ्रमण से खेदखिन्न होकर मोक्ष के लिए चेष्टा करते हैं वे तो विचार करेंगे, युक्ति और आगम से निर्णय किए हुए मार्ग में ही लगते हैं वे अन्य ठगों के बताये हुए मार्ग में नहीं लगते हैं। जिनको वस्तुत: आत्महित की वांछा हुई है वे किसी पक्ष में रुचि न रखेंगे। जहाँ हित हो, शांति मिले, उद्धार हो उन ही बातों का आदर करेंगे। तो जिन्हें वास्तव में आत्मा के हित की इच्छा जगी हैं वे ढूँढ़ लेंगे मार्ग और कभी बाहर न मिले किसी निमित्त विधि में तो वह अपने आपमें ही स्वत: अपने में ही पक्ष त्यागकर ढूँढ़ लेगा कि शांति का मार्ग क्या है? देखिये मनुष्य धर्मसाधन के लिए उद्यम करेगा तो वह तो भटक सकता है। कोई खोटे मार्ग में लग जाय खोटी धर्मपद्धति में लग जाय, जिस किसी के बताये हुए मार्ग से पलने लगे तो वह मनुष्य तो ठगा जा सकता है, पर पशुवों में धर्म करने की बुद्धि जग जायगी क्या? नहीं जग सकती। उसका कारण है कि पशुवों में गृहीत मिथ्यात्व है, प्रमाद है। कुगुरु, कुदेव, कुशास्त्र आदि की मान्यताएँ तो मनुष्य में हैं। मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, मिथ्याचारित्र इत्यादि कुपथ का सेवन तो मनुष्य करता है। यों कुपथ के रास्ते तो मनुष्य निकाल लेगा, पर पशु न निकाल सकेगा। पशुवों में धर्म की बात जगी तो वह ठीक जग जायगी और मनुष्य में धर्म की इच्छा भी हुई और धर्म के लिए यत्न भी करे वह सैकड़ों कुमार्गों को भी अपना सकता है। खेद की बात है कि हमने पशुवों से भी अधिक ज्ञान पाया, बहुत-बहुत ज्ञान पाया, पर उस ज्ञान का उपयोग मोह रागद्वेष के बढ़ाने में करते हैं, तृष्णा बढ़ाने में करते हैं, यह सब बड़े खेद की बात है। जैसे कि अमृत को कोई विष बनाकर पिये तो यह तो उसके लिए खेद की बात है। ध्यान तो मोक्षसाधन के लिए था, पर बना डाला इन पुरुषों ने नरक जाने के लिए तो यह अमृत को विष बनाकर पीने की तरह है। दूध तो विशुद्ध है, ताजा है, मीठा है और उसे कोई जहर बनाकर पिये तो यह कितनी मूढ़ता भरी बात है? ऐसे ही ज्ञान तो पाया है बहुत अच्छा, पर ज्ञान में विषयकषायों की पुट मिलाकर उस ज्ञान का साधन बना रहे हैं तो यह खेद की बात है। बहुत घूम लिया इस संसार में, लोक में नहीं कह रहे, आकाश में नहीं कह रहे किंतु भावसंसार में। इन विकल्पों में बहुत घूम लिया, बड़ा किया कि मेरा घर है, मेरा परिवार है, मेरी इज्जत है, मेरी पोजीशन है, लेकिन ये सब आश्वासन संसार के भ्रमण के कारण बनते हैं, और विरक्तबुद्धि होना मिला है। ठीक है पुण्य का काम है, पुण्य के उदय में ऐसा हुआ ही करता है। किसी के बहुत अधिक है, किसी के कुछ भी नहीं है। ये सब विचित्रताएँ सिद्ध कर रही हैं कि ये सब पुण्य पाप के ठाठ है।


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