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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1308

From जैनकोष



श्रूयंते संवृतस्वांत: स्वतत्त्वकृतपिश्चया:।

विसह्योग्रोपयर्गाग्निं ध्यानसिद्धिं समाश्रिता:।।1308।।

जिन्होंने अपने मन को सम्वररूप किया, मन को रोका, संकल्पों का द्वार बंद किया, स्वतत्त्व में निश्चय किया ऐसे ही पूर्व पुरुष तीव्र उपसर्गों को सहकर ध्यान करते सुने गए हैं और अनेक तो ऐसे हुए कि उपसर्गों के कारण उनकी जल्दी सिद्धि हो गयी, उपसर्ग उन्हें वरदान हो गए। तो उपसर्ग जैसे वेदना को सह लेने का कारण है स्वतत्त्व में निश्चय। मैं यह हूँ। जो कोई यह मान ले कि यह मेरा घर है तो सामने के घर चाहे बरसात में गिर जायें पर उतनी वेदना न जगेगी जितनी कि अपना माना हुआ घर गिर जाने पर जगेगी। तो जिसे मान लिया कि यह मेरा वैभव है, उसके अतिरिक्त जो कुछ भी हो बाह्य में वह सब किसी भी स्थिति को प्राप्त हो उसमें वेदना नहीं मानता यह जीव। तो जिन्होंने अपने इस ज्ञानानंदस्वरूप को माना कि यह मैं हूँ। यह मेरा सब कुछ है। उसको इस स्वरूप से अतिरिक्त अन्य सब पदार्थ बाह्य नजर आते। उसी में यह शरीर भी बाह्य है। तो बाह्य की कुछ भी परिस्थिति हो उस परिस्थिति में विह्वलता नहीं हुआ करती। तो बड़े-बड़े उपसर्ग अग्नि को उन्होंने सहा जिन्होंने अपना मन नियंत्रण में किया और निज अंतस्तत्त्व का निश्चय बनाया। वे उपसर्ग अग्नि को सहकर ध्यानसिद्धि को प्राप्त हुए। ज्ञानवस्तुत: वह कहलाता है जो ज्ञान-ज्ञान के स्वरूप का ज्ञान करता रहे। जैसे कोई जड़ को जाने तो कहते हैं क्या जड़ में उपयोग देकर जड़ बनते हो? तो जो जिसमें उपयोग दे वह अपने को वही अनुभवने लगता है। जैसे कोई लड़का अपने बारे में ऐसा सोचने लगे कि मैं तो घोड़ा हूँ। दोनों पैर और दोनों हाथ जमीन पर धरकर चले और पीठ पर किसी को बैठाल ले, यह मेरा सवार है और मुँह में एक रस्सी दाब ले, यह मेरा लगाम है, सवार को पकड़ा दे, वह घोड़ा बनकर चलता है, अपने को घोड़ा मान लेता है और सामने से ऐसे ही बने हुए लड़के का एक घोड़ा और आया। आमने-सामने आने पर कुछ हाथ मारने से लगे, उस समय वे भूल जायेंगे कि मैं तो बालक हूँ। वे तो घोड़े बन गए अपने-अपने ज्ञान में, थोड़ी उनमें आपस में ठुकाई पिटाई हुई और ठुक पिटकर वे अपने-अपने घर चले जाते हैं। तो जिस ओर ज्ञान हुआ उसको वही कह देते हैं। जो ज्ञान अज्ञान को विषय कर रहा हो वह ज्ञान भी जड़ है, जो ज्ञान पर को भी विषय कर रहा हो वह ज्ञान भी पर है। यों चलते-चलते अंतर में देखने लगे कि जो ज्ञान ज्ञान के स्वरूप को जानता हो वह ज्ञान है। जो असली सोने का पारखी हो उसके पास कोई जरा भी खोटा सोना लायें तो वह फेंककर कहता कि यह क्या पीतल लाये, उसको सोने की सुध छूट गयी। यों ही जो ज्ञान अपने स्वरूप को विषय न करके जड़ को विषय करे तो तत्त्वज्ञान की दृष्टि में वह ज्ञान ज्ञान ही नहीं कहलाता, वह अज्ञानभाव है। ऐसा ज्ञान में जिसके निश्चय बना हुआ है ‘यह मैं हूँ’ वे कठिन से कठिन उपसर्गों में भी चलित नहीं होते और उन्हें सहकर ध्यान की सिद्धि को प्राप्त कर लेते हैं।


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