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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1532

From जैनकोष



अलौकिकमहो वृत्तं ज्ञानिन: केन वर्ण्यते।

अज्ञानी बध्यते यत्र ज्ञानी तत्रैव मुच्यते।।1532।।

कहते हैं कि ज्ञानी पुरुष का बहुत अलौकिक चारित्र है। जिसका कौन वर्णन कर सकता है? जिस आचरण में अज्ञानी कर्मों से बंध जाता है उसी आचरण में ज्ञानी बंध से छूट जाता है। यह बड़े आश्चर्य की बात है। जैसे भोग और उपभोग में अज्ञानी को ममता है तो भोग और उपभोग करता हुआ यह अज्ञानी जीव बंध जाता है और ज्ञानी को भोग और उपभोग से अरुचि है, वैराग्य है, चाहता नहीं है सो कदाचित भोगोपभोग आ जायें तो उसमें पूर्वकृत कर्म खिरते है, नवीन कर्म नहीं बंधते हैं। चेष्टा एक सी है पर ज्ञानी पुरुष कर्मों से नहीं बंधता हे और अज्ञानी पुरुष कर्मों से बंध जाता है। ज्ञानी ने अपने आपका अनुभव किया है जिस अनुभव के प्रसाद से ज्ञानी जीव जागरूक रहता है, अपने में सावधान रहता है और कर्मों से नहीं बंधता। यह सब सम्यक्त्व का प्रताप है। सम्यग्दर्शन के होने पर सारा प्रोग्राम अलौकिक हो जाता है।


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