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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1243

From जैनकोष



इत्थं चुरायां विविधप्रकार: शरीरिभिर्य: क्रियतेऽभिलाष:।

अपारदु:खार्णवहेतुभूतं रौद्रं तृतीयं तदिह प्रणीताम्।।1243।।

इस प्रकार चोरी में जीवों के द्वारा जो अनेक प्रकार की वांछा की जाय सो रौद्रध्यान है। यह रौद्रध्यान अपार दु:खरूपी समुद्र में पटकने का कारणभूत है। रुद्र अभिप्राय करके जो ध्यान बनता है सो रौद्रध्यान है। रुद्र मायने क्रूर। अपने विषयसाधन चाहिए, दूसरे का कुछ भी हो इस प्रकार का परिणाम उसके होता है जो निर्दय है, करुणाहीन है। तो रुद्र आशय है यह। अपना विषय तो रुचे और उसे दूसरे की परवाह न रहे। इस रौद्रध्यान के कारण जीव के एकदम प्राय: नरकगति का बंध होता है। दु:ख में तो यह सम्हल भी सकता है, पर विषयों के सुख में और पाप करके, छल करके विषयों में या हिंसा में, झूठ में, चोरी में, कुशील में आनंद मानने से इतना तीव्र पापबंध होता है कि उसे नरकगति का बंध होता है। परिणामों की निर्मलता रहे इससे बढ़कर और कुछ धन नहीं है। स्वामी समंतभद्राचार्य ने कहा है कि यदि पाप रुक गया तो जगत की अन्य संपदा से क्या प्रयोजन? यदि पाप-कर्म रुक गया, पवित्र हृदय हो गया तो उसने सब कुछ वैभव पा लिया। अब जगत की अन्य विभूतियों से उसे क्या प्रयोजन? यह तो विभूति कुछ भी चीज नहीं है, अपने परिणामों की पवित्रता ही एक उत्कृष्ट विभूति है। यदि पाप नहीं रुके, पाप का बंध चल रहा है तो समझिये कि लोक की विभूति कितनी भी इकट्ठी हो जाय, उससे फायदा कुछ न निकलेगा, पाप का उदय आयगा और उसके अनुसार इसे दुर्गति सहनी पड़ेगी। इस कारण यह निर्णय रखना चाहिए कि हमारा परिणाम पवित्र रहे, विषयकषायों से निवृत्त रहे, अपने सहजज्ञानस्वरूप की दृष्टि बनी रहे। संसार शरीर भोगों से विरक्ति का परिणाम रहे, ऐसी पवित्रता के साथ जीवन गुजरे तो वह लाभ की बात है। अपनी पवित्रता नष्ट करके यदि लोक की कितनी भी संपदा मिले तो उस संपदा से अपने आत्मा का कुछ भी लाभ नहीं है। यह चौर्यानंद रौद्रध्यान की बात कही जा रही है। वस्तुत: अध्यात्मपद्धति से देखो तो जो आत्मतत्त्व नहीं है ऐसे परभाव को अंगीकार करना, उसमें मौज मानना वह अध्यात्म विधि में चोरी बतायी गई है। जैसे देह न्यारा है और आत्मा न्यारा है तो देह परवस्तु हुई ना। मेरे आत्मा की निजी वस्तु क्या है? अपनी आत्मा के गुण अपनी-अपनी आत्मा के विशुद्ध परिणमन। यह तो अपने आत्मा की वास्तविक चीज है। देह तो परचीज हुई ना, अपने आत्मस्वरूप को निरखकर बोलो, अब इस देह परचीज को अपना लेना यह मैं हूँ, यह मेरा है, यह मेरा देह है, मैं भला चंगा हूँ आदिक में अपनी बुद्धि लगाना, देह को स्वीकार करना बस हो गयी चोरी। जैसे लोक व्यवहार में भी होता क्या है? चोरी करने वाला अपने चित्त में यह भाव तो भरता है कि लो अब यह धन मेरा हो गया। किसी दूसरे के घर से धन उठाकर अपने घर कोई रखे तो वह यही तो संतोष करता है कि लो अब यह धन मेरा हो गया। परिणाम के सिवाय चोरी भी करता है क्या सो बतावो। यह बात मिथ्यात्व में हुई। परिणाम ही तो किया। यह देह मैं हूँ, यह देह मेरा है, बस चोरी हो गयी। अध्यात्मदृष्टि में अपने आत्मस्वरूप को लखकर परस्वरूप में लगना यह चोरी है। इस चोरी से तो संसार में कौन बचा है? हाँ जो तत्त्वज्ञानी पुरुष हैं, विवेकशील हैं, जिसके सम्यक्त्व जगा है वे ही अपने आशय में यह समझ पाते हैं कि मेरे आत्मा का तो मेरा ज्ञानस्वभाव ही सब कुछ है। अन्य कुछ विकार रागद्वेषभाव अथवा पुद्गल धर्म अधर्म ये सब मेरे नहीं हैं, यों सम्यग्दृष्टि पुरुष किसी भी परतत्त्व को यह स्वीकार नहीं करता कि यह मेरा है, किसी परवस्तु को अपनी मानना यह अध्यात्म दृष्टि से चोरी है। तो इतना निर्मल परिणाम बने, ऐसा तत्त्वज्ञान जगे कि यह भी निरखते रहें कि मेरे आत्मा का तो केवल स्वभाव गुण ज्ञान आनंद यही है, इसके अतिरिक्त जो भी विडंबनाएँ हैं वे सब परवस्तु हैं, उनका स्वीकार करना सो चोरी है। देखिये चोरी करने वाले लोग कभी धनिक नहीं हुए, डाका डालने वाले लोग कभी खुश नहीं रहे क्योंकि पापकर्म से उत्पन्न किया गया धन टिक नहीं सकता। चित्त उसका डगमग रहेगा यत्रतत्र डोलेगा, जमकर न रह सकेगा, फिर समृद्धि कैसे उत्पन्न हो? जो पुरुष नीति से रहते हैं, न्याय नीति से धन कमाते हैं वे पुरुष अनाप-सनाप विषयकषायों में खर्च नहीं करते और वे दान भी करेंगे तो बड़े भाव से करेंगे और उनका दिया हुआ थोड़ा भी द्रव्य पाप के फल को नष्ट करता है। तो नीति से धन कमाना, नीति से रहना, किसी के चित्त को सताने का भाव न रखना, मृषानंद न करना, ये सब पवित्रता की बातें हैं और पवित्र परिणाम से ही जीव का उद्धार संभव है। विषयकषायों में लीन होने से आत्मा को कोई नफा नहीं है। देखिये अपने आपके स्वरूप की बराबर भावना कीजिए। जो स्व है उसी को ही स्वीकार करे, जो पर है उसे स्वीकार न करे। तत्त्वज्ञानी पुरुष के कलह नहीं रहती। विषयों की ओर से यों उपेक्षा रहती है कि धन उदयानुसार प्राप्त होता है फिर क्यों उसमें अनेक कल्पनाएँ बनें और क्यों अनेक प्रयास रचना? अपने आपके स्वरूप की भावना करके अपने ही स्वरूप को स्वीकारना चाहिए। यह में केवल ज्ञानस्वरूप हूँ। अन्य परमाणुमात्र भी मेरा नहीं है, और रागद्वेष मोहममता के परिणाम तक भी मेरे नहीं है, ये हुआ करते हैं और मिट जाते हैं। जो मेरी चीज हो वह मिटेगी कैसे? जो मिट जाती है, जो खराब हो जाती है वह मेरी चीज नहीं है। परिजन से, धन वैभव से, अपनी नामवरी से इन सबसे मोह हटे, अपने में केवल ज्ञानस्वरूप का अनुभव जगे, यह ज्ञान यह अनुभव बेड़ा पार कर देगा। अनेक उपाय बनावें कि अपने परिणामों में पवित्रता रहे, अपवित्र हृदय से जो चेष्टा बनती है वह खुद को भी दु:ख देती है और अन्य पुरुषों को भी दु:ख देती है। तो ऐसा चित्त बने कि आध्यात्मिक चोरी तक भी न रहे, लौकिक चोरी की बात तो दूर जाने दो, इतना सावधान रहें कि यह मैं हूँ, ज्ञानरूप हूँ, देह भी मैं नहीं, यह घर, यह वैभव, यह कुटुंब मेरा नहीं। जब शरीर तक भी मेरा नहीं तो और की तो बात क्या कहें। यों देह से भी निराला अपने को ज्ञानमात्र अनुभव करते जायें यही शांति का उपाय है और कल्याण का सही मार्ग है। मित्रता हो किसी से तो इस ही प्रोग्राम में लगने के लिए कि धर्म में बराबर अग्रसर बने रहें, अन्य कुछ भी अंगीकार करने के लिए मित्रता न होना चाहिए। मित्र तो सच्चा वही है जो विपत्तियों में मदद दे और कल्याणमार्ग में लगाये। और जो विपत्तियों में लगाये, संसार के जन्ममरण में फँसाये वह मित्र नहीं है, इनसे कोई बचा सके ऐसा कोई निमित्त बने वह है वास्तव में मित्र। जो विषयसाधनों में लगावे, लोभ लालच परिग्रह में जो लगाये वह वास्तविक मित्र नहीं है। वह तो अपने ही समान संसार में रुलाने के साधन बना रहा है। अपने आप दुगर्ति में गिरेगा और दूसरों को भी दुर्गति में ढकेल रहा है। मित्र वह है जो ऐसा उपदेश करे, ऐसी दृष्टि बना दे कि यह अनुभव होने लगे कि मैं तो आनंदस्वरूप ही हूँ। मेरे में तो कहीं संकट ही नहीं है, फिर विकल्प क्या करना? यों अपने आपको केवल ज्ञानस्वरूप मात्र अनुभव कराने का जो निमित्त बने, उपदेश करे वह है सच्चा मित्र। और जो विषयों में फँसाने, संसार में रुलाने का उपदेश करे वह मित्र शत्रुरूप है। ऐसा जानकर एक प्रोग्राम अपने चित्त में बनायें कि कैसी भी स्थिति आये उन सब परिस्थितियों का मुकाबला तो कर लेंगे, पर अपने परिणामों में कलुषता न उत्पन्न हो, ऐसा जो अपने आत्मध्यान के लिए दृढ़संकल्प करता है वह संसार से पार हो जाता है। यहाँ के दु:ख छोड़ें, और सुख में मौज मानना छूटे, अपने स्वरूप को निहारें, यही शांति का एक मात्र उपाय है।


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