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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1313

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स्थानासनविधानानि ध्यानसिद्धेर्निबंधनम्।

नैकं मुक्त्वा मुने: साक्षाद्विक्षेपरहितं मन:।।1313।।

यह जो एक आसन का विधान बताया है यह साधारणजनों के लिए जो ध्यान में अभ्यस्त नहीं हैं किंतु ध्यान चाहते हैं ऐसे पुरुषों को कहा गया है। वस्तुत: तो जो यथार्थ में तत्त्वज्ञानी हैं, विरक्तचित्त पुरुष हैं, सम्वेग परिणाम से युक्त हैं अर्थात् धर्म में अनुराग होना और संसार शरीर योगों से विरक्त होना ऐसा धर्मानुराग और वैराग्य से युक्त हैं वे पुरुष तो सभी अवस्थावों में ध्यान कर सकते हैं। जिसके चित्त में वस्तु का यथार्थस्वरूप प्रतिभासता है वह पड़ा हुआ बैठा हुआ कैसे भी हो, उसका चित्त ध्यान में बना रहता है। हाँ साधारण जनों के लिए अभ्यास का धुन बताया है। स्थान उत्तम हो और आसन भी स्थिर हो लेकिन बड़े-बड़े भी तत्त्वज्ञानी पुरुष करते सब विधि का ही कार्य हैं। योग्य स्थान में रहना और दृढ़ आसन करके रहना, पर जो अभ्यस्त योगीश्वर हैं वे किसी आसन में भी न हों। यथा तथा बैठे हों तो भी उनके ध्यान बन जाता है। ध्यान तो मन की वृत्ति के अनुसार बनता है। मन चलित न हो, मन वश हो तो लो ध्यान बन गया और ध्यान भी क्या उत्तम ध्यान वही है जिस ध्यान में केवल यह अनुभव चलता हो― ज्ञान ज्योतिमात्र को निरखकर कि मैं तो यह ज्ञानमात्र हूँ। इस प्रकार केवल ज्ञानानुभूति जिसके चलती हो उनके ध्यान है। ध्यान में और चाहिए क्या? एक यह अनुभव चाहिए। जैसा है, आत्मा का सहजस्वरूप है उस स्वरूपमात्र अनुभव चाहिए। केवल एक ही बात चाहिए धर्म के लिए, अनेक झगड़े नहीं हैं। जैसा मैं केवल ज्ञानस्वरूप हूँ वैसा मैं अपने को प्रतीति में ले लूँ, यह हूँ मैं। ऐसी प्रतीति अनुभूति आत्मा के ध्यान का विशेष स्थान पाती है। जो पुरुष सम्वृत है, अपने इंद्रिय और मन को वश किए हुए है, धीर है, स्थिर चित्त वाला है, जिसको आशय में निर्मलता है वह पुरुष आत्मध्यान को कर लेता है। निर्मल आशय में अपने लिए तो एक विशुद्ध ज्ञानस्वरूप के अनुभव की बात होना, मुझे चाहिए क्या― इसके उत्तर में जिसको केवल यह आता हे कि मैं सहजस्वरूप से जैसा हूँ ऐसा ही रहूँ, और कुछ चाहिए ही नहीं। जो रागद्वेष मोह की विडंबनाएँ बखेड़े उत्पन्न हुए थे वे सब दूर हों, जो पुरुष निर्मल आशय हों उनके तो एक ज्ञानस्वरूप की दृष्टि रहती है और दूसरों के प्रति निर्मल आशय होने का भाव यह है कि समस्त जीव सुखी हों ऐसी भावना दूसरे लोगों के प्रति जगना और अपने आपको सर्व वैभवों से, परिग्रहों से निर्मल मानना, केवल ज्ञानस्वरूप अनुभवना यह ही निर्मल आशय कहलाता है। सदोष आशय यह है कि बाह्य पदार्थों में ममता होना, आत्मीयता होना, यह ही मैं हूँ, इससे ही मेरी जिंदगी है, यों वस्तुस्वरूप के प्रतिकूल भाव बनाना यह सदोष आशय कहलाता है। अपनी रक्षा केवल एक इस अनुभव में हैं कि में तो मात्र ज्ञानस्वरूप एक स्वतंत्र पदार्थ हूँ। दूसरे जीवों से या वैभव आदिक से मुझ आत्मा में कोई अतिशय उत्पन्न नहीं होता। किसी भी परपदार्थ से मुझमें कोई परिणति नहीं होती। यह में भी जो कुछ कर पाता हूँ अपने आपके प्रदेशों में ही, जो कुछ ज्ञानमय भाव करता हूँ सो ही कर पाता हूँ। ऐसा विशुद्ध सर्व विविक्त ज्ञानमात्र अपने आपको निरखना यही निर्मल आशय है। सो ऐसे धीर वीर पुरुष निर्मल चित्त वाले समस्त अवस्थावों में सब जगह सब समय ध्यान करने के योग्य बनते हैं।


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