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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 123

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रूपाण्येकानि गृहणाति त्यजत्यन्यानि संततम्।

यथा रंगोऽद्र शैलूषस्तथाय यंत्रवाहक:।।123।।

देहधारियों के नाना रूपक― यह यंत्रवाहक अर्थात् इस शरीर मशीन को ढोने वाला यह मजदूर पुरुष कभी-कभी रूप को ग्रहण करता है और कभी किसी रूप को ग्रहण करता है और कभी किसी रूप को त्यागता है। रूप बनाना, रूप मिटाना बस यही नाटक जैसा काम इस जीव का बन रहा है। जैसे कोई रंग मंच पर नृत्य करने, पार्ट अदा करने वाला भिन्न-भिन्न स्वांगों को धरता है, इसी प्रकार यह जीव निरंतर भिन्न-भिन्न स्वांगों को धारण करता रहता है। कभी कुछ बना, कभी कुछ बना। जीवों के पाप के उदय आते हैं और उन्हें ऐसे ही पुण्योदयी निमित्त मिलते हैं किंतु क्रूर मनुष्यों से पाला पड़ जाता है कुछ पुण्य के उदय से, कुछ यश चला है, प्रताप बना हुआ है तो वे बड़े लोग तो अपनी मौज के लिये, इस जगत् में अपनी नामवरी फैलाने के लिये युद्ध करें, कैसी-कैसी प्रवृत्तियाँ करें और ये अनेक संसारी जीव उसमें पिस जाया करते हैं। यह सब संसार का रूपक है। संसार में किस जगह जायें कि संतोष से बैठा जा सके? जब इस जीव के साथ कषायों का दाह लगा हुआ है तो जहाँ जायेगा वहीं जलेगा। शांति कहाँ पायेगा? शांति चाहते हो तो इस अपने आपके अंतर में ही सम्यज्ञान का प्रकाश पाये तो शांति मिलेगी। यथार्थ बोध बिना यह जीव शांति तो पायेगा क्या? अनेक विडंबनाओं के रूपों को ग्रहण करता है, छोड़ता है, जन्मता है, मरता है।

तीन माँगों से निरुत्तरता― किसी राजा ने दूसरे राज्य पर हमला बोला और उस दूसरे राज्य के वंशजों को मार डाला, तब इसे बड़ा खेद हुआ, हाय ! मैंने कुबुद्धिवश इस राजवंश को उजाड़ डाला, क्या फायदा मिला? इस सोच विचार के बाद वह इस तलाश में रहा कि इसके घराने का कोई मिले तो उसको ही यह राज्य सौंप दूँ। हमें क्या करना है इस राज्य को? खोजा तो कोई न मिला। एक पुरुष ने बताया कि इस राजवंश के राजा का एक चाचा मरघट में रहता है। वह घर आता भी नहीं है। वहीं उसे मौज मिलता है। वह राजा मरघट में उसके पास पहुँचा। सारी कथा सुनायी और कहा कि तुम जो चाहते हो हमसे माँग लो। राजा तो सोचता था कि यह तो अधिक से अधिक राज्य माँग लेगा और क्या माँग सकेगा? तो वह चाचा बोला― हम जो चाहेंगे क्या तुम वह दोगे? राजा बोला― हाँ देंगे। तो चाचा कहता है अच्छा मुझे ऐसा सुख दो जिसके बाद फिर कभी दु:ख न आये। राजा ऐसे अटपट प्रश्न को सुनकर गंभीर विचार में पड़ गया और उसे ऐसा लगा कि इस संसार में ऐसा कोई भी वैषयिक सुख नहीं है जिसके पाने के बाद फिर कभी दु:ख न आये। वह हाथ जोड़कर बोला― महाराज मैं ऐसा सुख देने में असमर्थ हूँ। कृपया आप कोई दूसरी चीज मांगो। चाचा बोला― अच्छा देखो तुम हमें ऐसा जन्म दो कि जिसके बाद फिर कभी मरण न हो। राजा इस दूसरी बात को भी सुनकर विस्मय में पड़ा। सोचता है राजा कि ऐसा किसका जीवन है कि जिस जीवन को पाकर वह कभी मरता न हो। बड़ी-बड़ी स्थितियों के देवता लोग भी आखिर मरा करते हैं, तो ऐसा सोचकर राजा कहता है― महाराज इस बात को भी देने में असमर्थ हूँ। आप कोई तीसरी चीज मांगो। तो चाचा बोला कि मुझको ऐसी जवानी हो जिसके बाद फिर कभी बुढ़ापा न आये। ऐसा तो कहीं देखा ही न होगा किसी ने कि जवानी आने के बाद बुढ़ापा आता ही न हो, सदा जवान ही बना रहता हो ऐसा तो कहीं होता नहीं। ऐसी बात सोचकर राजा हाथ जोड़कर कहता हैं― महाराज तुम्हारी इस माँग को भी मैं पूरा करने में असमर्थ हूँ। आखिर अपनी हार मानकर राजा वापिस चला जाता है।

सुख के लिये अविवेकी होने की मूर्खता― भैया ! खूब देख लीजिये कि इस संसार में ऐसा कोर्इ भी सुख ऐसा नहीं है जिस सुख में अनंत दु:ख न बसे हुए हों। फिर इन सांसारिक सुखों की आशा करना और उसके लिये विवाद विरोध और विकल्प मचाना, यह तो कुछ विवेक की बात नहीं है। सुख के लिये अविवेक से लिपटना तो मूर्खता का काम है। विवेक का काम तो है अपने सत्यस्वरूप की दृष्टि करना और उस निजतत्त्व के दर्शन में ही प्रसन्न बने रहना, यही है विवेक का काम। इस विवेकपूर्ण कार्य से हम आवश्य शांत होंगे व पूर्ण संतुष्ट होंगे।


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