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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1534

From जैनकोष



मयि सत्यपि विज्ञानप्रदीपे विश्वदर्शिनि।

किं निमज्जत्ययं लोको वराको जन्मकर्दमे।।1534।।

मुझमें सूक्ष्मरूप से दिखने वाले ज्ञानस्वरूप दीपक के होते हुए एक यह दीनवत संसाररूपी कीचड़ में क्यों डूब रहा है? ज्ञानी का यह चिंतन है कि मेरा ऐसा स्वरूप है कि मैं सारे लोकालोक को स्पष्ट जान लूँ। यों कहो कि जो भगवान का स्पष्ट है वही मेरा स्वरूप है। ऐसा महान स्वरूप वाला होकर भी मैं क्यों संसार के परद्रव्यों की ओरखिंचा जा रहा हूँ? यह बड़ी विपदा की बात है। अरे अपने आत्मा की ओर क्यों नहीं देखते? अपने आत्मा की ओर देख लिया तो फिर संसार कीचड़ में न रुलेगा। सबसे निराला केवल ज्ञानप्रकाशमात्र, जिसके रंच भी रागादिक दोष नहीं हैं ऐसा जो अपने आत्मा का शुद्ध ज्ञानप्रकाश है उस ज्ञानप्रकाश को क्यों नहीं देखते हो? उस ज्ञानमात्र आत्मा में क्यों लीन नहीं होता, ऐसा ज्ञानी पुरुष एक चिंतन कर रहा है।


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