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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1559

From जैनकोष



अंत:र्दु:खं बहि: सौख्यं योगाभ्यासोद्यतात्मनाम्।

सुप्रतिष्ठितयोगानां विपर्यस्तमिदं पुन:।।1559।।

संसार का कोई भी समागम मेरे लिए शरणभूत सारभूत नहीं है, सोच लीजिए खूब। जो-जो समागम मिले उन सब समागमों में आपने पाया क्या, और उन समागमों से आपके हाथ आज रखा है क्या? ज्यों के त्यों एकाकी अकेले परपदार्थों से न्यारे बने ही हुए हैं तो परपदार्थों से आत्मा को कोई सारभूत बात कोई शरण की बात नहीं मिलती। एक अपने आपके ज्ञान में अपने ज्ञानस्वभाव का स्वरूप समाया हो तो इसके प्रताप से विकल्पजाल हटेंगे और निर्विकल्प परम चैतन्यधाम में विश्राम होगा। सुख, शरण, सार यही है। यही है योग का अभ्यास। अपने आपके उपयोग को अपने आपके स्वरूप में लगाना यही एक शरणभूत है। याने अपना क्या स्वरूप है? वह स्वरूप अपने ज्ञान में बना रहे यह स्थिति है शरण की। यही स्थिति है सारभूत। तब यह जानकर कल्याणार्थी पुरुष योगाभ्यास में सुख समझता है। लेकिन जब योगाभ्यास करने बैठता है तो एक अंतरंग में क्यों कष्ट सा जँचता है? क्योंकि बहुत कठिन बात है ना कि अपना ज्ञान अपने आपके आत्मा में समा जाय। ऐसा करने के लिए अंत में बड़ा कठिन प्रतीत होता है। तो आचार्यदेव कह रहे हैं कि जो योग के अभ्यास में उद्यमी हो रहे हैं ऐसे पुरुषों को भीतर में तो दु:ख का अनुभव है और बाहर में सुख मालूम कर रहे हैं। समाधि में योग में सुख जानकर इसके लिए बड़ा उद्यम करते हैं किंतु कुछ उद्यम करने के बाद या करते हुए बहुत कठिन पड़रहा है कि यह ज्ञान अपने इस ज्ञान के स्वरूप में आ जाय। तो फिर इस बात में कष्ट होता है। नहीं बनता है काम, फिसल जाता है और श्रद्धा है ऐसी कि यह आत्ममग्नता हो ही जाना चाहिए। होती नहीं है तो अंतरंग में बड़ा कष्ट अनुभव करता है। तो यों योग के अभ्यास में जिनका मन उद्यमी है उनको अंतरंग में तो दु:ख होता है और बाहर में सुख हे तो योग के अभ्यास में वे सुख समझते हैं और जिनको इस योग का अभ्यास हो गया है ऐसे योगी पुरुषों को अंतरंग में तो सुख मालूम होता है और बाहरी स्थिति में दु:ख मालूम होता है। यह बात अपने आत्मा की चल रही है। आत्मा सब हैं। अपने आत्मा की अपने आपकी बात समझ में न आये, यह क्यों कठिन लग रही है? समझ में तो आना चाहिए। कठिन यों लग रही है कि विषयों में इसकी बुद्धि अटकी है। बाहर में रागभाव जमा हुआ है तो चित्त तो उस ओरहै, लगे कहाँ से अपने आत्मा में? तो आत्मा की बात बड़ी कठिन मालूम होती है लेकिन आत्मा की बात तो स्वाधीन है, स्व की है। वह तो सरल लगना चाहिए और बाहर की बात जैसे वैभव जोड़ना, मकान बनाना, और-और भी व्यवस्थाएँ बनाना ये पर की परिणतियाँ हैं। पर की परिणति मेरे आधीन नहीं हैं तो कठिन तो लगना चाहिए बाहर का काम,और अपने आपका काम तो अतीव सरल होना चाहिए। जब चाहे अपने आपके ज्ञान में डुबकी लगा लें, लो सारे दु:ख समाप्त हो गए। जैसे नदी में कोई कछुवा अपनी चोंच बाहर निकाले तैर रहा है तो चारों ओरसे पक्षी उड़कर उस कछुवा की चोंच को पकड़ना चाहते हैं तो वह कछुवा यहाँ वहाँ अपनी चोंच करके दु:ख से बचना चाहता है। अरे भाई कोई उस कछुवे को समझा दे कि तू उन पक्षियों के उस आक्रमण के भय से चोंच को यहाँ वहाँ करके क्यों कष्ट पा रहा है? तेरे में तो एक कला है जिस कला के बल से तू दु:खों से छूट जायगा। याद कर। वह कला है तेरी यह कि जो चार छ: अंगुल पानी के नीचे चला जा, फिर तो क्या करेंगे वे पक्षी, वे तो सब भाग जायेंगे। ऐसे ही हे आत्मन् ! तू अपने ज्ञान समुद्र से बाहर अपने उपयोग को दौड़ाये चला जा रहा है, सो इस उपयोग चोंच पर अनेक शत्रु, मित्र, बंधु, राजा, चोर सभी के सभी तेरे ऊपर आक्रमण कर रहे हैं? और तू उन सब बातों से घबड़ाकर अपना उपयोग बदलना चाहता है बाहरी बातों में। कितने कष्ट सह रहा है और उस आत्मा को कोई गुरु समझा देता है कि हे आत्मन् !तू क्यों बाहर ही बाहर उपयोग को डुलाकर कष्ट सह रहा है? तेरे में तो एक ऐसी कलाहै कि जिस कला के बल से तू संसार के सारे दु:खों से मुक्ति पा सकता है? वह तेरी कलाहै यह कि रे ज्ञान, तू अब अपने ज्ञान को स्वरूप को, स्वभाव को जान और अन्य बातों को छोड दे। तो देख जब यह ज्ञान ज्ञान का ज्ञान करेगा तो ज्ञानानुभूति प्रकट होगी। और ज्ञानानुभूति का ही अर्थ है आत्मानुभूति। तू अपने आपके ज्ञानसमुद्र में डुबकी तो लगा। इस ज्ञानसमुद्र के भीतर तो आ। ये तेरे ऊपर आये हुए सारे आक्रमण विफल हो जायेंगे और तू अपने आपमें वैभव को पा सकेगा। यह है अध्यात्मयोग की बात। जो इस आत्मध्यान के उद्यमी हैं उन्हें तत्काल तो बड़ा सुख होता है। हम ध्यान करने जा रहे हैं। जैसे कोइ्र यात्रा का विचार करे। यात्रा में जायगा तो पहिले बड़ा सुखी होता है पर जब प्रेक्टिकल चलता है तो अनेक कष्ट आ पड़ते हैं। यों ही समझिये कि आत्मानुभव की, आत्मध्यान की, आत्मयोग की बात मन में आती है कि आत्मयोग करेंगे, अपने आपकी सम्हाल करेंगे, आत्मधर्म का पालन करेंगे तो तत्काल तो बड़ा सुख मालूम होता है, पर जब करते हैं ज्ञान को सब ओर से संकोचकर समस्त बाह्यपदार्थों से हटाकर जब अपने आपके भीतर में अपने ज्ञान को जमाना चाहते हैं तो जमता नहीं है, बड़ा कष्ट होता है। इच्छा यह हे कि एक बार एक साथ मग्न हो जायें पर वहाँ फिट नहीं बैठ रहा, कष्ट प्रतीत होता है, लेकिन जिसका मन अपने अध्यात्म में आ चुका, अपने ज्ञान में आ चुका, ज्ञानानुभव हो गया, आत्मानुभव का दृढ़ अभ्यास हो गया उनको तो सुखदायी मालूम होता है और कदाचित् कोई हाथ झंकोरकर कहे कि चलो रोटी खा लो तो यह भी बात बड़ी खराब लगती है। बाहर में तो सुख प्रतीत होता है उस ध्यानाभ्यासी को, जिसने अपना स्वरूप अपने आपमें दृढ़ता से बसाया है और उसे अंतरंग में सुख प्रतीत होता है। कुछ लोग सोचते होंगे कि साधुजन गर्मी के दिनों में पर्वत पर, जाड़े के दिनों में नदी के तट पर कैसे ध्यान जमाते होंगे और पैसा पास नहीं, नौकर पास नहीं, कोई राशन पास नहीं, बर्तन भी नहीं, क्षुधा तृषा आदि लगते ही हैं, ये कैसे जंगल में रहते होंगे?तो भाई उन्हें एक आत्मीय आनंद का ऐसा उत्कृष्ट लाभ हुआ है जिस लाभ में वे ऐसा तृप्त हैं कि बाहर में कोई कष्ट भी आये तो उन्हें कष्ट नहीं मालूम होता। तो यह है कमाई ऐसी जिसकी प्राप्ति होने पर फिर संसार का कष्ट ही नहीं रहता। यह बात साधुजन निष्परीग्रही होने के कारण बहुत जल्दी कर लेते हैं। पर गृहस्थजन चूंकि उनको अनेक काम पड़े हुए हैं। व्यापार, पालन-पोषण तथा समाज आदि के, अतएव वे इस आत्मसाधना में विशेष सफल नहीं हो पाते। कदाचित् कभी-कभी झलक होती है, लेकिन यह थोड़ी सी भी झलक इस जीवन में बहुत बड़ा काम देती है। गृहस्थावस्था में करना क्या है? लक्ष्य तो वही बनाना है जो साधुवों का है पर विषय कषायों के अनेक प्रसंग लगे हैं जिससे देवपूजा, गुरूपासना, स्वाध्याय, तप, दान, संयम आदिक सभी बातें गृहस्थों को बतायी गई हैं। ये कार्य इसलिए बताये गए कि वे विषय कषायों से दूर रहकर आत्मानुभव करने के पात्र बन सकें। जब आत्मा का अनुभव अपने आपमें समा जाता है तो उस पुरुष को बाहर में कुछ भी नहीं सुहाता, मोहीजन उस पर आश्चर्य करते हैं कि क्या हो गया इसके? इसे न कोई काम सुहाये, न स्त्री बच्चे सुहायें, न धन वैभव सुहाये। जैसे कृपण लोग दानीयों की चर्या पर अचरज करते हैं, कैसे ये दिए जा रहे हैं इतना वैभव, इनका कुछ दिमाग तो नहीं उल्टा हो गया, ऐसे ही मोहीजन भी उस आत्मनुभवी पुरुष पर अचरज करते हैं। अज्ञानी मोही पुरुषों को निर्मोही पुरुषों के चरित्र सुनकर आश्चर्य होता है। कैसे छोड दिया सब घर-बार? कैसे अकेले जंगल में रहा करते थे? पर निर्मोही पुरुष जानता है कि जिन्होंने आत्मीय आनंद प्राप्त किया उसमें वह विभोर रहकर सारे संकटों को भुला दिया करता है। तो जो योगाभ्यास में निपुण हो गए उनके लिए अंतरंग में तो सुख मालूम होता और बाहर में क्लेश मालूम होता है।


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