• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1536

From जैनकोष



स एवाहं स एवाहमित्यभ्यस्यन्ननारतम्।

वासनां दृढयन्नेव प्राप्नोत्यात्मन्यवस्थितिम्।।1536।।

तो जैसा अपने आत्मा के बारे में अभी तक कहा जा चुका है― मैं सबसे निराला हूँ, केवल अपने स्वरूपमात्र हूँ, ज्ञानानंदमात्र हूँ, चेतना स्वरूप जिसका प्रकाश है ऐसा मैं अलौकिक प्रकाशमय पदार्थ हूँ जैसा जो कुछ अभी वर्णन किया है उसमें जो निरखा है वही मैं हूँ, वही मैं हूँ, इस प्रकार का अभ्यास करें। मैं क्या हूँ? इसके निर्णय पर सारा भविष्य निर्भर है। सो जब जैसा है यह में उस ही प्रकार अनुभवा तो यह पुरुष उस भावना को दृढ़ करता हुआ अपने आत्मा में अपने को अवस्थित करता है अर्थात् ठहरा लेता है। आत्मा आत्मा में ठहर जाय यही तो मोक्ष का मार्ग है, यही शांति की बात है। ये व्यर्थ में अज्ञानी जन बाह्यपदार्थों में कल्पना से ठहरे रहते हैं। ठहरता कोई नहीं बाहरी पदार्थ में। जैसे घर-बार को कोई अपना माने तो क्या वह अपना हो जाता है? वह अपना मान भर रहा है। और न माने तो अपना नहीं, ‘माने तो अपना नहीं’ अब मानने में चूँकि मिथ्या बात मानेगा इसलिए क्लेश होगा और न माने तो क्लेश न होगा। चीज जहाँ की तहाँ पड़ी है। चीज न अपने को मिले और न अपने से कई हाथ दूर हो जाय। चीज है, वह मेरे से अत्यंत भिन्न है। मैं अपने स्वरूप में हूँ, बाह्य पदार्थ अपने स्वरूप से हैं और बराबर पड़े हैं। और जो अपनाता है कि यह मेरा है उसको क्लेश होता है, जो अपनाता नहीं है उसको क्लेश नहीं होता है।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_1536&oldid=83458"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:33.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki