• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1248

From जैनकोष



भित्वा भुवं जंतुकुलानि हत्वा प्रविश्य दुर्गाण्युदधिं विलंघय।

कृत्वा पदं मूर्ध्नि मदोद्धतानां मयाधिपत्यं कृतमत्युदारम्।।1248।।

देखो पृथ्वी भी भेद डाला, जीवों के समूह भी मार डाला और गणों के प्रवेश किए किले जीता, बड़े शत्रु पर पाँव देकर मैंने बहुत ऊँचे स्वामीपन का राज्य पाया―यों एक अपने सुख पर अभिमान जगना। जैसे धनिक लोग धनवैभव के, ठाठबाट के समागम में अहंकार से भरे हुए रहते हैं, अपने को सबसे ऊँचा समझते हैं ऐसे ही शासन के प्रसंग में शत्रुवों का विनाश करके, बड़ा पराक्रम करके, समुद्र को भी लांघ करके, पृथ्वी को भी भेद करके, समूल शत्रु का नाश करके जो राज्य पाया है उस पर अहंकार बनाना, लो मैंने इस-इस प्रकार से इतना बड़ा साम्राज्य पाया है ऐसा चिंतन करना भी विषयसंरक्षणानंद रौद्रध्यान है।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_1248&oldid=83254"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:33.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki