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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1325

From जैनकोष



वातातपतुषाराद्यैर्जंतुजातैरनेकश:।

कृतासनजयो योगी खेदितोऽपि न खिद्यते।।1325।।

सर्वप्रथम तो चित्त को प्रसन्न करने वाले रमणीक स्थान में जाना चाहिए और फिर उस स्थान में बड़े हर्ष के साथ एक प्रभुभक्ति का यत्न रखकर आत्मस्मरण का पुरुषार्थ करके जो प्रदीपमान रहता है ऐसा श्रीमान योगी वैभववान पर्यंक आसन का आश्रय लेता है। सुरमणीक स्थान हो और चित्त में प्रसन्नता हो, आसन स्थिर हो तो आत्मा के अनुभव होने में उसे विलंब नहीं लगता। तो योगी पुरुषों को इन दो बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि एक तो रमणीक स्थान हो, अनेक दोषों से रहित हो, चित्त में प्रसन्नता देवे ऐसा स्थान हो, फिर वहाँ बड़ा हर्ष मानते हुए― मैं इस समय अपने आपके कारणपरमात्मतत्त्व का अवलंबन ले रहा हूँ, उसमें बड़ा हर्ष मानते हुए पद्मासन को स्थिरता से मारें, ऐसा आचार्यदेव योगी जनों को उपदेश कर रहे हैं।


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