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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1515

From जैनकोष



वपुष्यात्ममनि: सूते बंधुवित्तादिकल्पनम्।

स्वस्य संपदमेतेन मन्वानं मुषितं जगत्।।1515।।

इस संसार में हम सब प्राणी अनादि से जन्म-मरण करते चले आ रहे हैं। जिस भव को धारण किया उस भव में ही अनेक कष्ट भोगे। उन कष्टों से छुटकारा पाने के लिए भी बहुत-बहुत प्रयत्न किया, लेकिन अब तक कष्टों से छुटकारा नहीं मिला। अब भी बहुत-बहुत प्रयत्न करते हैं कि कष्टों से छुटकारा मिल जाय। कभी-कभी धर्मभावना से हम धर्मकार्य भी करते हैं, उसका भी उद्देश्य यही है कि हमें शांति मिले, कष्टों से छुट्टी मिले। किंतु कष्टों से छुट्टी न मिली तब सोचना होगा बड़ी गंभीरता के साथ कि आखिर हमारी वह कौनसी गलती है जिस गलती के कारण हमें कष्टों से छुट्टी नहीं मिल सकी। तो पहिले तो यह ही सोचिये कि कष्ट है क्या? कष्ट नाम है किसका? कोई पुरुष बड़ा धनी हो, बहुत-बहुत उसके पास आराम के साधन हो, फिर भी चित्त में पर के प्रति स्नेह हो, राग हो, द्वेष हो, कुछ चित्त में विकल्प आयें तो सुख के साधनों में रहकर भी अशांत रहता है और तपस्वीजन जिनका वंदन करने के लिए हम आप घर छोड़कर आये हैं, जिनका गुण स्मरण करने के लिए हम आप अनेक क्षेत्रों पर भ्रमण कर रहे हैं उन तपस्वीजनों ने घरबार छोड़कर निष्परिग्रह होकर एकाकी स्थिति में रहकर वह आत्मीय आनंद प्राप्त किया जिस आनंदरस में तृप्त होकर बडे से बडे तपश्चरण में भी जिन्होंने आनंद समझा। तब विचार करिये कि कष्ट नाम है किसका? कष्ट नाम है विकल्पों का। जब तक विकल्प उमड़ रहे हैं तब तक जीव को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। जगत में यद्यपि किसी का कुछ हे ही नहीं, खूब बाहरी दृष्टि से विचारो― जिस मकान में रहते हैं वह मकान भी आपका नहीं है, जिस देह में आप रहे हैं वह देह भी आपका नहीं है। इस जगत में अनंते जीव हैं, सभी यत्र-तत्र जन्म-मरण कर रहे हैं। कोई दो चार जीव आपके घर में आ गए तो क्या वे आपके हैं? अनंतानंत जीव हैं। जैसे सभी भिन्न हैं वैसे ही ये भी अपना अलग-अलग स्वरूप रखते हैं, सभी अपने-अपने कर्म लिए हुए हैं। क्या है इस जगत में इस जीव का? ये धन वैभव तो प्रकट भिन्न पड़े हैं ढेला पत्थर की तरह। उनके प्रति आपके जो रागादिक भाव उठ रहे हैं ये भाव भी आपके बनकर नहीं रह पाते। ये भी मिटने के लिए उत्पन्न होते। फिर आप सोचें कि इस जगत में अपना है क्या? है कुछ नहीं अपना, फिर भी रागद्वेषमोह के कारण नाना विकल्प मच रहे हैं और उससे नये विकल्पों की सृष्टि हो रही है। उन्हीं विकल्पों के कारण कष्ट है और कोई कष्ट नहीं है। जिस किसी भी पुरुष के कष्ट की कहानी सुनो तो उनमें वह कष्ट विकल्पों का कष्ट मालूम होगा और दूसरों के कष्ट की कहानी सुनकर हम उसे मूर्ख समझ लेंगे कि यह कितना हठी है। न करे इसकी रुचि, न करे इसका मोह, लेकिन अपने आप पर जो रागद्वेषमोह की वृत्ति बनी है उस पर कोई नहीं सोचता। यह कष्ट नाम है विकल्पों का। विकल्प कैसे मिटें उसका उपाय हमारे अनुभवी आचार्यों ने बताया है। यह हम आपका बहुत बड़ा सौभाग्य है कि तपस्वी जनों ने अपना अनुभव ग्रंथों में लिख दिया तो आपको यों प्राप्त हो गया। जैसे कोई बना बनाया भोजन आपके सामने रख दे फिर भी आप उसे न खाना चाहें तो यह कितनी बड़ी मूढ़ता की बात है?

हम जरा देखें तो सही― स्पष्ट बताया है कि जगत में प्रत्येक पदार्थ अपना-अपना स्वरूप लिए हुए है, अपने ही उत्पाद से उत्पन्न होता है। किसी भी पदार्थ का परिणमन किसी अन्य की परिणति से नहीं बनता। तब स्वतंत्र हुए न सब ये वचन बोले जा रहे हैं ये भी स्वतंत्र पदार्थ हैं। यह मैं आत्मा जो यह इच्छा कर रहा हूँ वह भी स्वतंत्र पदार्थ है। पर जगत में पर पर निमित्तनैमित्तिक मेल ऐसा है कि किसी वस्तु का निमित्त पाकर अन्य पदार्थ अपनी योग्यता माफिक परिणमते हैं। तब प्रत्येक पदार्थ अपना-अपना स्वतंत्र रूप रख रहे हैं। तो देखिये सर्वप्रथम गलती तो यह है कि अपनी देह में ऐसी आत्मबुद्धि लगाये हैं कि हम उससे पृथक अपने को मान नहीं सकते। जो शरीर है सो मैं हूँ। शरीर को आराम चाहिए चाहे अपने आपकी कितनी भी हिंसा हो रही हो, जहाँ राग बढ़ता है, जहाँ शरीर के आराम के लिए प्रमाद बसाये जाते हैं वहाँ आत्मा का घात है। शरीर में जो आत्मबुद्धि हुई है उस आत्मबुद्धि के कारण धन आदिक की कल्पनाएँ हो जाती हैं और उन कल्पनाओं से ही यह जगत इस लोक को अपनी संपदा मानता है और खुद ठगाया गया है। देखिये गलती मूल में हम आपकी कितनी है? यही है कि शरीर को माना है कि यह मैं हूँ। केवल इतनी मान्यता की गलती है पर इस गलती का फैलाव इतना भयंकर है कि कितनी ही तरह के शरीर धारण करने पड़ते हैं। कितने जन्म मरण के कष्ट उठाने पड़ते हैं। यह सब एक गलती का परिणाम है कि हम जिस पर्याय को पाते हैं उस ही पर्याय में आत्मबुद्धि कर लेते हैं और जब इस पर्याय में आत्मबुद्धि की तो बाहर में अन्य शरीरों में यह बुद्धि करने लगा कि यह मेरा कुछ है। धन वैभव आदिक भी मेरे कुछ हैं। बस ममता और अहंकार इन दोनों भावों से यह संसारी प्राणी ठगाया गया है। यद्यपि मोह में ऐसा लगता है कि अपना घर है, बड़ा आराम है, खूब वैभव है, अच्छी तरह रहते हैं किंतु इसकी खबर नहीं है कि शुद्ध ज्ञानरस से परिपूर्ण सबसे निराला अरहंत आत्मा की तरह सर्वज्ञता की शक्ति रखने वाला यह आत्मा अपने स्वरूप की सुध खोकर दीन बना फिर रहा है। अपने आपके आत्मा के निकट आयें और उस चैतन्यरस का पान करके तृप्त होवें। जगत में तृप्ति के योग्य बाहर में कुछ भी पदार्थ नहीं हैं। तृप्ति हो सकती है तो अपने आपके स्वरूप में मग्न होने से हो सकती है।बाहर में किन पदार्थों को जोड़कर हम तृप्त होना चाहते हैं। ये तो सब पुण्य पाप के ठाठ है। उदय पुण्य का है तो लक्ष्मी आती है और जब पाप का उदय आता है तो यह लक्ष्मी विघट जाती है। जहाँ हमारा कोई हाथ नहीं उसके लिए तो हम रात-दिन विकल्प करें और मोक्ष का मार्ग जहाँ हमारा हाथ हे हम अपने स्वरूप को जानें, उसी के निकट रहें, पर के सुध भूलें, विकल्पजाल तोड़े। यह काम मेरे हीकरने का तो है। मैं ही तो कर सकूँगा। जो ज्ञान खुद कर सकने का है उसे तो करें नहीं और जहाँ हमारा कोई हाथ नहीं, अधिकार नहीं उसमें हम विकल्प उठायें यह हम आप जड़ में भूल कर रहे हैं। हम कुछ समय तो इस प्रकार का भाव लायें कि हमारा मनुष्य जन्म पाना, श्रावक कुल पाना सफल हो जाये।




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