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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 146

From जैनकोष



इह मूर्तममूर्तेन चलेनात्यंतनिश्चलम्।

(शरीर मुह्यते) मोहाच्येतनेनास्तचेतनम्।।146।।

मोहवश शरीर का वहन―इस जगत् में मोहवश इस अमूर्तिक जीव को, इस मूर्तिक शरीर को अपने साथ-साथ लगाये रहना पड़ता है। यह आत्मा अमूर्तिक है, शरीर मूर्त है, विलक्षण लक्षण है फिर भी इस जीव को यह शरीर अपने साथ-साथ लगाये रहना पड़ रहा है। यह जीव चल है, इसमें तो उर्ध्वगमनशक्ति है और यह शरीर अचल है, अर्थात् इसमें अपने आप चलने का कोई माद्दा नहीं है। मुर्दा शरीर जो है उसकी तरह यह शरीर है, लेकिन इस जीव के साथ यह शरीर कैसा लगा फिर रहा है? जीव चेतन है और शरीर अचेतन है। कोई मित्रता की गुंजाइश नहीं है, भिन्न-भिन्न स्वरूप है लेकिन मोह के कारण इस जीव को कैसा शरीर के साथ लगा रहना पड़ रहा है? अन्यत्व भावना के इस प्रकरण में यह बात दिखाई जा रही है कि यह शरीर जीव से कैसा तो पृथक् है और कैसा यह संपर्क बीत रहा है।

क्लेशों का कारण काय―सच समझिये कि इस जीव को जितने भी क्लेश हैं वे सब इस शरीर के कारण हैं। शरीर के कारण से ही तो भूख, प्यास, ठंड, गर्मी के दु:ख सहने पड़ रहे हैं। जीव के स्वरूप में भूख, सर्दी, गर्मी कहाँ है? जितने रोग हैं वेदनाएँ हैं वे सब इस शरीर के कारण ही तो सहने पड़ते हैं। इष्ट का वियोग हो तो उसमें यह दु:ख मानता है। ये दु:ख इस शरीर के संबंध से ही तो लग रहे हैं, हम यों शरीर वाले हैं। जब दूसरे शरीर वाले को देखकर इष्ट अथवा अनिष्ट मानते हैं, शरीर रहित केवल यह मैं स्वयं ही होऊँ उसको फिर इष्ट क्या अनिष्ट क्या? शरीर लगा रहने के कारण विषयों के साधनों की वृत्ति होती है और विषयसाधना का कार्य पड़ा हुआ है, इस कारण दूसरे इष्ट भी अनिष्ट जंचने लगते हैं। शरीर भी रहा आये, पर शरीर न रहने की तरह हो जाय अर्थात् यह जीव विषयों का साधन न बनाये, न करे तो फिर कौन इसके लिए इष्ट है और कौन अनिष्ट है? तो इष्टवियोग का दु:ख होता है वह भी शरीर के संपर्क के कारण। अनिष्ट संयोग का दु:ख होता है वह भी शरीर के संबंध के कारण। कोई भी जीव केवल अपने शुद्ध स्वरूप के लिए इच्छा नहीं बढ़ाता। शरीरादिक परद्रव्यों का इसने अपनायत किया है तब इसके इच्छा जगी। है कोई ऐसा जीव जो शरीर में अपनायत न करे शरीर के विषयों के साधनों में रंच भी वृत्ति न जगाये और फिर निदान बाँधे इच्छा करे। कर ही नहीं सकता।

शरीर में सारहीनता―इस शरीर में सार का नाम नहीं है, मल से भरा हुआ पिंड है यह। कोई इस शरीर में उत्कृष्टता नहीं, विवेक नहीं, बुद्धि नहीं। किसी भी ढंग का तो नहीं है शरीर, लेकिन मोहवश यह जीव इस शरीर को ही अपना सर्वस्व समझता है। जब तक शरीर लगे रहेंगे तब तक जीव को संकट है। संकट तभी छूटेगा जब शरीर का कर्मों का बंधन मिटेगा।

विवेकी का मूल लक्ष्य―प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन का कोई न कोई एक मूल लक्ष्य बनाए रहते हैं। किसी के लक्ष्य में यह है कि में अच्छे परिवार वाला बनूँ, लड़के बहुत निपुण बन जायें, किसी के लक्ष्य में यह है कि मैं धन में सबसे अच्छा कहलाऊँ, किसी के चित्त में यह है कि मैं देश का अधिकारी बनूँ। प्रत्येक मनुष्य अपना कोई न कोई मूल लक्ष्य लिए हुए रहता है, किंतु विवेकी मनुष्य वही है जो सबका यथार्थस्वरूप जानकर अपना यह लक्ष्य बनाए कि मुझे तो जैसा मैं केवल हूँ उस प्रकार रहना है।

आत्महित की योजना―जैसे देशों के हित में कोई योजना ऐसी हो कि 20 वर्ष बाद सफल हो, 50 वर्ष बाद सफल हो तो देशवासी उसे करते हैं ना। कोई पूछे―क्यों करते हो, तुम तो 10-5 वर्ष में ही मर जाओगे। क्या पता कि क्या होगा, क्या न होगा, पर देश की बात एक देश जैसे व्यापक ढंग से सोची जाती है, इस कारण 20-50 वर्ष बाद भी जो प्रभाव बन सकेगा उसका उद्यम अभी से किया जाय, पर यह अपने आत्मा के बारे में जो अनंत काल जैसी व्यापक बात सोचता है, उसके लिए एक भव नहीं, चाहे 10 भवों में सिद्धि मिले, किंतु उसकी योजना और उस योजना पर कुछ अपना अमल अभी से करने की जरूरत है। अपना मूल लक्ष्य यह होना चाहिए कि मुझे तो समस्त परवस्तुओं से रहित केवल निजस्वरूप मात्र रहना है, मेरा तो यही प्रोग्राम है। सफल कब होंगे―5 वर्ष बाद हो तो भी क्या? एक भव में भी हों तो भी क्या, कभी हों, पर ऐसा किए बिना गुजारा तो नहीं है, अतएव यह लक्ष्य अभी से बना लेना चाहिए।

भेदविज्ञान से प्रगति―जिनका आत्मस्वरूपविकास का लक्ष्य बना होगा वे शरीर में रहते हुए भी शरीर ढो नहीं रहे हैं। जीव जीव में, शरीर शरीर में हैं। जो होना है वह निमित्तनैमित्तिक संबंध से हो रहा है, पर मोह न होने से यह शरीर का ढोने वाला भी नहीं कहा जा सकता है किन्हीं अंशों में। यहाँ अपने आप पर दृष्टिपात कीजिए कि मैं क्या हूँ और कहाँ जुत रहा हूँ? मैं कैसा निर्भार हूँ और कैसा भार में पड़ गया हूँ। मैं कैसा सूक्ष्म अमूर्त अव्याबाध तत्त्व हूँ और इसकी आत क्या स्थिति बन रही है? ऐसा विचार विवेक बनाने से स्वयं से वह प्रगति जगेगी जो अपने लिए हितकारी होगी।


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