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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1211

From जैनकोष



संयतासंयतेष्वेतच्चतुर्भेदं प्रजायते।

प्रमत्तसंयतानां तु निदानरहितं त्रिधा।।1211।।

यह आर्तध्यान संयतासंयत नामक 5 वें गुणस्थान पर्यंत चारभावरूप रह सकते हैं। 5 वें गुणस्थान तक श्रावक को इष्टवियोगज, अनिष्टसंयोगज, वेदनाप्रभव और निदान― ये चार ध्यान रह सकते हैं। प्रशस्त और अप्रशस्त ये दो प्रकार के ध्यान हैं। प्रशस्त ध्यान क्या और अप्रशस्त ध्यान क्या? इन ध्यानों की जड़ तो मोह है पीड़ा है। कोई पुरुष कहीं चला जा रहा था। रास्ते में उसने देखा कि हाथी ने एक बच्चे को अपनी सूंड से उठाकर पटक दिया। उस लड़के की सूरत उसके ही लड़के की सूरत के समान थी। उसने समझा कि इस हाथी ने मेरे लड़के को मार डाला। इस भ्रम के कारण उसके इतनी पीड़ा उत्पन्न हुई कि वह बेहोश हो गया। उसके कुछ साथी लोग वहाँ पर मौजूद थे। उन्होंने इस दृश्य को देखा और समझ लिया कि यह पुरुष इस कारण से बेहोश हुआ। इसने समझा कि मेरे पुत्र को इस हाथी ने मार डाला। साथ ही अपने एक साथी को भेज दिया उस पुरुष के लड़के को लिवाकर लाने के लिए। जब वह पुत्र उस पुरुष के सामने आया और कुछ बेहोशी दूर हुई तो उसको चेत हो गया, खुश हो गया। तो वहाँ जो इतना बड़ा क्लेश था वह इस भ्रम का था कि वह लड़का मेरा है जिसको हाथी ने मार डाला है। तो इस मोह के कारण उसे क्लेश हुआ। उस हाथी द्वारा पटके गए पुत्र में जो मोह था वह मिट गया और वह शांत हो गया। तो यों ही जितने प्रकार के आर्तध्यान हैं, सभी में लगा लें, अपना कारण रागद्वेषमोह है। इन तीन परिणामों से आर्तध्यान बनते हैं। तो ये मिटें कैसे? उन सबका मूल में उपाय तो इतना ही भर है― निज को निज पर को पर जान। अगर वास्तविक स्वरूप से, तत्त्व से निज कितना है और इसके अतिरिक्त पर कितना है? इसका विवेक जग जाय तो फिर उसे क्लेश नहीं हो सकता। है, पर है, हो गया परिणमन। जैसे दुनिया के अन्य सभी लोग जिनको गैर माना हैं वे पर हैं ऐसे ही आज जो कुछ प्राप्त हुआ है वह सब भी पर है। दुनिया के परपदार्थों को मानता है यह जीव कि ये मेरे हैं इस मिथ्या मान्यता के कारण इसे कष्ट रहा करता है। अपने आंतरिक स्वरूप को निरखकर यह भाव बना लें कि यह मेरा शरीर भी पर है। इस मान्यता से फिर शरीर पर कुछ भी बीतो पर उससे क्लेश नहीं होता है। तो निज को निज पर को पर जान―यह बात यदि बन जाय तो फिर दु:ख का कारण नहीं रहा। वह आर्तध्यान फिर आर्तध्यान न रहेगा। अत: समस्त परवस्तुवों से निराले निज ज्ञानस्वरूप मात्र आत्मा को समझ जाये कि यह मैं हूँ, फिर उसके कोई क्लेश न रहेगा।


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