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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1250

From जैनकोष



इत्यादिसंरक्षणसंनिबंधं सचिंतनं यत्क्रियते मनुष्यै:।

संरक्षणानंदभवं तदेतद्रौद्रं प्रणीतं जगदेकनाथै:।।1250।।

विषयों के संरक्षण बनाने वाले साधनों का जो चिंतन करे सो सब विषयसंरक्षणानंद रौद्रध्यान बताया है। ये मनुष्यों के प्राण निरंतर दु:खते हैं कि यह विषयसंरक्षणानंद रौद्रध्यान बराबर चलता रहता है। रोजगार चल रहा, अन्य कार्य कर रहा, घर की सफाई कर रहा, भींट बनवाने का काम चल रहा आदिक सभी काम विषयों के साधन जुटाना, परिग्रह जोड़ना― इन सब कामों में विषयसंरक्षणानंद रौद्रध्यान है। एक खलिहान में किसान ने देखा कि यह चूहा कहीं से रुपये लाता है और उसको इकट्ठा करता है और रुपयों के ढेर के चारों तरफ घूमकर नाच करता और धीरे-धीरे सारे रुपयों को वह अपने बिल में ले जाता। दो एक बार देखा बडे गौर से और यह भी समझा कि यह दो ही रुपये लाता है और बिल में रख देता है। उस चूहे को उन रुपयों से प्रेम हो गया। सो वह बाहर से रुपये लाता और उन्हें देख देखकर खुश होता था। तो यह विषयसंरक्षणानंद रौद्रध्यान मनुष्यों के ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों के बराबर चलता रहता है। पेड़, पृथ्वी आदिक स्थावर जीवों के भी चलता रहता है। तो जहाँ परिग्रह और विषयों के साधन जोड़ने में आनंद माना जाय वह विषयसंरक्षणानंद रौद्रध्यान है। इससे हटकर विशुद्ध ज्ञानमात्र अपने स्वरूप की ओर लगने का यत्न करना चाहिए।


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