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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 149

From जैनकोष



मूर्तैविचेतनेश्चित्रै: स्वतंत्रै: परमाणुभि:।

यद्वपुर्विहितं तेन क: संबंधस्तदात्मन:।।149।।

संबंध न होने पर भी शरीर का थोपा जाना―मूर्तिक चेतनारहित नाना प्रकार के स्वतंत्र परमाणुओं से बना हुआ यह शरीर और अमूर्तिक चैतन्यमय केवल अपने अखंड एकत्व को लिए हुए यह आत्मा, इन दोनों में एक विचार तो करो कि क्या संबंध है? आत्मा का शरीर क्या लगता है? जैसे यहाँ कल्पना में यह मानते है ना कि यह मेरा पुत्र है, मित्र है, भाई है। इस शरीर के साथ तो बताओ क्या नाता है? यह शरीर तुम्हारा कौन है? लड़का या बाप है? कौन लग रहा है यह शरीर? कुछ संबंध भी तुमसे है क्या? अत्यंत तो भिन्न स्वरूप है, कुछ भी संबंध नहीं है लेकिन यह तो उपद्रव लगा है कि जो शरीर में बँधे-बँधे फिरते हैं। अरे आत्मन् ! तुम्हें आनंद ही तो चाहिए या शरीर का संबंध चाहिए? अरे आनंद जिस पद्धति में मिले, जिस उपाय से प्रकट हो उस उपाय में बढ़िये। शरीर का संबंध तो क्लेश का ही कारण होगा। यह शांति का कारण तो हो ही नहीं सकता।

शरीर से हित का अभाव―आत्मा में शांति परिणमन करना है उस शांति परिणमन में यह शरीर कैसे साधक बनेगा।? कोई ढंग भी है क्या? शरीर पर दृष्टि जायेगी जीव की तो इसका भाव यह है कि अपने स्वरूप से चिगकर बाहर में दृष्टि जायेगी, सो बाहर में ऐसी दृष्टि का लगना क्षोभ से भरा हुआ है। बाहर की ओर दृष्टि जाना ही क्षोभ का एक स्वरूप है। क्या संबंध बना है, किसी काम आया और शरीर? जैसे दुष्ट मित्र, मूर्ख मित्र चाहे वह किसी परिस्थिति में प्रेम का बर्ताव करता हो, पर जिसका चित्त दुष्ट है अथवा जिसमें अज्ञान पड़ा हुआ है उससे सुख संतोष साता की क्या आशा की जा सकती है? ऐसे ही समझिये कि यह शरीर किसी परिस्थिति में किसी हद तक किन्हीं कल्पनाओं में यह भला जँचता हो लेकिन यह अज्ञ है और दुष्ट है, भिन्न है। इस शरीर से अपने सुख अथवा शांति की क्या आशा की जा सकती है? क्षोभ को व दु:ख को ही एक आराम मान ले कोई मोहवश तो उसका यह मानना उसके घर की कल्पनाएँ हैं―जो चाहे कर लो, पर सुख शांति इस शरीर के संबंध से किसी जीव को नहीं हो सकती है।

आत्महितोद्यम―भैया ! इस शरीर से अपने को भिन्न परखकर इसके खातिर विकल्प न बढ़ायें और अपने आपका स्वरूप अपने आपमें ही रत रहे, स्थिर रहे, स्वयं स्वयं में मग्न हो सकें, ऐसी स्थिति बनाने का लक्ष्य रहना चाहिए। जब शरीर भी मेरा नहीं है तब फिर अन्य जीव मेरे क्या हों? जैसे चमड़ा ही नहीं रहा शरीर पर तो रोम कहाँ ठहरेंगे? यदि बाह्य वैभव का अन्य सब समागमों का मोह मिटाना है तो पहिले इस देह का ही मोह मिटा लीजिए ना। जब अपने आपको देह से प्रकट निराला आप स्वयं जंचने लगेंगे तो यह सबसे निराला अपने को सुगमतया मान ही लेगा। सर्व परवस्तुओं से भिन्न अपने आपको निरखना, यही एक शांति के मार्ग में लगा देने वाला मार्ग है।


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