• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1511

From जैनकोष



तत: सोऽत्यंतभिंनेषु पशुपुत्रांगनादिषु।

आत्मत्वं मनुते शश्वदविद्याज्वरजिह्मित:।।1511।।

मूल में इस जीव ने ऐसा माना था कि यह मैं हूँ। जो देह हे, पर्याय है उसको नजर रखकर माना था कि यह मैं आत्मा हूँ। जब अपने देह को अपना आत्मा माना तो पर के देह को परआत्मा मानता है। इसके बाद पुत्र, मित्र, स्त्री आदिक जो अत्यंत भिन्न हैं उनमें आत्मत्व मानता है कि ये मेरे हैं। अभी इस देह तक ही इसकी मान्यता थी जो छुड़ाये छूट नहीं सकती। इस पर्याय तक सदा साथ रहती है। अब इस देह से भी अत्यंत भिन्न, जिससे हमारा कोई संबंध नहीं है, ऐसे पशु, पुत्र, स्त्री आदिक में भी मानता है कि यह मेरा है। सो यह अज्ञान ज्वर का माहात्म्य है। पदार्थ संसार में जितने हैं वे सब इकहरे हैं, केवल अपना-अपना स्वरूप अपने में रखते हैं, अपने ही उत्पादव्ययध्रौव्य से अपना परिणमन कर रहे हैं। किसी भी पदार्थ से कोई संबंध नहीं है। यद्यपि निमित्तनैमित्तिक भाव इतना घनिष्ठ है कि जिससे मालूम होता कि इस पदार्थ ने ही अमुक को यों कर दिया। यह गैस जल रही है, इसमें हवा भर दिया, लो प्रकाश बढ़ गया। लगता तो यह है कि देखो हवा ने रोशनी बढ़ा दिया, पर हवा हवा में है, रोशनी रोशनी में है। निमित्त तो है पर हवा के उपादान से रोशनी नहीं बढ़ती। निमित्तनैमित्तिक भाव तो है पर एक दूसरे का कर्ता कर्म नहीं है। यों किसी भी पदार्थ का किसी भी अन्य पदार्थ के साथ संबंध नहीं है। लेकिन यह अज्ञानी जीव अविद्या ज्वर से पीड़ित होकर पशु मित्रादिक में अपना आत्मत्व मानता है।




पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_1511&oldid=83431"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:33.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki