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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1386

From जैनकोष



पूर्णे वरुणे प्रविशति यदि वामा जायते क्वचित्पुण्यै:।

सिद्धयंत्यीचिंतितांयपि कार्याण्यारभ्यमाणानि।।1386।।

इस स्वरविधि में मंडल का ज्ञान करना कठिन है। इतना तो हर एक कोई देख लेगा कि हमारी श्वास दाहिनी चल रही है या बाईं, लेकिन मंडल का ज्ञान करना कठिन है। यह श्वास पृथ्वीमंडल की है अथवा किस मंडल की है? इसका पता नहीं होता, परंतु अभ्यास करने वाले पुरुष जो 10-20 दिन श्वास परीक्षा करते रहें तो उनको इस बात का अभ्यास बन जाता है। यदि वरुणमंडल का पवन अर्थात् जलमंडल की वायु पूर्ण होकर प्रवाहित हो रही हो अर्थात् श्वास निकालकर श्वास ली जा रही हो उस समय जिसका वायुस्वर चल रहा हो तो उसको अनेक कार्यों की सिद्धि बताई गयी है।स्वर कभी बहुत देर तक किसी एक ओर से नहीं चलता। सुबह किसी ओर से श्वास निकली, दोपहर को किसी ओर से। कदाचित् बहुत देर तक भी श्वास निकले और बायें ओर से निकले तो ठीक है। दाहिनी ओर से यदि बहुत देर तक निकलती रहे तो वह रोग अनिष्ट आपत्ति आदिक का सूचक है। अध्यात्म मार्ग में प्रवेश करने वाले अपने आपके आत्मतत्त्व में बहुत कुछ हित की बात परखने वाले पुरुष ऐसे कलावान होते हैं कि जिसमें अन्य-अन्य परिज्ञात संबंधी कलायें हुआ करती हैं। स्वरविज्ञान एक महानिमित्त विज्ञान है। श्रुत ज्ञान में जो महानिमित्तों का वर्णन है, जिससे देश का, व्यक्ति का शुभ अथवा अशुभ परख लिया जाता है उन निमित्तों में स्वरविज्ञान का बहुत ऊँचा स्थान है। जैसे ग्रह विज्ञान, चंद्र सूर्य आदिक नवग्रह आदिक इनके विज्ञान से दृढ़ विज्ञान है सामुद्रिक शास्त्र का विज्ञान क्योंकि शरीर में कुछ विशेष चिन्ह होंगे वे शुभ और स्वलक्षण सुंदर रचनावान होंगे तो वे उसके पुण्यभाव से, पुण्यकर्म से विशेष संबंध रखने वाले होते हैं तो जैसे ग्रहविज्ञान से सामुद्रिक शास्त्र का विज्ञान एक दृढ़ परिचय वाला है ऐसे ही स्वरविज्ञान भी एक दृढ़ परिचय वाला है। उस स्वरविज्ञान से ये सब शुभ और अशुभ की बातें बतायी जा रही हैं।


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