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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1343

From जैनकोष



समाकृष्य यदा प्राणधारणं स तु पूरक:।

नाभिमध्ये स्थिरीकृत्य रोधनं स तु कुंभक:।।1343।।

चित्त को स्थिर बनाने के लिए एक साधन है प्राणायाम का। । प्राणायाम में श्वास को धीरे-धीरे खींचना और फिर पेट में हवा को रोकना, फिर उस वायु को धीरे-धीरे नाक से निकालना, इस क्रिया को प्राणायाम कहते हैं। इस श्लोक में पूरक और कुंभक का वर्णन है। जो श्वास लेता है उसे तो कहते हैं पूरक याने हवा को पूरे और बीच में हवा को नाभि की जगह रोकना इसका नाम है कुंभक। और हवा को छोड़ना इसका नाम है रेचक। इससे शरीर को भी लाभ है। और प्राणायाम की विधि से जानते हैं कि रोग का इलाज प्राणायाम से कर लेते हैं और प्राणायाम से सारे देह में सिद्धि हो जाती है और चित्त भी एक ओर लग जाता है। तो पहिले पूरक का तो वर्णन किया था, अब यह कह रहे हैं कि जिस समय यह योगी हवा को खींचकर प्राणों को धारण करता है तो शरीर में पूर्णतया उसे थाम ले इसका नाम पूरक है और नाभि के मध्य में स्थिर करके रोक लेना इसका नाम कुंभक है। प्राणायाम में हवा यदि शांत मुद्रा से बैठी हुई होगी तो 12 अंगुल दूर से हवा खिंचती है। जैसे कभी अनुभव किया हो― जोर से यदि श्वास लेते हैं तो कुछ दूर तक की चीज नाक में भिड़ जायगी, कोई कागज के टुकड़े पड़े हों तो श्वास भीतर लेने से वे अपनी ओर खींच जाते हैं तो उसे मानते हैं कि इतनी दूर से हवा खींची और उससे भी दूर से हवा खिंचती है, पर वहाँ असर नहीं होता। तो जो शांत मुद्रा से प्राणायाम किया जाता है वहाँ अधिक से अधिक 12 अंगुल दूर से हवा खिंचती है और साथ ही जो मस्तक में अधर तालू हे, जो बच्चों का कँपता रहता है, तालू में तालू से भी हवा अंदर से अपने आप स्वमेव खींचती है उस हवा को नाभि की जगह रोक लेना इसका नाम है कुंभक। खूब पद्मासन लगाकर अपने पीठ पेट को बिल्कुल सीधा रखकर धीरे-धीरे हवा को अंदर ले जाय और धीरे-धीरे हवा को फैँके तो उसकी क्रिया में अनेक रोग दूर हो जाते हैं, चित्त स्थिर होता है और ध्यान के लिए इससे बहुत सहयोग मिलता है।


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