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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 131

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श्वभ्रे शूलकुठारयंत्रदहनक्षारक्षुरव्याहतै।

स्तिर्यक्षु श्रमदु:खपावकशिखासंभारभस्मीकृतै:।।131।।

मानुष्येऽप्यतुलप्रयासवशगैर्देवेषु रागोद्धतै:।

संसारेऽत्र दुरंतदुर्गतिमये बंभ्रंयते प्राणिभि:।।132।।

नरक में भ्रमण और क्लेश― इस दुरंत दुगर्तिरूप संसार में यह जीव यों निरंतर भ्रमण करता है। कभी यह जीव नरकों में गया तो वहाँ अनेक तरह के दु:ख हैं, किसी को शूली पर चढ़ा दिया किसी को कुल्हाड़ी से काट डाला, किसी को घानी में पेल दिया, किसी को आग में पटक दिया, किसी को छार से ढक दिया, किसी को अनेक शस्त्रों से पीड़ा पहुँचाया, यों अनेक तरह के दु:ख उन नरकों में प्राप्त हुए हैं और इतना ही नहीं इस देह के तिल-तिल बराबर टुकड़े फिर मिल जाते हैं, मरते नहीं हैं। देह की भी कैसी-कैसी विचित्रताएँ हैं? यहाँ किसी एक आदमी की भी हत्या कर दी जाय तो उसे फाँसी का दंड दिया जाता है। कोई पुरुष उद्दंड होकर हजारों आदमियों की हत्या करा दे, क्रूरता ही बनाये रहे तो उसका दंडविधान यहाँ क्या हो सकता है? उसका दंड तो ऐसी नरकगति में उत्पन्न होना ही है। कई बार शरीर छिद जाय, देह के तिल-तिल बराबर खंड हो जायें फिर भी मरे नहीं। ऐसे दु:ख इस जीव ने सहे हैं।

तिर्यंचों में भ्रमण और क्लेश― तिर्यंचों में उत्पन्न हो तो वहाँ भी बड़े परिश्रम का दु:ख भोगना पड़ता है। शक्ति से भी अधिक बोझ लादा जाता, चाबुक मारकर उन्हें चलाया जाता। बेचारे वे पशु जीभ निकालते जाते हैं फिर बड़ी तेजी से चाबुक मार-मारकर उनसे बोझा ढुलाते हैं। डंडों की मार अथवा कीलियों से चुभोया जाना, यह सब उनको चलने के लिए प्रेरित करते हैं। वे पशु किसको अपने दर्द की कहानी सुनायें? किसी-किसी पशु को यों ही अग्नि में डाल दिया जाता है। माँसभक्षी लोग जिस पर वश नहीं चलता उसे तो मारकर पीछे पकाकर खाते हैं और जिस पर वश चलता है उसे सीधा यों ही अग्नि में डाल देते हैं। कितनी क्रूरता है एकेंद्रिय व विकलत्रिकों के तो क्लेश ही अटपट हैं। यों नाना प्रकार से क्लेश इस तिर्यंच गति में यह जीव सहता है।

मनुष्यभव में क्षुब्ध प्रयास― मनुष्य हुआ तो क्या, वहाँ भी बड़े-बड़े परिश्रम के क्लेश सहता है। रात दिन विकल्प और बहुत से कामों के करने का यत्न इस सबका श्रम सहता रहता है। कल्पनाएँ तो बहुत की, पर अंत में उनसे फल क्या मिला? लो जीरो उत्तर आयेगा। कितने वर्ष लगा दिए मोहवश दूसरों की रक्षा में, राग में, प्रसन्न करने में? बहुत-बहुत निर्वाह किया सब तो लोगों का, अंत में इसके हाथ लगा क्या? यह मरा और फिर अकेला आ गया ! मिला क्या? कुछ भी नहीं। यह मनुष्य भी रागवश बड़े-बड़े प्रयास करके केवल संक्लेशों को सहता है।

देवलोक में बरबादी― कभी देव हुआ तो वहाँ राग से उद्दंड रहा करता है। खाने पीने का तो दु:ख वहाँ है नहीं, दुकान, रोजगार करने का तो वहाँ काम है नहीं। वैक्रियक शरीर है। तो ऐसी सुविधा में उनके राग प्रबल हो जाता है और रागदाह से जल भुनकर वे अपने जीवन को यों ही समाप्त कर देते हैं। सागरों की आयु उनकी होती है, किंतु उस सुख में ऐसा मस्त हो जाते हैं कि सुख का समय कैसे व्यतीत हो गया? यह वे जान नहीं पाते।

तथ्य की बात― यों यह जीव चारों गतियों में भ्रमण कर-करके नाना क्लेशों को सहता है। क्या सार है? निर्धन धन के बिना दु:खी हैं। धनी तृष्णा के कारण दु:खी हैं। मूर्ख ज्ञान के न होने से दु:खी हैं, कुछ पढ़ लिख भी गए, पर लौकिक ज्ञान की तृष्णा से, लोगों के द्वारा सम्मान अपमान आदि की शंका से, कल्पनाओं से दु:खी रहा करते हैं। यों ही सभी बातों में लगा लो। तथ्य की बात यह है कि यह संसार सुखपूर्व नहीं है, असार है। यहाँ रमण किये जाने योग्य कुछ भी नहीं है। हितपद रम्य तो एक निज सहजस्वरूप है, उसकी ओर झुकाव हो तो कल्याण है।

ज्ञानार्णव प्रवचन द्वितीय भाग समाप्त


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