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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1270

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तप:श्रुतयमोद्युक्तचेतसां ज्ञानचक्षुषाम्।

विजिताक्षकषायाणां स्वतत्त्वाभ्यासशालिनाम्।।1270।।

जगत्त्रयचमत्कारिचरणाधिष्ठितात्मनाम्।

तद्गुणेषु प्रमोदो य: सद्भि: सा मुदता मता।।1271।।

जो गुणी पुरुष हैं उनमें हर्षभाव करना, हर्षभाव की भावना रखना सो प्रमोद भावना है। कैसे हैं वे गुणीजन जिनके गुणों में प्रमोद किया जाता है। वे तपश्चरण में उद्यमी रहा करते हैं। तपश्चरण नाम है इच्छा का निरोध और जो पुरुष जगत के किसी भी विषय की वांछा न रखता हो ऐसा पुरुष लोक के द्वारा भीतर से आदरणीय है और उसकी ओर लोगों का आकर्षण होता है और उसके प्रति हर्ष भावना हुआ करती है। यह तो एक साधारण बात की बात है किंतु जो मुमुक्षु जीव हैं जो इच्छा विभावों से सर्वथा मुक्त होने की वांछा रखते हैं ऐसे पुरुषों को तपस्वी गुणी जन दिख जाय, इच्छा निरोध करके जिनका मन निर्मोह और पवित्र होता है ऐसे गुणी पुरुष दिख जायें तो उनमें प्रमोदभाव करते हैं, इसी प्रकार जो श्रुत में बड़े हैं, ज्ञानदृढ़ है उनके ज्ञानगुण को निरखकर कैसा पवित्र चित्त है, रागद्वेष रहित हैं अतएव ज्ञान का बड़ा विकास है, पूर्वबद्ध ज्ञान है, अवधिज्ञान है, मन:पर्ययज्ञान है, विवेकशील हैं, शास्त्र का मर्म इन्होंने प्राप्त कर लिया है इस ही कारण संसार, शरीर, भोगों से इनका प्रयोजन नहीं रहा है। केवल एक आत्मध्यान में ही जिनकी उमंग रहती है ऐसे ये श्रुत अंतरंग तत्त्वज्ञानी जीवों के प्रति गुणों का अनुराग होना सो प्रमोदभावना है। इसी प्रकार जो यम और नियम में उद्यमी पुरुष हैं, जिनका चित्त ऐसा विरक्त है कि किसी भी व्रत संयम को आजीवन धारण करने का संकल्प करने में विलंब नहीं होता। जो उचित कर्तव्य को जीवनभर निभाने के लिए प्रतिज्ञा और समय-समय पर अनेक आवश्यक कर्तव्यों का पालन करते हैं ऐसे यमनियमसहित गुणी पुरुष हों तो उनको देखकर मुमुक्षुवों के प्रमोदभावना जगती है। जिस पुरुष के संबंध में यह विदित हो जाय कि यह बहुत आसक्त लंपटी है, खाने पीने का बहुत प्रेमी है, अपने गुजारा स्वार्थसाधना के लिए तत्पर रहता है ऐसी बात जिसके संबंध में विदित हो तो लोगों का उसके प्रति प्रमोदभाव नहीं रहता, और जो निर्मोह हैं, तत्त्वज्ञानी हैं, व्रत नियम का भली-भाँति पालन करते हैं ऐसे महतो के प्रति अनेक पुरुषों का सम्मान हो जाता है और उनके गुणों में प्रमोदभाव जग जाता है। फिर यहाँ ये मुमुक्षु जन जिनमें संसार के संकटों से मुक्त होने का साधन व्रत, नियम, संयम, ध्यान, ज्ञान माना है और इन ही बातों में बढ़े हुए हैं तो उनको देखकर निष्कपट प्रेमभाव जगता है और हर्षभाव होता है और ज्ञान ही है जिनका नेत्र ऐसे पुरुषों के गुणों में प्रमाद करना सो सज्जनों ने प्रमोद भावना माना है। एक विशेषता इनमें विषय कषायों विजय करने की होती है।

आतम का अहित करने वाले भाव हैं विषय और कषाय। जिन्होंने इन विषयकषायों को जीत लिया हे वे पुरुष लोगों की निगाह में पवित्र माने जाते हैं। सो सब समझते ही हैं। भले ही कभी गुणी जनों पर विपदा आये तो लोग उन्हें बेचारा कहकर उनका आदर करते हैं। बेचारे को देखो कैसा कर्म सता रहे हैं, यों उस गुणी जनों के प्रति लोगों की आस्था होती है। फिर जो मुक्ति के चाहने वाले हैं, जिन्होंने विषय कषायों के विजय को मोक्ष का साधन समझ लिया है वे इन विषय कषायों के विजय करने वाले पुरुषों को निरखकर बहुत हर्ष मानते हैं, यह है उनकी प्रमोद भावना और ये संत जन निज तत्त्व के अभ्यास करने में चतुर हैं। निज तत्त्व है विशुद्ध सहजज्ञानानंद स्वभाव। मेरा शाश्वत तत्त्व मेरा सहजस्वरूप है, उस ज्ञानानंदस्वरूप के उपयोग का अभ्यास रखने वाले पुरुष कितने पवित्र हैं कि देखो इनको संसार के विषयों से कोई वास्ता नहीं रहा। इन्हें किसी भी स्वार्थ से, कषाय से रुचि नहीं रही। ऐसे इस अपने अंतस्तत्त्व की धुन रखने वाले ज्ञानी जीवों के प्रति मुमुक्षु जीवों का ऐसा अपूर्व प्रमोद होता जो प्रमोद प्रिय से प्रिय कुटुंब और मित्रजनों में भी नहीं हो सकता। विशुद्ध प्रमोद यों जगता हे कि ज्ञानी जीव शुद्ध हृदय का है, निर्दोष है, निष्कपट है, और कुटुंबी जनों में, मित्रजनों में यों वैसा प्रमोदभाव नहीं जगता है कि वे अपराधी हैं, दोषी हैं, मोही हैं। तो जो निज तत्त्व का अभ्यास करने वाले हैं, जिनकी धुन केवल आत्मा के ध्यानक रहती है उनके प्रति साधारण लौकिक जनों का भी आकर्षण होता है, और जो मुमुक्षुजन हैं, मोक्ष की इच्छा करने वाले पुरुष हैं वे तो ऐसे संत जनों को निरखकर विशेषतया प्रमुदित होते हैं। जिनका आचरण इतना उत्कृष्ट है कि लोगों के चित्त में एक चमत्कार उत्पन्न करने वाले उनके गुणों में प्रमोद होना प्रमोदभावना है। प्रत्येक मनुष्य को अंतरंग से सदाचार और न्याय के प्रति अनुराग रहता है। जीव का स्वरूप हे विशुद्ध ज्ञान और विशुद्ध पथ की रुचि होना। कर्मोदयवश न चल सके, लेकिन फिर भी ऋषि पुरुषों के मन में सदाचार और न्याय के प्रति आस्था रहती है। तो जो पुरुष ऐसे आचरण के अधिकारी हैं जो सामान्य जनों से भी न किया जा सके, पंचममहाव्रत, पंच समिति, तीन गुप्ति रूप आचरण और भी उत्कृष्ट ध्यान तपश्चरण ऐसे इन आचरणों को करने वाले पुरुषों के गुणों में अनुराग होना सो प्रमोदभावना है। धर्मध्यान के प्रसंग में सर्वप्रथम उन चार भावनाओं को कहा जा रहा है जिनके भाने से मनुष्य इस लोक में आदर्शरूप होता ही है, किंतु परलोक में भी वह निष्कंटकरूप विशुद्ध जीवन-यापन करता है।


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