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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 133

From जैनकोष



महाव्यसनसंकीर्णे दु:खज्वलनदीपिते।

एकाक्येव भ्रमत्यात्मा दुर्गे भवमरुस्थले।।133।।

भवमरुस्थल में जीव का एकाकी भ्रमण―यह आत्मा महान् आपत्तियों से भरे हुए और दु:ख की ज्वालावों से जाज्वल्यमान् संसाररूपी मरुस्थल में अकेला ही भ्रमण करता है। यह संसार मरुस्थल की तरह है। जैसे मरुभूमि में मनुष्यों का पता नहीं, वृक्ष तक भी नजर नहीं आते, केवल एक नीरस धूल ही धूल पड़ी हुई है, पानी का भी निशान नहीं। जहाँ अत्यंत दीप्त ज्वालाएँ लपटे चला करती हैं, ऐसे मरुस्थल की तरह यह संसार है। इसमें भी अपना कोई सहारा नहीं। किसी की छत्रछाया भी यहाँ काम नहीं करती। साथ ही अनेक प्रकार के कष्टों की ज्वालाएँ यहाँ भरी हुई हैं, ऐसा दुर्गम यह संसारमरुस्थल हैं। इसमें यह जीव अकेला ही भ्रमण करता है।

शरीर का अंत में टकासा जवाब―भैया ! जिस शरीर को इतना जीवन में खिलाया, हिसाब लगाओ तो जिसकी 60-70 वर्ष की उमर है, करीब-करीब एक वैगन भर भोजन खा लिया होगा। जिस शरीर को नाना रसीले व्यंजन बना-बनाकर खिलाया, बड़े श्रम कर करके जिसे पुष्ट किया है उस शरीर से विदा होते समय यह जीव, यह मनुष्य कहता है कि अरी काया, इस समय और सब कुछ छूटा जा रहा है, छूटने दो, हमने उनका कुछ किया भी नहीं, लेकिन तुम्हारी तो हमने बड़ी फिक्र रक्खी। रात दिन कुछ नहीं गिना। रात में भी खाया, दिन में सूर्योदय से पहिले से ही चाय होना, थोड़ी देर बाद नाश्ता होना, भोजन होना और नवीन-नवीन प्रणाली के बिस्कुट हैं, और कैसे-कैसे ढंग से रात दिन खूब खिलाते पिलाते रहे, खूब सेवा की तेरी, तुझे श्रृंगार से सज धज से रक्खा, बढ़िया कपड़े पहिनाये, नाना तरह के गहने पहिनाये, बड़ा साज श्रृंगार सजाया, अब हे काया, तू तो चलेगी ना साथ? और तो कोई चल नहीं रहे। तब काया का उत्तर यही होता है कि अरे बावले जीव ! तुझे कुछ होश नहीं है, तू बेहोशी में बातें करता है। अरे मैं बड़े-बड़े चक्रवर्ती तीर्थंकर और बड़े-बड़े पुरुषों के साथ नहीं भी गयी। तू तो एक तुच्छ किंकर-सा है। उसकी तो यह आन बान है कि साथ नहीं जाता।

जीव का सर्वत्र एकाकीपन―यह जीव इस संसार में जहाँ कष्ट ही कष्ट भरे हुए हैं अकेला ही भ्रमण करता है। मरने पर भी अकेला ही है और जीवन में भी अकेला ही है। कुछ त्रुटि बन जाय, कुछ विकल्प हो जाय, कुछ भावना बने, उन सबका जो कुछ परिणाम होता है उसे वह अकेला ही भोगता है। यह संसार मार्ग में भी अकेला ही है और मुक्ति के मार्ग में चले तो वहाँ भी अकेला ही है। यह जीव अकेला ही अपने कर्म करता है और अकेला ही कर्मों के फल को भोगता है।



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