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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1276

From जैनकोष



भावनास्वासु संलीन: करोत्यध्यात्मनिश्चयम्।

अवगम्य जगद्वृत्तं विषयेषु न मुह्यति।।1276।।

इन चार भावनाओं में लीन हुए योगी अपने अध्यात्म का निश्चय करते हैं। आत्मा की दृष्टि आत्मा के स्वभाव पर रहे और यह अनुभव करते रहें कि मैं सबसे न्यारा ज्ञानानंदस्वरूप हूँ। ऐसे महान पुरुषार्थ का अवसर मिले, आत्मा सिवाय भावों के और कुछ नहीं करता। पाप करे तो वहाँ भी भाव ही तो बनाया कि परद्रव्य का कुछ किया। इसी प्रकार धर्म करे तो वहाँ भी भाव ही बनाया। यह जीव परद्रव्यों का कुछ भी करने में समर्थ नहीं है। तो जब यह जीव मात्र भाव ही बना सकता है तो खोटे भाव न बनाकर उत्तम भाव बनायें। सब जीवों का स्वरूप अपने ही स्वरूप के समान समझना और ऐसे उस सामान्य चित्स्वरूप का ध्यान करना जिस ध्यान में यह एक रस हो जाता। जगत के जीवों को अपने ही स्वरूप के समान समझता। इस प्रकार अपने शुद्ध स्वरूप की भावना में जो लीन होता है वही अध्यात्ममर्म का परिचयी बन सकता है। यही सारभूत है ऐसा ही करने से जीव का उद्धार है। ये दिखने वाले पदार्थ इंद्रिय के विषयभूत पदार्थ हैं क्या? एक स्कंध हैं। अनेक परमाणुवों का मिलकर पिंड बनता है और देहरूपी पिंड तो ऐसा अपवित्र है कि जिसमें सार का कोई नाम नहीं है। ऐसा जो शरीर के प्रति भली-भाँति जानता है वह विषयों में मुग्ध नहीं होता। जिन जगत के जीवों में लोग कीर्ति चाहते हैं, मान चाहते हैं, यश चाहते हैं वे लोग हैं क्या चीज? यहाँ वहाँ से अनेक गतियों से मरण करके आज इस भव में आये हैं, कर्मों के प्रेरे हैं, जन्म मरण का चक्कर लगा है, स्वयं अशरण हैं, ऐसे इन अशरण पुरुषों में क्या मुग्ध होना? जो ज्ञानी पुरुष हैं वे इन जीवों में मुग्ध नहीं होते। तो चार प्रकार की भावनाओं का पालन करने के लिए उपदेश किया गया है ऐसी भावना भावें कि हे नाथ ! मेरा आत्मा सब जीवों में मित्रता को धारण करे। मेरा कोई विरोधी नहीं। मैं किसी का विरोधी नहीं। कोई भी मेरे प्रतिकूल चले, अन्याय करे, अपने को न जँचे तो भी स्वरूप को समझकर उसका कल्याण ही चाहें। उसके प्रति यदि अपना बर्ताव भला रखें तो फिर उसका विरोधी कहाँ रहा? किसी भी विरोधी का घात करके मिटाने से समझना कि मेरा विरोध मिट गया तो यह भूलभरी बात है।

अपने ही स्वरूप के समान उनके स्वरूप का स्मरण रखकर उनमें मित्रता धारण करें। जो गुणी पुरुष हैं, सम्यग्दृष्टि हैं उनके सम्यक्त्व में प्रमोद जगना, हर्ष मानना यह भी तत्त्वज्ञानी जीव कर पाते हैं। जिसे सम्यक्त्व जगा है वही दूसरों पुरुषों के सम्यक्त्व गुण में रुचि करेगा। जिसे सम्यग्ज्ञान जगा है वह पुरुष दूसरों के ज्ञानगुण में अनुराग करेगा। जिसे स्वयं में प्रेम है व्रत, तप, नियम का जो पालन करता है, वह ही पुरुष दूसरों के यम नियम आचरण को देखकर उनमें हर्ष मानेगा। हे प्रभो ! मेरा आत्मा गुणी पुरुषों को देखकर हर्षभाव को धारण करे, ऐसे ही कोई क्षुधा से, तृषा से या ठंड गर्मी से अनेक प्रकार से दु:खी हों उनको देखकर चित्त में दयाभाव हो जाना सो कारुण्य है। दया जब उत्पन्न होती है तो उससे रहा नहीं जाता उसका दु:ख दूर करने का यत्न करता है। कोई पुरुष ऐसा सोचे कि शास्त्र में लिखा है कि दुखियों को देखकर दया का परिणाम कर लेंगे स्वर्ग मिल जायगा। यों दया का परिणाम कोई मुँह से कर ले तो उसमें दया का परिणाम नहीं बन पाया। जब दूसरे के दु:ख को देखकर खुद का हृदय सुखी हो जाता तब उसमें दया का भाव आता है, उस समय अपने दु:ख को शांत करने के लिए यह उपाय है कि उसका दु:ख कर लें। यों एक प्रसिद्ध उलाहना है कि कोई बुढ़िया गोबर से अपना घर लीप रही थी, उसे रूढ़िवश कुछ धर्म से प्रेम था। तो वह यह कहती जाय कि चींटी-चींटी चढ़ो पहाड़, तुम पर आयो गोबर की धार। तुम न चढ़ो तो तुम पर पाप, हम न कहें तो हम पर पाप। तो यह दया का कोई भाव नहीं है। तो ऐसी ही कोई जाप्ता की कार्यवाही किसी दु:खी को देखकर दया का परिणाम कर लेना यह तो दया का सच्चा भाव नहीं है। जैसे लोग धर्म का पाठ एक जाप्ते से कर लेते हैं तो धर्म नहीं लगता। आत्मदृष्टि बने, ज्ञानस्वभाव से प्रेम जगे और इस ही ज्ञान में लीन होने की उत्सुकता बने तो धर्म का पालन होता है। यों जाप्ते की कार्यवाही से धर्म का लाभ नहीं मिलता। तो ऐसे ही दु:खी जीवों को देखकर हृदय में करुणा जग जाय। जैसे शास्त्र में लिखा है कि मनुष्यों को दान देने में पुण्य होता है और दान कोई कर रहा है उसका अनुमोदन करने से पुण्य होता है, तो दान दो तो उतना ही पुण्य और अनुमोदना करो तो वही पुण्य, इसलिए रोज अनुमोदना करते जावो तो यह कोई सही करुणा नहीं है। यद्यपि अनुमोदना करने से पुण्य का कुछ न कुछ लाभ होता ही है पर दान पुण्य स्वयं कर सके तो उससे विशेष लाभ है। ऐसे ही दु:खी जीवों को देखकर मन में दया का भाव उत्पन्न करना उन्हीं पुरुषों में संभव है जो दूसरों के दु:ख को मिटाने का यत्न करते हैं। हे प्रभो ! मेरा आत्मा दु:खी जीवों को देखकर दया से भर जाय, यों ही जो प्रतिकूल हैं, उद्दंड हैं ऐसे पुरुषों में उपेक्षाभाव धारण करें। इस प्रकार जो भावना में लीन होते हैं, जगत की वृत्ति को जानते हैं वे अपने आत्मा में अध्यात्म निश्चय करते हैं और विषयों में मुग्ध नहीं होते।


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