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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1320

From जैनकोष



श्रुतेन विकलेनापि स्वामी सूत्रे प्रकीर्तित:।

अध:श्रेण्यां प्रवृत्तात्मा धर्मध्यानस्य सुश्रुत:।।1320।।

कितने ही आचार्यों ने यह बताया है कि धर्मध्यान के ध्यानी 4 प्रकार के जीव होते हैं। असंयत सम्यग्दृष्टि, देशविरत, प्रमत्त विरत, और अप्रमत्त विरत। असंयत सम्यग्दृष्टि तो वह श्रावक है जिसके व्रत तो नहीं हो पाता, पर सम्यक्त्व जग गया है। जिसके सम्यक्त्व जग जाता है उसे व्रत धारण करने की ओर प्रीति जगती है। यद्यपि यह बात है और सम्यक्त्व जग जाने पर जब तक संयम नहीं बना तब तक वह अविरत सम्यग्दृष्टि जीव कहलाता है। तो ध्यान के ये भी स्वामी हैं तत्त्वज्ञानी पुरुष और इससे ऊँचे स्वामी हैं पंचम गुण स्थान वाले जीव। उनके मन है, चर्चायें करते हैं और ज्ञानावरण का ऐसा क्षयोपशम है कि उनके ज्ञान जग रहा, विवेक जग रहा, पर संयम नहीं है, पर उसके सम्यग्ज्ञान हो जाय, वह कहलाता है अविरत सम्यग्दृष्टि जीव। ध्यान उसके भी होता है। तो यहाँ असंयत सम्यग्दृष्टि जीव ध्यानी पुरुषों में एक छोटी श्रेणी के ध्यानी हैं और उससे बढ़कर ध्यानी है देशविरत, जिसको संयमासंयम प्रकट हो गया है, सम्यग्दर्शन भी हो गया है वह जीव देशविरत गुणस्थान वाला कहलाता है। इसके त्रस जीव की हिंसा का सर्वथा त्याग है और प्रयोजन बिना स्थावर हिंसा भी नहीं करता। झूठ, चोरी, कुशील आदि का भी त्याग है। ऐसे पुरुष कहलाते हैं देशविरत वाले जीव। ये असंयत सम्यग्दृष्टियों से बढ़कर है। तीसरी पदवी है प्रमत्तविरत की। मुनि हो गए पर अभी प्रमाद है, धर्म के धारण का उत्साह नहीं है, ऐसे जो प्रमादी जीव हैं किंतु तत्त्वज्ञान जगने के कारण उनके भीतर में वैराग्यता है, तो जो ज्ञानी हैं, विरक्त हैं और कर्मोदय के कारण उनके संयम प्रकट नहीं हो सका है अथवा संयम हो भी गया है किंतु प्रमाद नहीं हटा, ऐसे योगीश्वर प्रमत्त गुणस्थान वाले जीव कहलाते हैं, उनके भी ध्यान होता है। और अंतिम हैं अप्रमत्त जीव, सप्तम गुणस्थान वाले जीव। यह ध्यान सप्तम गुणस्थान के अधिकारी जीवों को माना गया है। ये जितने भी ध्याता जीव हैं सबके मूल में एक कला बराबर पड़ी रहती है। तो ये 4 प्रकार के जीव ध्यान के अधिकारी बताये गए हैं और जब तत्त्वज्ञान जग जाता हे किसी को तब वे ध्यान के अधिकारी होते हैं। प्रमाद न रहे तो वह उत्कृष्ट ध्याता है। सब कुछ गाड़ी ध्यान पर चल रही है। खोटे ध्यान हैं तो संसार चलता है, कुछ विशुद्ध ध्यान है तो संसार की अच्छी-अच्छी पदवियाँ प्राप्त होती हैं, पूर्ण विशुद्ध ध्यान हो तो उससे मुक्ति की प्राप्ति होती है। यों ध्यान के ध्याता पुरुष 4 तरह के बताये गए हैं। संयमशील, सम्यग्दृष्टि पंचम गुणस्थान वाले सम्यग्दृष्टि। जो प्रमादरहित योगीश्वर हैं ऐसे अप्रमत्तविरत ये सब ध्यान के अधिकारी कहे गए हैं।


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