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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1318

From जैनकोष



मुख्योपचारभेदेन द्वौ मुनी स्वामिनौ मतौ।

अप्रमत्तप्रमत्ताख्यौ धर्मस्यैतौ यथायथम्।।1318।।

जो प्रमत्त हैं, आत्महित में जिनका उत्साह नहीं जगा है ऐसे ज्ञानी पुरुष भी ध्याता तो माने गए हैं परंतु वे उत्कृष्ट ध्याता नहीं हैं। जो विकल्प रखते हैं, घर में रहते हैं, किंतु हैं ज्ञानी, यथार्थ निर्णय उनके हो गया है ऐसे जन अधिक से अधिक पंचम गुणस्थान तक के होते हैं और प्रमाद तो छठे गुणस्थान तक होता है, तहाँ तक तो यह जीव एक साधारण ध्याता है और जब प्रमाद भी मिट गया और आत्मा के दर्शन में निरंतर सावधानी रहती है तो वह अप्रमत्त है, वह ध्यान का मुखरूप से स्वामी है और जो प्रमत्तविरत हैं वे ध्यान के उपचार से स्वामी कहे गए हैं। हम आप भी गृहस्थावस्था में रहकर मुख्यतया ध्याता नहीं हो सकते। अनेक विकल्प अनेक शिथिलताएँ बसी हुई हैं तो मुख्यरूप से ध्याता अप्रमत्त पुरुष ही होता है। तो जो अप्रमत्त हो, जिसका संस्थान उत्तम हो और शरीर भी वज्रवत् हो, अपनी इंद्रिय को वश रखने वाला हो, और ज्ञान भी बहुत अधिक बढ़ा चढ़ा हो, जो अपने आपके मन को रोक सकते हैं ऐसे स्वरक्षित आत्मा उत्कृष्ट ध्यान के ध्याता कहे गए हैं। ध्यान में असल में बाधा तो आती है विषयकषायों के भावों से। रंच भी किसी भी विषय में अनुराग हो तो धर्म में ध्यान कहाँ से जमेगा? परिग्रह वैभव में अनुराग हो वहाँ मंदिर में कब तक बैठा जा सकेगा? तो जो समृद्ध आत्मा है, अपने मन को वश में रखने वाला है वह पुरुष उत्तम ध्यान का ध्याता होता है जिसके प्रसाद से मुक्ति प्राप्त होती है। तो जो वज्रकाय हों, स्थिर चित्त वाले हों, पूर्व के ज्ञाता हों, अपने को स्वरूप जिन्होंने कर लिया हो ऐसे पुरुष धीर वीर संपूर्ण लक्षण वाले ध्याता माने गए हैं। ध्यान का संबंध ज्ञान से है, जिसने अपने आपके सम्वररूप का परिचय पा लिया है वह ज्ञानी पुरुष निराकुल रहा करता है। आकुलता है किसी परपदार्थ में चित्त लगाने में। सब जगह निर्णय कर लो, सभी परिस्थितियों में देख लो।

सर्व समय देख लो, जब भी कभी कोई आकुलता होती है तो वह आकुलता किसी न किसी परपदार्थ में इच्छा, आशा, वासना बनाये रहने के कारण है। तो आकुलता है अज्ञान की भ्रम की। भ्रम मिटा कि आकुलता मिटी, झट वहाँ सुखी हो गए। परपदार्थों में ममता का परिणाम करने का कितना कठिन भ्रम जीवों को लगा है, पर हैं अपने प्रदेशों से अत्यंत भिन्न। मेरे सोचने से किसी भी परपदार्थ में कोई परिणमन होता नहीं हैं, ऐसे अत्यंत भिन्न हैं समस्त पदार्थ मेरे आत्मा से, फिर भी उस ही ममता की ओर अपने को ले जायें तो स्वयं दु:खी होते हैं। जीव को सुखी अथवा दु:खी करने वाला कोई बाहर में नहीं है, भ्रम मिटा कि वे सब दु:ख मिट जाते हैं। जैसे स्वप्न में कोई गड़बड़ बात देख लिया, वन में फँस गए, कोई शेर आ रहा है, वह मुझ पर पंजा मारने वाला है, ऐसी खोटी बात स्वप्न में कोई देख ले तो उस समय यह कितना दु:खी रहता है? स्वप्न में यह मालूम नहीं होता कि मैं स्वप्न देख रहा हूँ, फिर स्वप्न ही क्या रहा, तो जैसे स्वप्न में देखी हुई बात मायारूप है, परमार्थभूत नहीं है इसी प्रकार ये सब अज्ञान, ये सब मायारूप हैं, ये मेरे नहीं हैं, यों सबसे निराले अपने आपके स्वरूप की दृष्टि करना सो धर्मपालन है, और इस धर्म के होते संते अशांति नहीं हो सकती। अशांति तो परपदार्थों में ममत्व करने से है। ममता छोड़ दें अभी अशांति मिट गयी। तो अशांति दूर करने के लिए यत्न होना चाहिए तत्त्वज्ञान के अर्जन का। तत्त्वज्ञान का मतलब संक्षेप में इस प्रकार समझिये जगत में जितने भी पदार्थ हैं वे सब पदार्थ अपने-अपने स्वरूप को लिए हुए हैं। जैसे यहाँ हम आप सब जीव हैं हम सुखी हों, खुश हो जायें तो सब कहाँ सुखी हो पाते हैं? इससे जाना जाता है कि वे भिन्न हैं। यों सर्व पदार्थों से अपनी भिन्नता निरखना यही है तत्त्वज्ञान। जब कभी कोई संकट की स्थिति आये तो तुरंत ख्याल बदल लें। संकट है क्या? बाह्य पदार्थों में, जड़ अथवा चेतन पदार्थों में किसी प्रकार का कुछ परिणमन हो तो वह मेरा स्वरूप है। ऐसे ही समस्त पदार्थ अपने आपके स्वरूप में परिणमन करते हैं। मेरा किसी भी परपदार्थ से संबंध नहीं। जो कुछ करता हूँ उसका फल स्वयं भोगता हूँ। मैं तो केवल अपने आपके इस चैतन्य स्वरूप में रमा करता हूँ, ऐसी दृष्टि कोई बनाये तो उसका संकट क्षण भर में दूर हो जाता है।


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