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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1523

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शृंखलायां यथा वृत्तिर्विनष्टे भुजगभ्रमे।

तन्वादौ मे तथा वृत्तिर्नष्टात्मविभ्रमस्य वै।।1523।।

जैसे सांकल में जब सर्प का भ्रम नष्ट हुआ तो सांकल में ऐसी यथावत प्रवृत्ति होती है उसी प्रकार मेरे शरीर आदिक में जब आत्मत्व का भ्रम नष्ट हुआ, अर्थात् जब भ्रम से रहित हो गया तब मेरी शरीर आदिक में यथावत प्रवृत्ति हुई अर्थात् ममत्व का परिहार हुआ। शरीर आदिक ज्ञेयमात्र रहे। जैसे रस्सी में भ्रम था वह पुरुष एक उत्साह बनाकर धीरे-धरे आगे बढ़कर दृश्यमान पदार्थ में लक्षण निरखकर जब यह जानकर अरे यह तो रस्सी मालूम होती है तो और आगे बड़ा। खूब उठा उठाकर देखा, ज्ञान हो गया कि यह रस्सी ही है। अब उस पुरुष से कोई कहे कि हम तुमको 10 हजार रुपया देते हैं, तुम जैसे पहिले व्याकुल हो रहे थे, घबड़ा रहे थे, जरा वैसी ही फिर चेष्टा करना, तो ऐसा वह न कर सकेगा। हाँ भले ही लोभवश दिखावा में वह वैसी चेष्टा करे लेकिन अंत में न वह व्याकुलता है, न शंका है, न डर है। ऐसे ही जिस ज्ञानी पुरुष ने सुलक्षण पहिचानकर सबसे निराले चैतन्यमात्र आत्मतत्त्व का अनुभव कर ले उस पुरुष को अब इन लौकिक बातों में भय नहीं होता। किसी भी लौकिक वैभव को देखकर उसके वह भ्रम नहीं है जो अज्ञानदशा में था। परपदार्थों में झुकने वाले बड़े-बड़े महाराजावों ने दयापात्र कर संतोष के, किंतु आशावश खोया ज्ञान, बना भिखारी निपट अज्ञान― यह स्थिति दिखती है। यों भ्रम दूर हो गया ज्ञानी के तो आशा नहीं रही, अब वह प्रसन्न रहता है। साथ ही उसके यह श्रद्धा बन गयी है कि इच्छाएँकरने में रखा क्या है, सार क्याहै? वहाँ भी सार नहीं है।यों परस्पर बंधन है कि जब इच्छा की जाती है तब भोग नहीं रहते, जब भोग है तब उस जाति की इच्छा नहीं रहती। बड़े-बड़े लोग जब कोई मन में चाह उत्पन्न करते हैं वे चाहते हैं कि यह तुरंत काम हो। छोटी-छोटी सी बात में किसी को इच्छा हुई कि हमें तो पापड़ खाना हे तो कहता है कि हमें तुरंत पापड़ बनाकर खिलावो। अरे तुरंत कहाँ धरे हैं। कुछ तो समय लगता ही है। मामूली सी बात में भी जिसमें कुछ तत्त्व नहीं रखा है चाहतेहैं कि जिस समय इच्छा हुई उसी समय पूर्ति हो, मगर स्वरूप तो देखिये, वास्तविकता देखिये― चक्रवर्ती तीर्थंकर के भी यह नहीं हो सकता है कि जिस समय इच्छा हुई उसी समय उस इच्छा की पूर्ति हो जाय।थोड़ा सुनने में कुछ कठिन सा लग रहा होगा कि ऐसे पुण्यवान चक्रवर्ती के भी यह बात नहीं होती कि जिस समय इच्छा हुई उसी समय उस इच्छा की पूर्ति हो जाय। अरे यह तीर्थंकरों ने ही बताया है हम अपनी बात नहीं कह रहे हैं किंतु ऐसा होता है सो सुनिये। इच्छा का नाम है वेद्यभाव। हम आगम के शब्द पर कह रहे हैं और बोधक का नाम है वेदकभाव। मान लो किसी को इच्छा हुई कि हमें 2 हजार र. का लाभ हो तो उसी समय दो हजार रु. धरे हैं क्या? अगर धरे हुए हैं ऐसा कोई सोचता है। मानो दो हजार मिल भी जायें तो उसी समय नहीं मिले जब कि दो हजार रुपयों की चाह हुई। इच्छा के समय इच्छा की पूर्ति नहीं होती तब फिर ऐसी इच्छा का हम क्या करें? जो इच्छा केवल सताने का ही काम रखे, जिसका और कोई प्रयोजन नहीं, दु:खी करने की ही जिसकी वृत्ति है ऐसी इच्छा का हम क्या आदर करें?

ज्ञानी पुरुष का चिंतन एक अलौकिक चिंतन होता है, जिसे लौकिक जन नहीं सोचते― उनकी चिंताएँ और हैं, ज्ञानी पुरुष का चिंतन और भाँति है। ज्ञानी पुरुष के साथ वर्तमान में वैभव भी हो तो भी वह वैभव से इतना हटा होता है श्रद्धा में, अंतरंग में जितना कि श्रद्धा में साधु हटा हुआ है। एक राग की प्रेरणा हैसो चारित्र में नहीं उतर पाया है, पर श्रद्धा में ऐसा नहीं है कि गृहस्थ मानता हो कि घरबार सारा नहीं तो कुछ-कुछ तो मेरा है, मेरे आत्मा के सहज चैतन्यस्वरूप के अतिरिक्त अन्य कुछ भी परतत्त्व मेरा नहीं है ऐसा बार-बार सोचना चाहिए। इसी कारण वर्तमान परिग्रह मेरा परिग्रह नहीं। रागवश जितना बिगाड़है वह राग का परिग्रह है, पर श्रद्धा का परिग्रह नहीं है, क्योंकि परिग्रह तीन प्रकार के होते हैं― अतीत, वर्तमान और भावी। अतीत तो गुजर ही गया, उसका क्या ममत्व करें? भावी वर्तमान में है ही नहीं, उसकी क्या आकांक्षा करें? इतने लंबे प्रोग्राम नहीं होते ज्ञानी के, और वर्तमान परिग्रह में वह वियोगबुद्धि कर रहा है कि मैं इससे कब हट जाऊँ, ऐसी निवृत्ति किया है तब समझ लीजिए कि सम्यक्त्व की महिमा कितनी निर्लेपता, श्रद्धा में प्रकट हो जाती है। सारांश यह है कि हम आपका शरण तो आत्मा है, इसको हम परमात्मा के स्मरण से ही पुष्ट करते हैं। उस आत्मा की शरण में जायें तो हम शांत हो सकेंगे, मुक्त हो सकेंगे और पर की ओर लगे रहे तो जन्म मरण की परंपरा है।




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