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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1262

From जैनकोष



ज्ञानवैराग्यसंपन्न: संवृतात्मा स्थिराशय:।

मुमुक्षुरुद्यमी शांतो ध्याता धीर: प्रशस्यते।।1262।।

कैसा ध्यान करने वाला धीर पुरुष प्रशंसनीय है उसका इस लोक में वर्णन है, जो ज्ञान और वैराग्य से युक्त हो। ज्ञान और वैराग्य ये कर्मों की निर्जरा के कारण हैं। जैसे जो पुरुष मंत्रवादी है तो वह विष भी खाता जाय पर विष का उस पर असर नहीं होता, इसी प्रकार आत्मविद्या वाला पुरुष तत्त्वज्ञानी पुरुष भी विषयसेवन का कार्य करता है और मिथ्यादृष्टि भी विषयसेवन का कार्य करता है तो भी तत्त्वज्ञानी का वह विषयसेवन का कार्य उसे संसार में डुबाने वाला नहीं बनता है। उसका कारण क्या कि भीतर में उसके यह आशय बना हुआ है कि मैं केवल ज्ञानस्वरूप हूँ, ज्ञानवृत्ति मेरा कार्य है। यह कर्मों का दंड है ऐसी उसकी प्रतीति रहती है। भला बतलावो पापकार्य करते समय यह पापकार्य है, यह मेरा स्वरूप नहीं है, कर्मों का दंड है― इस प्रकार की प्रतीति किसके रह सकती है? तत्त्वज्ञानी हो वही यह ख्याल रख सकता है। भला कोई बहुत मिठाई भी खाता जाय और दो एक आँसू भी गिराता जाय और यह ध्यान करता जाय कि मिठाई खाना मेरा स्वरूप नहीं है, कहाँ इसमें मेरा उपयोग फँस रहा है? ऐसी बात तो तत्त्वज्ञानी पुरुष में ही पायी जाती है। तो विषयकषायों में प्रवृत्ति करते हुए उसका खेद बना रहना, उससे हटा हुआ सा रहना यह बात ज्ञान द्वारा प्राप्त होती है। जैसे सामने आग पड़ी है पीछे से किसी पुरुष को धक्का दे दिया और ऐसा धक्का दिया कि वह वहाँ ठहर न सका, आगे उसे बढ़ना पड़ा, कदम रखना पड़ा तो रखेगा तो जरूर और उस कदम में आग भी बीच में है, आग पर से भी जायगा किंतु ऐसी सावधानी से ऐसा हटा हुआ ऐसी शीघ्रता से उस पर से जायगा कि वह कम जलेगा और किसी पुरुष को पता ही नहीं है कि कहाँ आग पड़ी है और ढकेल दिया, तो वह तो खूब जल जायगा क्योंकि उसे आग का कुछ पता ही नहीं है। तो इस ज्ञान का कुछ असर तो होता ही है प्रत्येक कार्यों में। तो ज्ञान से कर्मों की निर्जरा होती है। जिसे तत्त्वज्ञान जगा है वह पुरुष धीर वीर ध्याता है। दूसरी बात है वह वैराग्यसंपन्न होना चाहिए। वैराग्य का अर्थ है उसमें राग न हो। राग न होकर भी उसमें प्रवृत्ति करना पड़ता है तो बंध वहाँ नहीं होता। आप सोचते होंगे कि ऐसा भी कोई काम है क्या कि जिसमें राग न हो और करना पड़े? हाँ है। जब किसी की शादी होती है तो उसमें पड़ोस की स्त्रियाँ गाने के लिए बुलाई जाती हैं। वे गाती हैं मेरे दूल्हा बना जैसे राम लखन। यह सब गाती हैं पर उनसे उस दूल्हा से कोई प्रयोजन है क्या? यदि दूल्हा घोड़े से गिर जाय और टाँग टूट जाय तो उन पड़ोस की स्त्रियों को उससे कोई खेद होगा क्या? खेद तो उस दूल्हे की माँ को होगा। वे स्त्रियाँ तो छटांक भर बताशों के लिए उस तरह से गाती हैं। उस दूल्हा में उन्हें राग नहीं है। किसी फर्म में मुनीम काम करता है। उसके हाथ में सारा हिसाब है, तिजोरी रखता है, बैंक का भी हिसाब रखता है, लोगों से लेनदेन करता है, यह भी कहता है कि हमको तुमसे इतना मिलना है, तुमको हमसे इतना मिलना है, यों सारी बातें करता है, व्यवहार करता है पर उस सबमें उसे राग नहीं है कि यह सब वैभव मेरा है। तो यों ही अनेक प्रसंग ऐसे हैं कि बिना राग के वे कार्य करने पड़ते हैं। कैदियों से चक्की पिसाई जाती है, स्त्रियाँ तो घर में चक्की पीसते हुए में खुश होती हैं, पर वह कैदी भी चक्की पीसते हुए में खुश होता है क्या? वह चाहता है क्या कि मुझे चक्की पीसनी पड़े? वह तो यही चाहता है कि मुझे कब इससे अवकाश मिले? तो अनेक काम ऐसे हैं जिनमें राग न होते हुए भी करने पड़ते हैं। तो इन पंचेंद्रिय विषयों में जो अंतरंग से राग नहीं है ऐसा धीर वीर पुरुष ही उत्तम ध्याता माना गया है। तीसरी बात है सम्वृत आत्मा इंद्रिय मन जिसके वश हो वह सम्वृत आत्मा है। वही धर्म का ध्याता प्रशंसनीय माना गया है। जरा जरासी बात सुनकर जिसके क्रोध उत्पन्न हो जाय, अभिमान जग जाय, मायाचार की प्रवृत्ति हो, लोभ उत्पन्न हो जाय, ऐसा पुरुष धर्मधारण नहीं कर सकता है। जरा अपने आपसे पूछो कि हे आत्मन् ! तुम्हें चाहिए क्या? अगर यह चाह बनी है कि मेरे खूब वैभव जुड़ जाय तो इस चाह से फायदा क्या? क्या मरण न होगा? क्या यह पाया हुआ वैभव एक दिन छूटेगा नहीं? अरे कौनसा ऐसा कार्य है जिसके कर लेने से इस आत्मा का भला हो? जरा सोचते जाइये, लोक में इज्जत बना लेना, बहुत से प्राणियों में अपना परिचय बना लेना, अरे इनसे इस आत्मा को लाभ क्या? यहाँ के ठाठबाटों से, विषयकषायों से इस आत्मा को कुछ भी लाभ नहीं है। चाह तो यह होनी चाहिए कि मैं अपने आत्मा में मग्न होऊँ। मैं रहूँ आप में आप लीन ऐसी चाह हो भीतर में? एक ही लक्ष्य रखें अपने जीवन में, मैं अपने आपके स्वरूप में लीन होऊँ ऐसी भावना भायें, यह चाहिए और कुछ न चाहिए। इसके अलावा कुछ भी बने बनने दो। चाह केवल यही है कि मैं अपने आपके स्वरूप में लीन होऊँ। देखो― यदि अपने आपमें सच्चाई के साथ यह चाह जगती है तो यह भी पूर्ण हो जायगी। इसी चाह का नाम है मुक्ति की चाह। मैं इन समस्त विभावों से, मोह रागद्वेषों से छुटकारा पाऊँ, ऐसा जो मुक्ति का इच्छुक पुरुष है वही उत्तम ध्याता होता है। वह आलस्यरहित हो, उद्यमी हो। प्रमादी पुरुष धर्मध्यान करने का अधिकारी नहीं है। इसीलिए प्रमादी पुरुषों को ऊनोदर तप बताया है। भूख से कम खाना, शांतपरिणामी हो उसकी प्रकृति में शांति हो। देखिये अनेक प्रकार के पुरुष मिलते हैं आजकल भी। किसी-किसी को जरा-जरासी बात भी सहन नहीं होती। और कोई पुरुष ऐसे होते हैं कि उन बातों की उपेक्षा कर जाते हैं। जिनके भीतर कुछ शिथिलता है उन्हें किसी की बात सहन नहीं होती और जिनके तत्त्वज्ञान जग रहा है उनके विरुद्ध भी कोई बात कहे तो वे उसे सहन कर लेते हैं। तो जो पुरुष शांतस्वभावी होते हैं उनमें धर्मधारण करने की पात्रता होती है। जिनका चित्त अशांत है वे पुरुष धर्म का पालन ही क्या करेंगे? वह ध्यानी पुरुष प्रशंसनीय है जो ज्ञानी हो, कष्टसहिष्णु हो। हम आपको भी चाहिए कि ऐसा तत्त्वज्ञान जगायें और भीतर में ऐसी प्रेरणा बनायें कि आर्तध्यान और रौद्रध्यान न बन सके और धर्मध्यान से अपने आत्मा को प्रसन्न रखा जा सके। मोह में, राग में, द्वेष में कुछ भी लाभ नहीं है। न शांति है और न कोई बाहरी पौद्गलिक लाभ है। आत्मा भी दिखे और नाना क्लेश भी सहने पड़ते हैं, इससे ज्ञान और वैराग्य से प्रीति जगे, यही अपने आपको संसार से निकालने के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए?


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