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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1206

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भोगा भोगींद्रसेव्यास्त्रिभुवनजयिनी रूपसाम्राज्यलक्ष्मी

राज्यं क्षीणारिचक्रं विजितसुरवधूलास्यलीलायुवत्य:।

अंयच्चानंदभूतं कथमिह भवतीत्यादि चिंतासुभाजांयत्तद्भोगार्त्तमुक्तं परमगुणधरैर्जंमसंतानमूलं।।1206।।

अब निदान नाम का आर्तध्यान कहा जा रहा है। बड़े-बड़े देव जो धरणेंद्र इंद्र के द्वारा सेवन किए जाते हैं, इनके उपवन को बचाने वाली रूप साम्राज्य की लक्ष्मी है जिसकी इच्छा करना सो निदान नामक आर्तध्यान है। इच्छा, आशा, प्रतीक्षा, अभिप्राय इनसे बड़ा कष्ट होता है और ये सब निदान के ही रूपक हैं। वैसे निदान की यह परिस्थिति है कि परभव में मुझे स्वर्ग लाभ प्राप्त हो देवेंद्र धरणेंद्र आदि के पद प्राप्त हों, वे सब निदान ही तो हैं। किसी भी परवस्तु की चाह होना यह सब निदान है। परलोक के लिए चाह करना सो निदान है, इस लोक के लिए चाह करना सो भी निदान है। इस भव में मुझे वैभव, इज्जत आदिक की प्राप्ति हो, ऐसी चाह करना सो निदान है। इस निदान से क्लेश ही होता है, भले ही शेखचिल्ली जैसा सोच सोचकर मौज मान लिया जाता हो, यों करूँगा फिर यों करूँगा। प्रथम तो ऐसी इच्छा करते हुए में भी उसे सुख नहीं है। लेकिन उस मौज को भी मान लीजिए तो उसका भंडाफोड़ क्षणभर में हो जाता है। एक मनुष्य को स्वप्न आया कि रास्ते में यह दो हजार रुपये की थैली पड़ी है, चाँदी के रुपये हैं, इसे ले लें। उसका वजन था 25 सेर का। तो स्वप्न में उस पुरुष ने उसे अपने कंधे पर रख लिया और चल दिया। चलते-चलते कंधा दु:खने लगा। उस दु:ख में ही उसकी नींद खुल गयी। जब नींद खुली तो तुरंत थैली को ढूँढ़ने लगा। कहाँ गई वह थैली? अरे वह तो स्वप्न की बात थी, लेकिन स्वप्न में भी जो वह कल्पना लगा बैठा था उससे सचमुच कंधा दर्द करने लगा। तो यह निदान भी एक महाविडंबना है।

अपने स्वरूप की खबर हो और सबसे निराला ज्ञानमात्र यह मैं आत्मा हूँ मेरा कार्य केवल ज्ञानज्योति है, इस प्रकार पर से न्यारे केवल अपने आपमें परिणति करते हुए उपयोग बने तो वह तो है जीवन की सफलता की निशानी और इसके विरुद्ध जो कुछ हो रहा है जिसमें हम मौज कल्याण समझते हैं वह सब इसके लिए अनर्थ है। तो निदान अनर्थ है और निदान से कुछ सिद्धि नहीं। ऐसा कोई सोच ले कि मैं देवेंद्र बन जाऊँ तो सोचने से बन गया क्या? हाँ इतना हो सकता है कि तपश्चरण, वैराग्य, पुण्य तो बहुत हो और मांग ले थोड़ी बात तो मिल जायगी। जैसे धनवैभव तो अधिक हो और किसी समस्या में किसी से थोड़ा मांग ले तो उसका मिल जाना सुगम है। तो निदान में सब बातें हो जायेंगी तो भी सफलताएँ नहीं हैं। मिलना तो बहुत था पर थोड़ा मिल गया। यों इस निदान में कोई सिद्धि नहीं है। अपना वैसा परिणाम बने, सबसे निराले अपने आपके ज्ञानस्वरूप को निहारने का उपयोग बने, किसी परपदार्थ से किसी भी प्रकार की वांछा न रखें, अपने आपका दर्शन सुगम होता रहे ऐसी परिणति होती है तब उसे शांति प्राप्त होती है, अन्यथा बाहरी वस्तुवों के संपर्क में तो इस जीव को परेशानी ही परेशानी है। पर और ईशान ये दो शब्द हैं। ईशान का अर्थ है मालिक, पर का मालिक बनना ऐसा जो अपना भाव रखता है उस मनुष्य का नाम है परेशान। किसी परवस्तु के संपर्क में कुछ हित नहीं है, अहित ही है, क्लेश ही क्लेश है, फिर भी यह प्राणी बाह्य वस्तुवों से विमुख होकर अपने आत्मा में मग्न होने की धुन तक भी नहीं बनाता। ये सब निदान के सताये हुए लोग बाह्य पदार्थों की ओर दृष्टि रखकर अपने आपको आकुलित बनाये चले जा रहे हैं। यह है निदान नाम का चतुर्थध्यान आर्तध्यान। इंद्र धरणेंद्र आदिक भोगों की चाह करना, दुनियाभर में जो अनुपम रूप हो, ऐसे रूप की चाह करना तथा क्षीण हो गये हैं शत्रु के समूह ऐसे राज्य की वांछा करना और देवांगनाओं के नृत्य में वचनालाप में रहने की चाह करना, इस प्रकार के चिंतवन को आचार्यदेव भोगार्थ नाम का चौथा आर्तध्यान कहते हैं। योगसाधनों की बाधा से दु:खी होने का नाम आर्तध्यान है। लोग जानते हैं कि क्या-क्या विचार करते जाते हैं और बनता है उसका क्या, इच्छा करना व्यर्थ है। अध्यात्म दृष्टि से देखा जाय तो जिस काल में इच्छा है उस काल में क्लेश है और समीप में भोग नहीं है। समीप में भोग साधन हो तो इच्छा फिर किसकी करें? जैसे जिसके हाथ में 100 रु. हैं, क्या वह यह इच्छा करेगा कि मुझे 100 रु. मिल जायें? जो कुछ प्राप्त है उसकी वांछा नहीं होती है। तो जिस समय वांछा है उस समय चीज प्राप्त नहीं है और जिस समय चीज प्राप्त है उस समय उसके भोगने की वांछा नहीं रहती। यद्यपि भोगने के समय में भी इच्छा चलती है मगर जो भोग भोगा जा रहा है उसकी नहीं, अब अन्य भोगसाधनों की इच्छा करने लगता है। इच्छा का विषय था भोगसाधन, वह इच्छा के समय प्राप्त हुआ नहीं। तो फिर उस इच्छा से सफलता क्या हो? इच्छा करना बिल्कुल व्यर्थ ही तो रहा।

जैसे कोई गरीब आदमी है, उसके जब तक दाँत थे तब तक चने नहीं जुड़े और जब चने जुड़े तो दाँत न रहे। वह बेचारा गरीब अपने जीवन भर चने न चबा सका। यह बात है इच्छा की और भोगसाधनों की। तो यह इच्छा कभी भी सफल न हो सकी। किसी भी मनुष्य की इच्छा जो भी की जा रही हो वह सफल नहीं होती। उस इच्छा से व्याकुलता हो रही, बेचैनी हो रही। कोई साधु शहर के बाहर जंगल में चातुर्मास कर रहे थे तो एक सेठ जी जो कि बहुत ही भक्त पुरुष थे उन्होंने सोचा कि चार माह तक हम महाराज के पास इसी जंगल में रहें और महाराज की खूब सेवा करें। सों क्या कि घर में जो कीमती सामान था सोना, चाँदी, हीरा, जवाहरात का उसे निकालकर एक हंडे में भरा और उसी जंगल में एक पेड़ के नीचे गाड़ दिया। अब वह सेठ रात-दिन उसी जंगल में रहे। जब चातुर्मास समाप्त हो गया तो महाराज तो विहार कर गए, वहाँ क्या हुआ कि उस सेठ के पुत्र ने कभी किसी तरह से उस हंडे को देख लिया था, सो उसे वह खोद ले गया था। उस सेठ ने समझा कि इसमें तो महाराज का हाथ मालूम होता है क्योंकि उनके सिवाय यहाँ और कोई न रहता था। सो झट महाराज के पास पहुँचा और वहाँ ऐसी-ऐसी कथायें कहानियाँ कहीं कि जिनमें यह बात टपकती थी कि हमने तो चार माह तक महाराज की बड़ी सेवा की, फिर भी हमारा कीमती वस्तुवों से भरा हुआ हंडा गायब कर दिया। महाराज ने भी कुछ ऐसी कथायें कहानियाँ कहीं कि जिनमें यह बात भरी थी कि अरे सेठ तेरा अनुपकारी कोई और होगा, मेरे प्रति तो तुझे केवल भ्रम है। तो यह सब क्या है? निदान ही तो है। परभव की बात विचारना सो निदान है और इस भव के साधना में मन लगाना सो भी निदान है। तो इस निदान के कारण इस जीव को निरंतर परेशानी रहती है। जगत में कोई वस्तु चाहने के योगय नहीं है। हमारा साथी यहाँ है कौन? सिर में पीड़ा हो जाय तो क्या कोई उसे बाँट सकता है? कोई नहीं बाँट सकता। तो यहाँ किसे साथी माना जाय? प्रत्येक जीव स्वयं है, किसी का किसी से कुछ सम्ंबध नहीं है, सब एक दूसरे से अपरिचित है, फिर भी उनके प्रति मोह रखना, उस ही धुन में निरंतर बने रहना, विकल्पों से हटकर अपने को बोझरहित अनुभव न करना, ये सब तो इस नरभव को निष्फल बनाने की निशानी हैं। निदान, आशा, इच्छा ये सब व्यर्थ के दुर्गुण हैं जिससे जीव को परेशानी रहती है। अगर उदय अनुकूल है तो इस वैभव की प्राप्ति होती है, लेकिन उस भव में यदि आसक्ति हो, इच्छा हो तो वैभव मिलने के बाद भी वह दु:खी है, परेशान है, तो ये चारों प्रकार के आर्तध्यान इस जीव को क्लेश देने वाले हैं। उन दुर्ध्यानों से हटकर आत्मध्यान में लग सकें तो हम आपकी भलाई है। उसमें ही तत्त्वज्ञान और वैराग्य बनता है। यह तत्त्वज्ञान और वैराग्य सत्संग से हुआ करता है। तो सत्संग में रहकर तत्त्वज्ञान और वैराग्य की पुष्टि करें, और इन ही के द्वारा हम अपने आपको शांत कर ले।

पुण्यानुष्ठानजातैरभिलषति पदं यज्जिनेंद्रामराणां,यद्वा तैरेव वांछत्यहितकुलकुजच्छेदमत्यंतकोपात्।


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